Book Title: Nandanvan Kalpataru 2004 00 SrNo 12
Author(s): Kirtitrai
Publisher: Jain Granth Prakashan Samiti

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Page 15
________________ ७.०७ Jain Education International ऋषभदेवचैत्यवन्दनम् कल्पतरोः शीतलतले, बालजिनो रमते । कनक दोलया दोलयन्, मातृमनो हरते ॥१॥ शिशुभूय देवीगणो, नाभिजमुद्वहते । उक्त्वा बहुवल्लभ इति, हृदयेऽपि संवहते ॥२॥ सुन्दरयौवनसङ्गतः, सञ्जातो भगवान् । चर्यं विवाहमण्डपं मघवा मण्डितवान् ॥३॥ चङ्गा बद्धा चत्वरी, सुरगौर्यो गायन्ति । सुनन्दां सुमङ्गलां, विभुमुद्वाहयति ॥४॥ त्यक्त सकलसङ्गो -ऽभवत्केवलज्ञानाय । प्राप्तं शिवपदमष्ट - कर्ममण्डलमपहाय ॥५॥ भरतेश्वरनृपनिर्मिते, संस्थित ! चैत्ये तुङ्गे । सार्वधुरन्धर ! जय सदा, शत्रुञ्जयशृङ्गे ॥६॥ For Private & Personal Use Only 20 www.jainelibrary.org

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