Book Title: Khandaharo Ka Vaibhav
Author(s): Kantisagar
Publisher: Bharatiya Gyanpith

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Page 420
________________ ३६४ खण्डहरोंका वैभव हुए डिजाइन सांची स्तूपके डिजाइनों का स्मरण दिलाते हैं । सबसे पहले हम खड़े हुए विष्णुको ही लें भगवान् विष्णु के अंग-प्रत्यंगकी गठनमें विशेष सुघड़ता तो है ही, पर साथ ही अधोवस्त्र एवं अन्य आभरणोंकी रचना में सुरुचिका प्रदर्शन स्पष्ट है । इन आभरणों में कटिप्रदेश से किंचित् उपरि भागमें आवेष्टित आभरण, विशेष बुन्देलखण्ड अथवा महाकोसलकी अपनी विशेष साजसजा जान पड़ती है | वहाँकी अन्यान्य प्रतिमाओं में भी यह दिख पड़ा है । भगवान् विष्णु के पावों में पैंजन मूर्तिकी सुकुमारताका परिचय देते है | दोनों टाँगों में सुघड़ता है । वस्त्र घुटनों के नीचेतक आया है और वहींतक कंठस्थित माला लटक रही है । इस माला के फूलोंकी रचना बहुत स्वाभाविक है, अधोवस्त्र कटिप्रदेशसे बँधा हुआ है, परन्तु उसकी शर्तें और, उन शलोंकी बहुमुखी दिशाएँ अभीतक वहाँ किसी भी प्रतिमामें नहीं आई । कटिप्रदेश में मेखला स्पष्ट दिख रही है। मेखलाका फूल गुदीके बिल्कुल नीचे सरल रेखा में चित्रित है । कटि, वक्ष और स्कन्धोंका अनुपात तथा उनके पीछे किसी भी आधार भूमिका अभाव, प्रतिमाके शारीरिक सुगठन सौन्दर्यको द्विगुणित करता है । विशाल वक्षस्थलपर बुन्देलखण्डका अपना आभूषण अर्थात् हँसुली और माला बदस्तूर पड़े हुए हैं । चतुर्भुजी प्रतिमाकी कोहनी के नीचेके अंग खंडित हैं । बाहु भागमें अलबत्ता बाजूबन्दका design अभी बना हुआ है । गलेकी त्रिवली स्पष्ट है । चेहरे में are और आँखें अस्पष्ट हैं, किन्तु नीचेका ओठ और कान बड़े ही सुन्दर बन पड़े हैं । इतने मुन्दर कान अभी इस तरफ़ देखने में कम आते हैं । पश्चात् भागमें पड़ा हुआ केश कुंज बड़ा स्वाभाविक है । कर्णफूल उस केश कुंज के ऊपर रखे हुए हैं सिरका किरीट मुकुट ऊँचा है, — पिरेमिड के आकारका है । उसमें कढ़े हुए, बेल-बूटे "ब्राह्मण धर्मके अन्य बेलबूटी जैसे हो हैं । | --- बैजयन्तीमाला मूर्ति - सौन्दर्यमें और भी वृद्धि करती है। माला में Aho ! Shrutgyanam

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