Book Title: Jain Nyaya
Author(s): Kailashchandra Shastri
Publisher: Bharatiya Gyanpith

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Page 344
________________ श्रुतके दो उपयोग ३२९ शंका- अंश और अंशीके समूहका नाम वस्तु है । अतः जैसे वस्तुका एक अंश न वस्तु है और न अवस्तु है, किन्तु केवल वस्त्वंश है, उसी तरह अंशी भी न वस्तु है और न अवस्तु है किन्तु केवल अंशी है । इसलिए जैसे वस्तुके अंशको जाननेवाला ज्ञान नय है वैसे ही अंशीको भी जाननेवाला ज्ञान नय होना चाहिए । अन्यथा जैसे अंशोको जाननेवाला ज्ञान प्रमाण माना जाता है वैसे ही अंशको जाननेवाला ज्ञान भी प्रमाण होना चाहिए। और ऐसी स्थिति में नय प्रमाणसे भिन्न नहीं है । समाधान—उक्त ओक्षेप ठीक नहीं है । जब सम्पूर्ण धर्मोको गौण करके अंशीको ही प्रधान रूपसे जानना इष्ट होता है तो उसमें द्रव्यार्थिकनयका ही मुख्यरूप से व्यापार माना गया है, प्रमाणका नहीं । किन्तु जब धर्म और धर्मीके समूहको प्रधानरूपसे जानना इष्ट होता है तो उसमें प्रमाणका व्यापार होता है । सारांश यह है कि अंशोंको प्रधान और अंशीको गौणरूपसे अथवा अंशीको प्रधान और अंशोंको गौण रूपसे जाननेवाला ज्ञान नय है । तथा अंश और अंशी दोनोंको प्रधान रूप से जाननेवाला ज्ञान प्रमाण है अतः नय प्रमाणसे भिन्न है । प्रमाण तथा, नय नहीं है; क्योंकि प्रमाणका विषय अनेकान्त है । और न नय प्रमाण है, क्योंकि नयका विषय एकान्त है । प्रमाणका विषय एकान्त नहीं है; क्योंकि एकान्त नीरूप होनेसे अवस्तु है और जो अवस्तु है, वह ज्ञानका विषय नहीं होता। इसी तरह नयका विषय अनेकान्त नहीं है; क्योंकि नयदृष्टिमें अनेकान्त अवस्तु है और अवस्तुमें वस्तुका आरोप नहीं हो सकता । क्योंकि यदि वह केवल तथा प्रमाण केवल विधि ( सत् ) को नहीं जानता, विधिको ही जाने तो एक पदार्थका दूसरे पदार्थ से भेद न ग्रहण करनेपर घटके स्थानपर पटमें भी प्रवृत्ति कर सकेगा और ऐसी स्थिति में जानना न जानने के समान ही हो जायेगा । तथा प्रमाण केवल प्रतिषेधको भी ग्रहण नहीं करता; क्योंकि विधिको जाने बिना 'यह इससे भिन्न है' ऐसा ग्रहण नहीं किया जा १. 'यथांशिनि प्रवृत्तस्य ज्ञानस्येष्टा प्रमाणता । तथांशेष्वपि किन्न स्यादिति मानात्मको नयः ||१८|| - त० श्लो० वा०, सू० १-६ । २. 'तन्नांशिन्यपि निःशेषधर्माणां गुणतागतौ । द्रव्यार्थिकनयस्यैव व्यापारान्मुख्यरूपतः ॥ १६॥ धर्म समूहस्य प्राधान्यार्पणया विदः । प्रमाणत्वेन निर्णीतेः प्रमाणादपरो नयः ॥ २० ॥ ' - वही ३. षटू खण्डागम पु० ६, पृ० १६३ । ४२ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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