Book Title: Nandanvan Kalpataru 2004 00 SrNo 12
Author(s): Kirtitrai
Publisher: Jain Granth Prakashan Samiti

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Page 20
________________ - 488 सीमन्धरजिनस्तवनम् शृणु शशधरजी, सीमन्धरपरमेश्वरपाचे गम्यताम्, रजनीश्वरजी, एवं मम विज्ञप्तिं प्रीत्या कथ्यताम् । यस्त्रिभुवननायकतां दधति, यस्याऽग्रे धावति शक्रततिः, यः क्षायिकदर्शनज्ञानपतिः ॥१॥ शृणु...... यः काञ्चनकान्तिकलितकायः, वृषभाडितपादो निरपायः, पुण्डरिकिणीमहानगरीनायः ॥२॥ शृणु.... द्वादशपर्वत्सु यो वसति, चतुरनला(३४)तिशयैरुलसति, वाणी व्रततत्त्व(३५)गुणैर्लसति ॥३॥ शृणु... भविलोकान् यः प्रतिबोधयति, यत्समता शीतलता जयति, भव्या यं वीक्ष्य विमुह्यन्ति ॥४॥ शृणु.... तव सेवायामहमुत्सुकितः, अपि दूरे भरते संवसितः, हत मोहराजकरसंपतितः ॥५॥ शृणु.... त्वं देवो मनसि मया धरितः, आज्ञाखड्गस्तव करवरितः, तेनाऽयं किञ्चिद्दरदरितः ॥६॥ शृणु.... मम पूरय जिनपोत्तम वीर्य, हृदि पझे येन लभे शौर्य, वर्द्धत यथा तेजोवर्यम् ॥७॥ शृणु.... | प्रेमामृतरामरमां वहता, भव्याङ्गिजने भद्रङ्करता, 7 Lधार्योऽहं धर्मधुरन्धरता ॥८॥ शृणु.... NENam WIAyi Jain Education International For Private Personal Use Only www.jainelibrary.org

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