Book Title: Nandanvan Kalpataru 1999 00 SrNo 02
Author(s): Kirtitrai
Publisher: Jain Granth Prakashan Samiti

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Page 9
________________ ......नन्दनवनकल्पतरुः २...... अभीप्सितं मे नहि किश्चिदस्ति प्रभो ! ऽवशिष्टं तव दर्शनेन । मनः परां तृप्तिमितं कृपालो ! भूयात्सदैव स्थितिरीदृशी मे ।।५।। गतो विकारो गत एव मोहो गतः प्रमादोऽपि यतो ध्रुवं मे। त्वदीयतद्दर्शनमस्तु देव ! स्वप्ने तथा जागरणे सदैव ॥६॥ स्वीकारमुक्तां प्रतिकारमुक्तां प्रसादयुक्तां च विषादमुक्ताम् । स्वभावशुद्धां, न च मोहरुद्रां योगीन्द्र ! वन्दे तव योगमुद्राम् ॥७॥ अहोऽद्भुतं रूपमवेक्ष्य नित्य मीहे हि यस्यांह्रिको निवासम् । झरं कृपायाः शुचिहृद्यभावै रानौमि नागेश्वरपार्श्वनाथम् ॥८॥ NOD - Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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