Book Title: Vasudevhindi Part 1
Author(s): Sanghdas Gani, Chaturvijay, Punyavijay
Publisher: Atmanand Jain Sabha

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Page 106
________________ पज्जुण्णेण सच्चभामाए वंचणं] पेढिया। ततो 'रूवस्सी विउसो विणीओ पियाभासी सत्तजुत्तो सरण्णो दाया पज्जुण्णो' त्ति बारवतीजणेण पसंसिज्जमाणो जहासुहमभिरमति । कण्हेण वि अणिच्छंतो वि परं पीइमुबहतेण विजाहर-धरणिगोयरपत्थिवकण्णाणं सरिसजोवणगुणाणं पाणिं गाहिओ पासायगतो दोगुंदुगदेवो इव भोए भुंजमाणो निरुश्विग्गो विहरइ । ___ कयाइं च सच्चभामा कण्हं सगिहगयं विन्नवेइ-देव! जा किर इत्थिया भत्तुणो ण 5 बहुमया तीसे अवञ्चाणि मंदरूवाणि णित्तेयाणि भवंति. जा पुण वल्लभा तीसे भत्तारसरिसरूव-गुणाणि. तं अहं तुभं वेसा, रुप्पिणी भे गोरविया, तेण से तिसमुद्दपरिगयाए मेइणीए तिलयभूओ पुत्तो दत्तो । वासुदेवेण भणिया-देवि! मा एवं जंपसु. तुमं सि सबतेउरजेट्ठा, कीस एवं संलवसि ? । तो भणइ-जइ एवं तो पज्जुण्णसरिसं पुत्तं देह । कण्हेण भणियं-देवि ! जइ तुब्भं एरिसो अभिप्पाओ तो आराहेमि देवं हरिणेगमेसिं, 10 जहा तुमं सफलमणोरहा होहिसि त्ति । कुलगरविदितं काऊण द्वितो पोसहसालाए अट्ठमेण भत्तेण । आकंपिओ देवो भणइ-वरेह वरं, जम्मि ते सुमरिओ। सो भणइ-देवी पज्जुण्णसरिसं पुत्तं इच्छेइ, कुणसु पसायं । णेगमेसी भणइ-जीए देवीए सह पढमसमागमो ते तीए पज्जुण्णसरिसो पुत्तो होहिति. इमो य हारो से दायवो त्ति । गतो देवो । विदितं च एयं कारणं कयं पण्णत्तीए पज्जुण्णस्स । पारियतवो य कण्हो वासघर-15 मुवगतो । पज्जुण्णस्स चिंता जाया-सच्चभामा अम्मयाए सह समच्छरा. जइ तीसे मम सरिसो पुत्तो होइ ततो तेण सह मम पीई न होज, किह कायवं ? चिंतियं चाणेण-जंबवती देवी अम्माय माउसंबंधेण भगिणी, तं वच्चामि तीसे समीवे । गंतुं जंबवइभवणं पणओ, दत्तासणो भणति-अम्मो! तुम्भं मम सरिसो पुत्तो रोयइ ? त्ति । तीए भणियं-किं तुमं मम पुत्तो न होसि ?. सच्चभामानिमित्ते देवो नियमेण द्वितो, किह मम तव सरिसो 20 पुत्तो होइहि ? त्ति । सो णं विण्णवेइ-तुझं अहं ताव पुत्तो, बितिओ जइ होई णणु सोहर्णयरं ।सा भणइ-केण उवाएण ? पजुण्णेण भणिया-'तुम्भं सच्चभामासरिसं रूवं होहित्ति संज्झाविरामसमए जाव पसाहण-देवयञ्चणविक्खित्ता ताव अविलंबियं देवसमीवं वच्चेजाहि-त्ति वोत्तूण गतो नियगभवणं पर्जुण्णो। पण्णत्तीए य जंबवती सच्चभामासरिसी कया। चेडीए भणिया-देवि! तुब्भे सच्चभामासरिसी संवुत्ता । ततो तुट्ठा छत्त-चामर-भिंगा-25 रधरीहिं चेडीहिं सह गया पतिसमीवं, पवियारसुहमणुभविऊण य हारसोहिया दुतमवर्कता। सच्चभामा य अलंकिय-विभूसिया कयकोउय-मंगला उवगया कण्हसमीवं । भणिया य गेणं-देवि ! किं इमं परियट्टियनेवत्था सि पुणो आगया ?। सा कुविया-नूणं का वि ते कयसंकेया हिययसाहीणा आगया, जओ मं उवालभत्ति । तेण भणिया-देवि! परिहासो कओ,मा कुप्प, का सत्ती अण्णाए अन्ज इहागंतु? । ततो पसण्णमुही संवुत्ता, वसिऊण य गया भवणं । 30 वासुदेवेण विचिंतियं-वंचिया कीय वि तवस्सिणी, उवलभामि ताव त्ति। अंतेउरमवलोइउमारद्धो । पत्तो य कमेण जंबवतिसमीवं, पस्सति सरयकालतिपहगं विव हंसावलिसो१ इ दाई ण° ली ३ ॥ २ °णयं शां० विना ॥ ३ °सारि क ३॥ व०हिं० १३ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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