Book Title: Jain Dharm Ki Udarta
Author(s): Parmeshthidas Jain
Publisher: Joharimalji Jain Saraf

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Page 38
________________ शास्त्रीय दण्ड विधान २५ सीधी सादी एवं युक्तिसंगत बात क्यों समझ में नहीं आती ? यदि आज कल के जैनियों की भांति महावीर स्वामी की भी संकुचित दृष्टि होती तो वे महा पापी, अत्याचारी, मांस लोलुपी, नर हत्या करने वाले निर्दयी मनुष्यों को इस पतित पावन जैन धर्म की शरण में कैसे आने देते ? तथा उन्हें उपदेश ही क्यों देते ? उनका हृदय तो विशाल था, वे सच्चे पतित पावन प्रभु थे, उनमें विश्व प्रेम था इसी लिये वे अपने शासन में सबको शरण देते थे । • मगर समझ में नहीं आता कि महावीर स्वामी के अनुयायी आज उस उदार बुद्धि से क्यों काम नहीं लेते ? भगवान् महावीर स्वामी का उपदेश प्राय: प्राकृत भाषा में पाया जाता है । इसका कारण यही है कि उस जमाने में नोच से नीच वर्ग की भी आम भाषा प्राकृत थी । उन सब को उपदेश देने के लिये ही साधारण बोलचाल की भाषा में हमारे धर्म ग्रन्थों की रचना हुई थी । जो पतित पावन नहीं है वह धर्म नहीं है, जिसका उपदेश प्राणीमात्र के लिये नहीं है वह देव नहीं है, जिसका कथन सत्र के लिये नहीं है वह शास्त्र नहीं है, जो नीचों से घृणा करता है और उन्हें कल्याण मार्ग पर नहीं लगा सकता वह गुरु नहीं है । जैन धर्म में यह उदारता पाई जाती है इसी लिये वह सर्व श्रेष्ठ है । वर्तमान में जैनधर्म की इस उदारता का प्रत्यक्ष रूप में अमल कर दिखाने की जरूरत है । शास्त्रीय दण्ड विधान | किसी भी धर्म की उदारता का पता उस के प्रायश्चित्त या दण्ड विधान से भी लग सकता है । जैन शास्त्रों में दण्ड विधान बहुत ही उदार दृष्टि से वर्णित किया गया है । यह बात दूसरी है Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com

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