Book Title: Apbhramsa Bharti 2007 19
Author(s): Kamalchand Sogani, Gyanchandra Khinduka
Publisher: Apbhramsa Sahitya Academy

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Page 147
________________ 138 अपभ्रंश भारती 19 59. जसु मणु जीवइ विसय-वसु, सो णरु मुवउ भणिज्ज। जसु पुणु ‘सुप्पई' मणु मरइ, सो णरु अमरु भणिज्ज॥59॥ अर्थ - सुप्रभ कहते हैं - जिसका मन विषय-भोगों के अधीन (होकर) जीता है वह मनुष्य मरा हुआ कहा जाता है और जिसका मन मर जाता है (विषय-भोगों से विरक्त हो जाता है) वह (मनुष्य) अमर कहा जाता है। मणु मरइ = मन मर जाना (यह एक मुहावरा है) 60. जसु लग्गउ ‘सुप्पउ भणई', पिय यर-घरिणि पि साउ। सो किं कहिउ समायरइ, मित्त णिरंजण भाउ॥60॥ अर्थ - सुप्रभ कहते हैं - हे मित्र ! जो (जिसका मन) प्रिय में, घर-घरिणि (पत्नी) (में), और स्वाद (अर्थात् रसना इन्द्रिय) (में) लगा हुआ है/आसक्त है, कहो, क्या वह निरंजन भाव का आचरण करता है (कर सकता है)!

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