Book Title: Prapanchasara Sangraha
Author(s): Giryanendra Saraswati
Publisher: Giryanendra Saraswati

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Page 700
________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir घसंपूपायैतुल्यै पष्टये रत्यै ए त्यै शशिन्यैः चंद्रिकायै कात्यै जोत्सनायै श्रिये की अंमदाय पूर्णायै पूर्णा ना ।। ३४६ || दतिसोमात्मिकाभिःषोड़शकलाभिःस्वर वर्ग:रकैकाभिःसमाबाहयेत्॥ इत्यंभवाहन विधौभष्टत्रिंशललामा यद्यपिचतुर्थतवेनलिखितथापिआवाहन विधौद्वितीयांतलेनैवसमावाहयेत्। दर्थकचः॥पंचषण व कलाः एक पंचाशत्अष्टविंशकलाश्वसंभूयचतर्नरवनिसंख्याकाः कलादयः एतारिखजलेसमावावमूलमन्त्रणाममावा ह्यता नलकंभेनिसिपअवशिष्टेनापिकषायोदकेनकुंभमापूर्यतत्रतत्रकलशवि धौयायासाध्यदेवता हास्याःप्राणप|| तिष्ठांचतस्मिन्कुंभोदके कुर्यात्।एवंसर्वत्रकलशपूरणविधिरत्रतपुनः तस्मिन् सीरमप्येद्वादशसंरत्ययंथालय वाशालग्रामंनिघायपुनस्तसावमखेमंगलार्थअश्वस्थचूतपनसरक्षाणांस्तवकानपूर्वमुखेनानिधायतटुपरि) पुष्यफलतंडुलांश्चनिधायशतमखवल्याकंभमाकलयेत्॥पुननववस्त्रयगलेनन्दपरि पिघायपुनरावाह येत्।शालग्रामस्थापनानंतरोक्ताःसर्वाःक्रियाःसर्वकलशविधानेपिसमानाः तदुक्तंचकदीपिकायाम्।सह कारखोपियनसस्तववकैःशतमत्सवल्लिकलितैः कलशापिधात फष्यफलतंदुलकैःद्यभिपूर्णावापिशभत्र एमः ||क्रियया।चक्रिकापत्रअभिवेश्येत्।तदनुकंभमुखनवनिर्मलांशुकयुगेनवपति॥पनरत्रपन्चंतरिमू/२४९ For Private And Personal

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