Book Title: Agam 02 Ang 02 Sutrakrutang Sutra Shwetambar
Author(s): Purnachandrasagar
Publisher: Jainanand Pustakalay

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Page 64
________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir |वा से मत्ते विष्परियासियभुए इत्थिविग्गहे वा किलीबे वा तं भिक्खु उवसंकमित्तु बूया आउसंतो समणा अहे आरामंसि वा अहे उवस्मयंसि वा राओ वा वियाले वा गामधम्मनियंतियं कट्टु रहस्सियं मेहुणधम्मपरियारणाए आउट्टामो, तं चेवेगईओ सातिज्जिज्जा, अकरणिज्जं चेयं संखाए एए आयाणा (आयतणाणि) संति संविज्जमाणा पच्चवाया भवंति, तुम्हा से संजए नियंते तहम्पगारं पुरेसंखडिं संखडिपडियाए नो अभिसंधारिज्जा गमणाए । २३८ । से भिक्खू वा अन्नयरिं संखडिं सुच्चा निसम्म संपहावइ उस्सुयभूएण अप्पाणेणं, ध्रुवा संखडी, नो संचाएइ तत्था इयरेयरेहिं कुलेहिं सामुदाणियं एसियं वेसियं पिंडवायं पडिग्गाहित्ता आहारं आहारितए, माइट्ठाणं संफासे, नो एवं करिज्जा, से तत्थ कालेण अणुपविसित्ता तत्थियरे यरेहिं कुलेहिं सामुदाणियं एसियं वेसियं पिंडवायं पडिगाहित्ता आहारं आहारिजा । २३९। से भिक्खू वा २ से जं पुण जाणिज्जा गामं वा जाव रायहाणिं वा इमंसि खलु गामंसि वा जाव रायहाणिंसि वा संखडी सिया तंपि य गामं वा जाव रायहाणिं वा संखडिं संखडिपडियाए नो अभिसंधारिज्जा गमणाए, केवली बूया आयाणमेयं, आइनाऽवमाणं संखडिं अणुपविस्समाणस्स पाएण वा पाए अक्कंतपुव्वे भवइ हत्थेण वा हत्थे संचालियपुव्वे भवइ पाएण वा पाए आवडियपुव्वे भवइ सीसेण वा सीसे संघट्टियपुव्वे भवइ कारण वा काए संखोभियपुव्वे भवइ दंडेण वा अट्ठीण वा मुट्ठीण वा लेलुणा वा कवालेण वा अभिहयपुव्वे भवइ सीओदएण वा उस्सित्तपुव्वे भवइ रयसा । परिघासियपुव्वे भवइ अणेसणिज्जे वा परिभुत्तपुव्वे भवइ अन्नेसिं वा दिज्नमाणे पडिग्गाहियपुव्वे भवइ तुम्हा से संजए नियंठे तहम्पगारं आइन्नावमाणं संखडिं संखडिपडियाए नो ॥ श्री आचाराङ्ग सूत्रं ॥ ५३ पू. सागरजी म. संशोधित For Private And Personal Use Only

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