Book Title: Nandanvan Kalpataru 2004 00 SrNo 12
Author(s): Kirtitrai
Publisher: Jain Granth Prakashan Samiti

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Page 28
________________ श्रीशारदाऽष्टकम्..... । । But । मैथिल पं. जगदीशः झा [अश्वधाटीछन्दः] स्फीता समस्तबुधगीता तपोव्रजमतीता खमानसगृहे भीतार्तिहृत् कुमतिशीतापनोदसमुदीतारुणायिततरा । प्रीताऽस्तु सा सपदि पीताम्बरादिसुरगीता सिताम्बुजगता वीताऽखिलेहसमधीता सदा न विपरीता कदापि भवतु ॥१॥ वीणासुनिवणधुरीणा गिरा पृथुलवीणासुमण्डितकरा क्षीणा कटौ, विधृतचीनांशुका, प्रचुरपीना ह्युरोजयुगले । दीनातिनुन् मसूणमीनाक्षिका, दुरितहीना, प्रबोधविसृजा कीनाशमीति हृतिलीना सदा पमधीनाऽस्तु मे भगवती ॥२॥ साराश्रुतेः स्फटिक हारान्विता एमृतधाराधरायितकृपा मारारिमुख्यदिविजाराधिता बृहदुदारा हृदि स्फुरतु मे । स्वाराधकस्य भवभारापहृत् तरुणताराधिपद्युतिधरा स्फारामुपेत्य दृशमारात् किरन्त्यनिशमाराध्यपादयुगला ॥३॥ बाला तथा तरुणमालाग्रणीस्तरणिजालांशुसंजयिरुचिः शालामतेरुडुपमाला महागुणविशाला सदा विजयसे । व्यालावलीसमकरालाऽसतां वरमरालारुहा शुभकरी । कालानला रिपुषु पालावलम्बिरुचिजालाऽसि साधुनिचये ॥४॥ Jain Education International For Prival Personal Use Only www.jainelibrary.org

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