Book Title: Nandanvan Kalpataru 1999 00 SrNo 02
Author(s): Kirtitrai
Publisher: Jain Granth Prakashan Samiti

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Page 8
________________ ......नन्दनवनकल्पतरुः २...... - 23338086230038862 नागेश्वरपार्श्वनाथस्तुत्यष्टकम 88458208 -मुनिरत्नकीर्तिविजयः भवाटवीलङ्घनसार्थवाह भव्यासुमबर्हिणवारिवाहम्। दुष्कर्मधर्मापहगन्धवाह श्रयामि नागेश्वरपार्थनाथम् ॥१॥ सान्निध्यतो यस्य शमं समेति सन्तापतापार्दितचित्तमेतद्। तं सौम्यमुद्रं प्रशमोदधिं च भजामि नागेश्वरपार्थनाथम् ॥२॥ जगत्त्रयेऽस्मिन् न शरण्यमस्ति त्वया विना नाथ ! हि किञ्चिदन्यत् । तवाऽऽश्रयो मेऽनुदिनं प्रभूयात् जिनेन्द्र ! नागेश्वरपार्थनाथ ! ॥३॥ त्वमेव मे नाथ ! मतिर्गतिश्च त्वमेव मार्गश्च पदं त्वमेव । त्वमेव नेत्रं त्वकमेव दृष्टिस्त्वमेव सर्वं मम देवदेव ! ॥४॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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