Book Title: Arhat Vachan 2011 01 04
Author(s): Anupam Jain
Publisher: Kundkund Gyanpith Indore

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Page 53
________________ तीर्थंकर की घुटनों तक लम्बी भुजाएँ हैं, गोलाकार चौड़े कंधे है । धड़ की संरचना से प्रतिमा का रचनाकाल लगभग छठी शती का उत्तरार्ध प्रतीत होता है ।18 इस तथ्य की पुष्टि प्रतिमा की विशिष्ट शिरोभूषा तथा सिर के दोनों ओर प्रभामण्डल के सम्मुख अंकित उड़ती हुई मालाधारी मानव आकृतियों से होती है। सिर के पीछे वृताकार प्रभामण्डल है जिसके केन्द्र में कमल है तथा उसकी परिधि का बाहरी किनारा गुलाब के छोटे-छोटे फूलों से अलंकृत है। पैरों के समीप दो सेवकों की आंकृतियां अर्धतिष्ठ मुद्रा में अंकित हैं। इनके सिर खण्डित हैं ।19 पन्ना - मध्यप्रदेश के पन्ना जिले में गुप्तकालीन शिवमंदिर के लिये प्रसिद्ध नचना नामक स्थान के समीप सीरा पहाड़ी से गुप्तकालीन जैन प्रतिमाओं का एक समूह प्राप्त हुआ है, जिनमें से कुछ परवर्तीकाल की भी है। तीर्थंकर पद्मासन मुद्रा में अंकित हैं। उनके सिर के पीछे एक विस्तृत प्रभामण्डल है जिसके शीर्ष के निकट दोनों ओर उड़ते हुए गंधर्व युगल अंकित है । तीर्थंकर के पार्श्व में दोनों ओर चमर-धर यक्ष खड़े हुए हैं जो मुकुट पहने हैं और जिसके सामने का अलंकरण कुषाणों के विशेष शिरोभूषण के समान है जिससे इस प्रकार के मुकुटों का विकास हुआ है इन दोनों यक्षों के शरीर विन्यास का अंकन यक्षों और गंधर्वो के गले का आभूषण-एकावली, गंधर्वो का सजीव चित्रण तथा सौंडनी, एहोले आदि से उनकी समानता के कारण इस प्रतिमा का रचना काल लगभग चौथी शताब्दी का उत्तरार्ध अथवा पाँचवी शताब्दी का पूर्वार्ध प्रतीत होता है जो गुप्त शासन का प्रारंभिक काल था। मुकुट पर इसी प्रकार के कला प्रतीक का अंकन उदयगिरि की एक गुफा के विख्यात वराह फलक पर अंकित नाग तथा दो या तीन खड़ी हुई छोटी आकृतियों के शिरोभूषणों में पाया गया है। तीर्थकरों के शीर्ष तथा शरीर के अंकन की मथुरा की लगभग चौथी शताब्दी की प्रतिमाओं से समानता भी तिथि की पुष्टि करती है। पादपीठ के मध्य में धर्मचक्र और उसके दोनों ओर दो छोटे-छोटे सिंह अंकित किए गए हैं । इसी स्थान से प्राप्त आगे वर्णित ऋषभनाथ की खडगासन प्रतिमा के पादपीठ की सादृश्यता के आधार पर कहा जा सकता है कि तीर्थंकर की वह पद्मासन मूर्ति महावीर की है जिस पर उनका परिचय चिन्ह सिंह अंकित है। 20 सीरा पहाड़ी से प्राप्त ऋषभनाथ की खडगासन प्रतिमा के पादपीठ पर धर्मचक्र तथा उसके दोनों ओर दो भक्त अंकित हैं। पुनीत चक्र की परिधि के सामने की ओर से उसी प्रकार अंकित किया गया है, जैसे मथुरा की कुषाणकालीन प्रतिमाओं के पादपीठ पर । साथ ही, इस प्रतिमा के पादपीठ के दोनों सिरों पर विशिष्ट भारतीय वृषभ अंकित है जो ऋषभनाथ का परिचय चिन्ह है । परवर्ती जैन मूर्तियों में सिंह को पादपीठ के दोनों पावों में अंकित किया गया है जो सिंहासन का सूचक है, जबकि बौद्ध मूर्तियों के समान धर्मचक्र के पार्श्व में दोनों ओर दो हरिणों का अंकन है। किन्तु इस प्रतिमा में वृषभ चिन्ह तो इसी प्रकार दर्शाया गया है, किन्तु धर्मचक्र के पार्श्व में हरिण अंकित नहीं है। इससे स्पष्ट है कि यह प्रतिमा उस प्रारंभिक काल की है, जब प्रतिमाओं में परिचय चिन्हों के अंकन का आरंभ ही हुआ था और जब तीर्थंकरों के परिचय हेतु चिन्हों की परिपाटी पूर्णरूपेण निर्धारित नहीं हो पायी थी। इस सादृश्यता के आधार पर तीर्थंकर प्रतिमा को महावीर की प्रतिमा माना जा सकता है । 21 इन दोनों मूर्तियों की शैली शास्त्रीय गुप्त शैली के विशिष्ट कुषाण-प्रकारों से पलायन की सूचक है किन्तु तीर्थंकर महावीर की प्रतिमा एक सुंदर कलाकृति है, जिसमें विशेष रूप से मुखाकृति का अंकन अत्यंत उत्कृष्टता के साथ किया गया है। इसी स्थान से उपलब्ध और इसी काल की, संभवतः इससे कुछ पहले की एक अन्य कार्योत्सर्ग प्रतिमा है पार्श्वनाथ की। वस्त्र, विन्यास रहित इस प्रतिमा में तीर्थंकर अर्हत् वचन, 23 (1-2), 2011 53

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