Book Title: Chetna ka Urdhvarohana
Author(s): Nathmalmuni
Publisher: Adarsh Sahitya Sangh

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Page 150
________________ आकर्षण होता है मन, वचन और शरीर की चंचलता के द्वारा और उनका टिकाव होता है कषाय के द्वारा । वे कषाय के द्वारा बांधकर रखे जाते हैं । कषाय जितना तीव्र होगा उतने ही दीर्घकाल तक कर्म-परमाणु आत्मा के साथ चिपके रहेंगे । कर्म-परमाणुओं को चिपकाये रखना कषाय का काम है और उन्हें आकृष्ट करना चंचलता का काम है । क्या यह हमारा साधना का सूत्र नहीं बन सकता ? क्या यह साधना का आधार नहीं बन सकता ? यह साधना का सूत्र बन सकता है, आधार बन सकता है। हमारी साधना के दो आधार - बिंदु हैं - चंचलता को रोकना और कषाय को कम करना, राग-द्वेष को कम करना । तटस्थ होना, समभाव में रहना, स्थिर रहना - ये ही साधना के दो सूत्र हैं। समूचे कर्मशास्त्र को साधना के संदर्भ में समझें तो दो बातें बहुत ही स्पष्ट हो जाती हैं कि चंचलता के द्वारा कर्म-परमाणु खींचे जाते हैं और कषाय के द्वारा वे टिके रहते हैं और अपना फल देते हैं । फल की तीव्रता और मंदता कषाय के आधार पर होती है । दीर्घकाल की स्थिति और अल्पकाल की स्थिति कषाय के आधार पर होती है । स्थिति और फलदान की शक्ति - ये दोनों कषाय पर निर्भर हैं । कषाय ही कर्म- स्थिति को बढ़ाता - घटाता है और कषाय ही फलदान की शक्ति में तीव्रता या मंदता लाता है । कर्म का आकर्षण केवल चंचलता के आधार पर होता है । 1 कर्म को रोकना है तो हमें उसी क्रम से चलना पड़ेगा कि पहले चंचलता कम होती चली जाये, स्थिरता की मात्रा बढ़ती चली जाये । कायोत्सर्ग इसीलिए किया जाता है कि शरीर की चंचलता कम हो, समाप्त हो । हम श्वास की प्रेक्षा करते हैं, श्वास को मंद करते हैं, श्वास को सूक्ष्म करते हैं, इसीलिए कि चंचलता कम हो जाये । काया की चंचलता कम हो । श्वास काया का ही एक हिस्सा है। वह शरीर से भिन्न नहीं है । शरीर की चंचलता को कम करने के लिए श्वास का संयम करते हैं । मन को स्थिर करने का प्रयत्न करते हैं, निर्विचार और निर्विकल्पना की साधना करते हैं कि चंचलता कम हो । मौन करते हैं ताकि वाणी की चंचलता कम हो । जब वाणी की चंचलता कम होती है, मन की चंचलता कम होती है और शरीर की चंचलता कम होती है तो कर्म-परमाणुओं का आना कम हो जाता है । दूसरी बात है - काया की जो थोड़ी बहुत प्रवृत्ति शेष रहती है, वचन की अल्पमात्रा में प्रवृत्ति शेष रहती है और मन की भी यत्किचित् प्रवृत्ति रहती है, उसके साथ भी आसक्ति न जुड़े, राग-द्वेष का भाव न जुड़े। तटस्थता का विकास हो, समता का विकास हो ताकि अवशिष्ट चंचलता या प्रवृत्ति के द्वारा जो भी कर्म - परमाणु आकृष्ट हों वे लंबे समय तक हमारे साथ न टिक सकें और अपना १३६ : चेतना का ऊर्ध्वारोहण Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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