Book Title: Arhat Vachan 2011 01 04
Author(s): Anupam Jain
Publisher: Kundkund Gyanpith Indore

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Page 21
________________ गांधी ने अपने पत्र में जो लिखा वह मुझे विश्वशांति के लिये मील का पत्थर लगता है ब्रिटिश सत्ता संसार की सबसे अधिक संगठित हिंसात्मक सत्ता है और इसका मुकाबला करने के लिये हम किसी सही उपाय की तलाश कर रहे थे। हमें अहिंसा के रूप में एक ऐसी शक्ति प्राप्त हो गई है जिसे यदि संगठित कर लिया जाए तो संसार भर की सभी प्रबलतम हिंसात्मक शक्तियों के गठजोड़ का मुकाबला कर सकती है। महात्मा गाँधी वर्धा से 24 दिसम्बर 1940 को लिखे अपने इस पत्र में भविष्यवाणी करते हैं कि 'मुझे देखकर आश्चर्य होता है कि वह यह भी नहीं देख पाते कि विनाशकारी यंत्रों पर किसी का एकाधिकार नहीं है। अगर ब्रिटिश लोग नहीं तो कोई और देश निश्चय ही आपके तरीकों से ज्यादा बेहतर तरीका ईजाद कर लेगा और आपके ही तरीकों से आपको नीचा दिखायेगा। इस युगपुरुष के कथनानुसार ही अगस्त 1945 में हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराकर अमेरिका ने हिटलर को हरा दिया। 16 दिसम्बर 1947 को गांधीजी ने फिर लिखा 'एटम बम के इस युग में केवल विशुद्ध अहिंसा ही वह शक्ति है जिससे हिंसा की किसी भी चाल को ध्वस्त किया जा सकता है।' गांधीजी ने अन्ततः न केवल भारत को आजाद करा दिया बल्कि सारे विश्व में एक ऐसी लहर पैदा की जिससे कि ब्रिटिश साम्राज्य आगे चलकर पूरी तरह ध्वस्त हो गया। जैन धर्म एवं महात्मा गांधी की अहिंसा में कोई अंतर नहीं है बल्कि कतिपय कारणोंवश महात्मा जैन धर्म की अहिंसा का पूरी तरह प्रयोग कर ही नहीं पाये । आत्मा और अहिंसा के परिप्रेक्ष्य में ही हम आगे चलकर जैन धर्म तथा वर्तमान समस्याओं की विवेचना का प्रयास करते हैं । आतंकवाद, अलगाववाद और जैन धर्म 'तुम तो बिल्कुल मूर्ख हो' यह सुनते ही अच्छे से अच्छे विचारक का मन रोष से भर जाता है, अतः अगर कोई भी व्यक्ति हिंसा एवं प्रतिहिंसा के द्वारा अपना लक्ष्य प्राप्त करना चाहता है तो हमें अचरज नहीं होना चाहिए। अगर कोई आतंकवादी अपनी जान देकर भी दूसरों को मारता है अथवा कोई अलगाववादी अपने आप को क्रांतिकारी समझकर कत्लेआम करता है तो आम जनमानस भी इन्हें खत्म करने की ही वकालत करता है । जिस साधन के द्वारा हिंसा की प्रचण्ड शक्ति ब्रिटिश सत्ता को मजा चखाया जा सकता है.... क्या उसी अहिंसक जैन साधन के द्वारा आतंकवाद और अलगाववाद को दूर नहीं किया जा सकता है। हिंसा के द्वारा विश्वशांति कभी नहीं पायी जा सकती। यह रूस ने भी देखा और अमेरिका, ईराक और अफगानिस्तान में आकर देख ही रहा है । वस्तुतः हमारे पास अहिंसा के अलावा और कोई चारा ही नहीं बचा है। हम सब अन्याय को तो समाप्त करना चाहते है परंतु हमारी आस्था हिंसा में ही बनी हुई है। हम दरअसल, दूसरे के पक्ष को सुनना ही नहीं चाहते हैं। हम अपने निकट से निकट व्यक्ति के प्रति भी दुर्भाव से भर जाते हैं जब वह हमारे मन के विपरीत कोई आचरण करता है। जबकि जैन धर्म कहता है कि माध्यस्थ भावं विपरीत वृत्तौ अर्थात् दुर्जन क्रूर कुमार्ग रतों पर क्षोभ नहीं मुझको आवे । परंतु हम तो अक्सर अपनों के प्रति भी क्षोभ से भर जाते हैं। एक सच्चा जैन जानता है कि अगर वह छह माह से अधिक समय तक क्रोध, मान, माया अथवा लोभ का भाव बनाये रखता है तो उसका पतन सुनिश्चित है। अगर हम किसी भी घटना के बारे में ठंडे दिमाग से उसके विभिन्न पक्षों को समझें तो हमारा अर्हत् वचन, 23 (1-2), 2011 21

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