Book Title: Nandanvan Kalpataru 2004 00 SrNo 12
Author(s): Kirtitrai
Publisher: Jain Granth Prakashan Samiti

View full book text
Previous | Next

Page 29
________________ रक्षाकरी परमदक्षा कलासु सितपक्षाग्यवाहनवती सक्षान्तिका जितविपक्षा सदाऽमृतसुभक्षादिवन्दितपदा । यक्षाधिराडपि हि पक्षाश्रयेण तव दक्षाग्रणीर्वितरणे साक्षात्कृता त्वमिह दक्षा गिरे!ऽसि मुनिमोक्षादिसौख्यददने ॥५॥ भाताऽखिलस्य वरशातादिदा मनुजजातादिसर्जनकरी धाताऽपि ते नयनपाताश्रयात् सृजति दाता च भाग्यनिवहम् । पाता हरिः सकलमाता हरो भुवनधातादिकर्मनिपुणो माता त्वमेव सहजातादिकोऽसि मम तातादिकोऽपि च गिरे ! ॥६॥ ज्ञानी भवत्यपि च मानी सदा नृपतिधानी सुखाद्यनुभवी दानी गजाश्वरथयानी तथा त्वदतुगानी नरः खलु गिरे । कानीनसूत्रचयभानी तथा दधदिदानीन्तनं सुखभरं स्थानीभवत्यपि समानीभवन् मतिनिधानीभवद्गुरुगणैः ॥७॥ यस्याउसि भाग्यभरवश्या गिरे ! मुनिनमस्याङ्घिक अयुगले ! शस्या विराजति तपस्या बुधैर्जगति तस्याऽत्र जन्म सफलम् । न स्यात् कदापि विपदस्याऽवनौ च वरिवस्या प्रसर्पिततराम् तत् स्या मदीय हृदि वश्या सदैव सरहस्या समस्तजननि ! ॥८॥ वाग्देवी पूजाविधौ तस्या भक्तिवशेन । अष्टकमेतद् विरचितं मैथिलजगदीशेन ॥७॥ HAST Jain Education International For Private personal Use Only www.jainelibrary.org www.jainel

Loading...

Page Navigation
1 ... 27 28 29 30 31 32 33 34 35 36 37 38 39 40 41 42 43 44 45 46 47 48 49 50 51 52 53 54 55 56 57 58 59 60 61 62 63 64 65 66 67 68 69 70 71 72 73 74 75 76 77 78 79 80 81 82 83 84 85 86 87 88 89 90 91 92 93 94 95 96 97 98 99 100 101 102 103 104 105 106 107 108 109 110 111 112 113 114 115 116 117 118 119 120 121 122