Book Title: Hamir Raso
Author(s): Agarchand Nahta
Publisher: Rajasthan Prachyavidya Pratishthan Jodhpur

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Page 66
________________ , हमीररासो : 53 जेठ मास बुधबार, सपतमी पाख अंध्यारी । करि सूरजि सौं' नवणि, राव कर तेग संभारी ।। हरखे सूर हमीर के, उत कोपे मीर अमीर । जुड़े जंग पतिसाहि सौं, सनमुख राव हमीर ॥२५०।। बचनिका-- राध का हाथी पांच सै ऊर जोधा चढ्या है । होदै चढ़या हमीर, साहि परि सनमुखि धाया 1 लीजै महिमासाहि, उली हजरति ये अाया५ ।। राव हमीर अलावदी, नर दोऊ सफ्रजंग जुर । येते सूर हमीर के, येक येक सौं प्राहुरै ॥२५१।। छंद वियक्खरीसूर सनमुख तब सीस नावै । हुकम करो राव, गहि साहि लावै ॥ राव हंसि मुख बचन यौं ऊच्चारै' । साहि सौं जंग लीधै हमारा ॥१२॥ पतिसाहि से घात कोऊ मति बिचारौ । मरि उमराव किन पुहमी पारौ॥ ये बचन सुनि सूर अंग न मावै । जब सार समसेर अंग ११जिरह लावै ।।२५३॥ अध सहंस गजराज हरबल हकले । मनु मेर पाखान के पाय चले ।। तेल सिंदूर चरचे संवारे । जिनै कोपि गजदंतग हमोर पारै ॥२५४॥ १ ग. कौं। २. क. संवारी, ख.ग. संबाही. ग. उडि जमीं की गरद असमान छाई अ.पा.। ३ ख ग घ. राव हमीर का हाथी पाच से होदा ऊपर जोधा चढया छ । ४ क. धावै। ५ क. पावै । ६ ख घ. प्रागरै । ७ ख.घ. हमीर मुखी । ८ ९ पद्यभाग मूल प्रति (क) में नहीं है । १० ग. समाव। ११ ख. अमीझर । Jain Educationa International For Personal and Private Use Only www.jainelibrary.org


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