Book Title: Jivajivabhigamsutra Part 02
Author(s): Ghasilal Maharaj
Publisher: A B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti

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Page 863
________________ प्रमेयधोतिकारीका प्र. उ. सू.५३ वनषण्डादिकवर्णनम् कथ्यते किन्तु तथा प्रतिभासनात् तथोक्तं नीलान मासा नीलोऽवभासो यस्य स तथा, वदा-'हरिए हरिओमासे यौवने तान्येव पत्राणि किशलयत्वं रक्तत्वञ्चाति क्रान्तानि ईबद्धरितानि पाण्डुनि सन्ति हरितानि इत्युपदिश्यन्ते ततखद्योगाद् वनपण्डोऽपि हरितः, न चैतदुपचारमा किन्तु तथा प्रतिभासोऽप्यस्ति, अलएनाह-हरितावभास:-हरितोऽवभासो यस्य स तथा, तथा-'सीए सीओमासे' वालणदतिका. तानि वृक्षाणां पत्राणि शीतानि भवन्ति ततस्त योगाद् वनपण्डोऽपि शीलः, न चासो उपचारमात्रात् किन्तु गुणत एक, तथा चाह-शीतावमासः, अधोभागवत्तिनांव्यन्तरदेवानां च तद्योगे शीत्वातस्पर्शः ततः स शीतो बनपण्डोऽवभासते इति । तथाकरके कृष्ण अवस्था को नहीं प्राप्त हुए पानीले कहे जाते है इस पत्र संबंधी नीलिमा के योग ले धन को भी नील कहा गया है। पत्ते अपने युवावस्था में किसलय अवस्था को और अपनी लालिमा को छोड देते है- तब वे हरित अवस्था में आजाते है-अतः इसके लिये कहा गया है कि यह वनखण्ड फिली २ आग में हरा है, और हरे रूप से ही इसका प्रतिभा होता है। यह धनखण्ड सहीं कृष्ण है कहीं नील है कहीं हरित है इत्यादि रूप ले जो कहा गया है उसका कारण उस २ रूप से वहीं २ वह प्रतिमालित होता है यही बात किण्हो किण्हो भासे' आदि पदों द्वारा पुष्ट की गई है जय पत्र अपनी प्रौढावस्था में आते है तब उन से हरीतिभाग का धीरे २ अभाव छोकर शुभ्रता आने लगती है शुभ्रता में शीतलता का अर्थात् शीत बातावान हो जाता है अतः यह वनषण्ड भी उसके योग से कहीं २ 'शीतः शीता वभास' शीतवात स्पर्शवालि है और शीतवात रूपर्शरूप से यह प्रन्यिયુવા અવસ્થામાં કિસલય કુંપળ અવસ્થાને અને પિતાની લાલિમાને છોડી દે છે. ત્યારે તે હરિત અવસ્થામાં આવી જાય છે. તેથી જ એ પ્રમાણે કહેલ છે કે આ વનખંડ કઈ કઈ ભાગમાં લીલાશ વાળા છે. અને લીલાપણાથીજ તેને પ્રતિભાસ થાય છે. આ વનખંડ કયાંક કયાંક કુeણવ વાળા છે કયાંક કયાંક નીલવર્ણ વાળા છે. કયાંક કયાંક હરિત હોય છે ઈત્યાદિ રૂપે જે કથન કરવામાં આવેલ છે. તેનું કારણ એ એ રૂપે ત્યાં ત્યાં તે પ્રતિભાસિત થાય છે. ० पात 'किण्हो किण्होभासे विगेरेयी पुष्ट ४२५ मावस छे न्यारे पान પિતાની પ્રૌઢાવસ્થામાં આવે છે, ત્યારે હરિતપણાનો ધીરે ધીરે અભાવ થઈને તપણું આવવા લાગે છે. શ્વેતપણમાં શીતળતાને અર્થાત્ શીત વાયુનો વાસ થઈ જાય છે. તેથી એ વનખંડ પણ તેના પેગથી કયાંક કયાંક “શીતઃ शीतावभासः' तवायुना २५शवाणी छे भने शीतवायुना २५३३ तेना

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