Book Title: Nandanvan Kalpataru 1999 00 SrNo 02
Author(s): Kirtitrai
Publisher: Jain Granth Prakashan Samiti
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......नन्दनवनकल्पतरुः २......
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कनुति
-मुनिधर्मकीर्तिविजयः
शुभशीलबलैः वरदीप्तिधरं विहिताचरणं मुनिवारवरम् । भगवद्गदितागमगर्भधरं प्रणमामि सदा प्रभुनेमिगुरुम् ॥१॥
चरणे करणे च मुदोद्यमिनं मित-मञ्जुल-कोमलवाक्सदनम् । शिशु-वृद्धनृणां प्रियकारिवि/ प्रणमामि सदा प्रभुनेमिगुरुम् ।।२।।
जिनशासनमान्यगुरुं विबुधं जिनराजमतस्य हिते निरतम् । अचलापतिसंहतिसंजुषितं प्रणमामि सदा प्रभुनेमिगुरुम् ।।३।।
काकानां तस्कराणां च नश्यतां का ननु त्रपा॥
“हैमवचनामृतम् ।
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