Book Title: Apbhramsa Bharti 2007 19
Author(s): Kamalchand Sogani, Gyanchandra Khinduka
Publisher: Apbhramsa Sahitya Academy

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Page 148
________________ अपभ्रंश भारती 19 139 61. जेहि जि णयणेहिं वल्लहउ, दीसइ रज्जु करंतु। पुणु तेहि जि ‘सुप्पउ भणई', सई दीसइं डझंतु॥62॥ अर्थ - जिन नयनों से अपने प्रिय को राज करता हुआ देखा जाता है, सुप्रभ कहते हैं - फिर अपने उन्हीं (नयनों) के द्वारा (अपने उसी प्रिय को) जलता हुआ देखा जाता है (कैसी विडम्बना है)! 62. जेहि ण णिय धणु विलसियउ, णउ सग्गंतहं दिण्णु। ___ अप्पउ सहि ‘सुप्पउ भणई', ते अप्पाणउ छिण्णु॥62॥ · अर्थ - जिनके द्वारा न अपने लिए धन का उपभोग किया जाता है, न माँगते हुओं के लिए (दान) दिया जाता है, सुप्रभ कहते हैं - वे (जन) अपने साथ अपनों को भी क्षीण/नष्ट करते हैं। 1.C. ण वि मग्गंतहं यहाँ अर्थ में 'C' प्रति के इस शब्द को आधार माना गया है। ..ण विमगतह नि कसा

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