Book Title: Dravyasangraha
Author(s): Kamalchand Sogani, Shakuntala Jain
Publisher: Apbhramsa Sahitya Academy
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47. दुविहं पि मोक्खहेउं झाणे पाउणदि जं मुणी णियमा।
तम्हा पयत्तचित्ता जूयं झाणं समब्भसह।।
दुविहं
दो प्रकार के
मोक्खहेडं
झाणे
(दुविह) 2/1 वि
अव्यय [(मोक्ख)-(हेउ) 2/1] (झाण) 7/1 (पाउण) व 3/1 सक अव्यय (मुणि) 1/1 (णियम) 5/1 अव्यय [(पयत्त) वि-(चित्त) 5/1]
मोक्ष के कारण को ध्यान द्वारा प्राप्त करते हैं चूँकि
पाउणदि
मुनि
मुणी णियमा
तम्हा
पयत्तचित्ता
नियम से इसलिए अनवरत प्रयास-सहित चित्त से तुम सब ध्यान का
जूयं
झाणं समब्भसह
(जूयं) 1/2 सवि अनि (झाण) 2/1 [(सम)+(अब्भसह)] सम (अ) = खूब अब्भसह (अब्भस) विधि 2/2 सक
खूब अभ्यास करो
अन्वय- जं झाणे मुणी णियमा दुविहं मोक्खहेउं पाउणदि तम्हा जूयं पि पयत्तचित्ता झाणं समब्भसह।
अर्थ- चूँकि ध्यान द्वारा मुनि नियम से दो प्रकार के (निश्चय और व्यवहार रूप) मोक्ष के कारण को प्राप्त करते हैं। इसलिए तुम सब भी अनवरत प्रयास- सहित चित्त से ध्यान का खूब अभ्यास करो।
स
1.
कभी-कभी तृतीया विभक्ति के स्थान पर सप्तमी विभक्ति का प्रयोग पाया जाता है (हे.प्रा.व्या. 3-135)
द्रव्य
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