Book Title: Nandanvan Kalpataru 1999 00 SrNo 02
Author(s): Kirtitrai
Publisher: Jain Granth Prakashan Samiti

View full book text
Previous | Next

Page 93
________________ .नन्दनवनकल्पतरुः २...... विरइमाई सव्वं पि सामग्गिं लद्धुं संवेगपवहणमारोहिऊण कीस भवसायरं न तरेसि ? सामग्गीए दुल्लहत्तणं कहेइ न पुणो पुणो वि एअं तुह संभावेमि जीव ! सामग्गिं । तारे ! हारेसि कहं पमायमइराइ उम्मत्तो ? ॥८॥ Jain Education International ➖➖➖ अन्वयः जीव ! पुणो पुणो वि एअं सामग्गिं तुह न संभावेमि, ता रे (जीव)! पमायमइराइ उम्मत्तो कहं (एयं) हारेसि ? | I भावार्थ : रे जीव ! जइ तं एयाए सामग्गीए निययकज्जं न साहेसि ता अन्नेसु जम्मेसु पुणो पुणो वि एसा सामग्गी तुह लब्भिहिइ इइ न संभावेमि । तारे जीव ! तं पमायमइरापाणेण उम्मत्तो होऊण कहमेयं सामग्गिं हारेसि ? पमायं मोत्तूणं एयाए सामग्गीए सम्मं उवओगं काऊण निययकज्जं साहेसु इइ ' भावो ८६ देवा विसयपसत्ता नेरइया विविहदुक्खसंत्तता । तिरिआ विवेगविगला मणुआणं धम्मसामग्गी ॥ For Private & Personal Use Only 1 (क्रमशः) www.jainelibrary.org

Loading...

Page Navigation
1 ... 91 92 93 94 95 96 97 98 99 100