Book Title: Jain Nyaya
Author(s): Kailashchandra Shastri
Publisher: Bharatiya Gyanpith

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Page 333
________________ ३१८ जैन न्याय सातवाँ स्यादस्ति नास्ति अवक्तव्य-अलग-अलग क्रमसे अपित तथा युगपत् अर्पित द्रव्य-पर्यायकी अपेक्षा वस्तु स्यात् अस्ति नास्ति अवक्तव्य है। किसी द्रव्यविशेषकी अपेक्षा अस्तित्व और किसी पर्यायविशेषको अपेक्षा नास्तित्व होता है। तथा किसी द्रव्यपर्याय विशेष और द्रव्यपर्यायसामान्यकी एक साथ विवक्षामें वही अवक्तव्य हो जाता है। इस तरह स्यात् अस्ति नास्ति अवक्तव्य भंग बन जाता है। सात भंगोंमें क्रमभेद सबसे प्रथम आचार्य कुन्दकुन्दके ग्रन्थोंमें सात भंगोंका नामोल्लेख मात्र मिलता है। उनमें से प्रवचनसार गा० (२.२३) में स्यात् अवक्तव्यको तो तीसरा भंग रखा है और स्यादस्ति नास्तिको चतुर्थ भंग रखा है। किन्तु पंचास्तिकाय गाथा चौदहमें अस्ति नास्तिको तीसरा और अवक्तव्यको चतुर्थं भंग रखा है। इसी तरह अकलंकदेवने अपने तत्त्वार्थवातिकमें दो स्थलोंपर सप्तभंगीका कथन किया है। उनमें से एक स्थल ( पृ० ३५३ ) पर उन्होंने प्रवचनसारका क्रम अपनाया है और दूसरे स्थल ( पृ० ३३) पर पंचास्तिकायका क्रम अपनाया है। दोनों जैन सम्प्रदायोंमें दोनों ही क्रम प्रचलित रहे हैं। सभाष्य तत्त्वार्थाधिगम ( अ० ५।३१ सू० ) और विशेषावश्यकभाष्य ( गा० २२३२ ) में प्रथम क्रम अपनाया गया है। किन्तु आप्तमीमांसा ( कारिका १४ ), तत्त्वार्थश्लोकवातिक (पृ० १२८), प्रमेयकमलमार्तण्ड (पृ० ६८२), प्रमाणनयतत्त्वालोकालंकार (परि० ४,सू०१७-१८), स्याद्वादमंजरी ( पृ० १८९), सप्तभंगीतरंगिणी ( पृ० २ ) और नयोपदेश (पृ० १२) में दूसरा क्रम अपनाया गया है। इस तरह दार्शनिक क्षेत्रमें दूसरा ही क्रम प्रचलित रहा है अर्थात् अस्ति नास्तिको तीसरा और अवक्तव्यको चतुर्थ भंग ही माना गया है । इस क्रमभेदके विषय में बारहवीं शताब्दी के एक श्वेताम्बर ग्रन्यकारने सम्भवतया सर्वप्रथम ध्यान दिया है। उन्होंने लिखा है कि कोई-कोई विद्वान् इस अव. क्तव्य भंगको तीसरे भंगके स्थानमें पढ़ते हैं और तोसरेको इसके स्थानमें । उस पाठमें भी कोई दोष नहीं हैं; क्योंकि उससे अर्थमें कोई अन्तर नहीं पड़ता। यथार्थमें विधिप्रतिषेधको क्रमसे और एक साथ कथन करनेको अपेक्षासे तीसरे और चतुर्थ भंगको प्रवृत्ति होती है । पहले दोनोंको क्रमसे कहकर बादको दोनोंका १. 'अयं च भंगः कैश्चितृतीयभंगस्थाने पठ्यते, तृतीयञ्च तस्य स्थाने । न चैवमपि कश्चिदोषः अर्थविशेषाभावात् ।'-श्याद्वादरत्नाकरावतारिका-परि०४, सू० १८ । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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