Book Title: Chaturvinshati Jin Stuti Shantisagar Charitra
Author(s): Lalaram Shastri
Publisher: Ravjibhai Kevalchand Sheth

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Page 148
________________ १९ श्रीशान्तिसागरचरित्र । सर्वान् जिनालयान् नत्वा नत्वा सत्प्रतिमाःशुभाः। सिद्धांतप्राभृतं श्रुत्वा नत्वा स्तुत्वा प्रपूज्य च ॥७२ धर्मोपदेशं कुर्वन् स स्वाध्यायं च जपं तपः। भव्यानाल्हादयन् सूरिर्दिनानि कतिचित्स्थितः ॥ ___ अर्थ- उन आचार्यने उन समस्त जिनालयोंको नमस्कार किया, समस्त शुभ सत्प्रतिमाओंको नमस्कार किया, सिद्धांत ग्रन्थोंको सुना, उनको नमस्कार किया, उनकी स्तुति की, पूजा की तथा धर्मोपदेश स्वाध्याय जप-तप करते हुए और भव्यजीवोंको प्रसन्न करते हुए वे आचार्य कुछ दिनतक वहां रहे। ततोऽचलरसूरिराजः बेलग्रामं प्रसन्नधीः । मुनिभिः श्रावकैः साई समितीः परिपालयन् ॥ ___ अर्थ- तदनंतर निर्मल बुद्धीको धारण करनेवाले वे आचार्य अनेक मुनि और श्रावकोंके साथ समितियोंका पालन करते हुए बेलगांवके लिये चले।। भवे न वर्तते सौख्यं दर्शयन्निति सज्जनान् । त्यजन्तु कोषं मानं च मायां लोभं मदं स्मरम् ॥ आत्मनः शत्रव चैते स्वशान्त्योपदिशन्निति । मठं स्वाध्यायशालां च स्थापयन धर्महेतवे ॥७६॥

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