Book Title: Apbhramsa Bharti 2007 19
Author(s): Kamalchand Sogani, Gyanchandra Khinduka
Publisher: Apbhramsa Sahitya Academy

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Page 135
________________ 126 अपभ्रंश भारती 19 35. सिसु तरणउ परिणयय, वसु इउ चिंतणहं ण जाइ। जम रक्खस ‘सुप्पउ भणई', उप्पर ताडिहिं खाइ॥35॥ अर्थ - सुप्रभ कहते हैं - हे साधु ! हे संयमी ! (मैं) शिशु (हँ), तरुण (हूँ), परिपक्व (हूँ) - जो इस प्रकार सोचता है (वह) नहीं जानता है कि यमरूपी (मृत्युरूपी) राक्षस (शिशु, तरुण, परिपक्व अर्थात् वृद्ध सबके) ऊपर आघात करता है। वसु = संयमी, साधु; खाइ = पादपूरक 36. जे धनवंत न दिंतु धणु, अवरु जि पर-मग्गंति । ते दुण्णिवि 'सुप्पउ भणइ', मुय लेखइ लग्गति ॥36॥ . अर्थ - सुप्रभ कहते हैं - जो धनवान होते हुए (भी) धन का दान नहीं देते (वे) और जो दूसरों से धन माँगते हैं वे - दोनों ही (प्रकार के लोग) मरे हुए (के समान) लगते हैं।

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