Book Title: Arhat Vachan 2011 01 04
Author(s): Anupam Jain
Publisher: Kundkund Gyanpith Indore

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Page 59
________________ _ अर्हत् वचन वर्ष - 23, अंक - 1-2, जनवरी-जून 2011, 59-64 सणकहरयणकरंडु पाण्डुलिपि : एक परिचय - धर्मेन्द्र जैन* कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ, इन्दौर I kj ka k प्राकृत भाषा का ही विकसित सरल रूप अपभ्रंश भाषा है। इसका साक्षात् सम्बन्ध हिन्दी भाषा से है तथा पश्चिमोत्तर भारत की अन्य भाषाओं का स्रोत भी यही अपभ्रंश भाषा मानी जाती है। 7वीं शताब्दी के बाद अपभ्रंश भाषा में विपुल साहित्य लिखा जाने लगा था। 10वीं से 17वीं शताब्दी तक तो साहित्य की अनेक विधाओं में अपभ्रंश भाषा के साहित्य का सृजन हुआ। पिछले 200 वर्षों में अपभ्रंश साहित्य के लेखन, पठन-पाठन की परम्परा लुप्तप्राय हो गई थी। तब डॉ. हर्मन जैकोबी, रिचर्ड पिशेल, पिटर्सन, डॉ. आल्सडॉर्फ एवं डॉ. गुणे, पी.एल. वैद्य, डॉ. हरिवल्लभ भायाणी, डॉ. हीरालाल जैन आदि देशीय एवं वैदेशिक विद्वानों ने वर्तमान में अपभ्रंश जगत् में अध्ययन/अनुसंधान/सम्पादन की क्रान्ति उत्पन्न की थी। इस क्रान्ति-सूर्य की कुछ किरणें विकीर्ण हुई किन्तु, आज भी प्राकृत-अपभ्रंश के कई प्राचीन ग्रन्थों का अध्ययन/अनुसन्धान/सम्पादन शेष है। यह कार्य अनेक शताब्दियों की अपेक्षा रखता है। प्राकृत-अपभ्रंश की हजारों पाण्डुलिपियाँ अभी ग्रन्थ भण्डारों में हैं, जिनका सम्पादन/अनुवाद शेष है। सम्पादन/अनुवाद तो बहुत दूर की बात है, किन्तु प्राकृत, अपभ्रंश पाण्डुलिपियों की अद्यावधि एक व्यवस्थित अनुक्रमणिका भी तैयार नहीं है। गुजरात और राजस्थान में प्राकृत-अपभ्रंश भाषा की सर्वाधिक पाण्डुलिपियाँ हैं। राजस्थान के जयपुर शहर में भी प्राकृत-अपभ्रंश की सैंकड़ों असम्पादित दुर्लभ पाण्डुलिपियाँ विद्यमान हैं। पाण्डुलिपियों की खोज में एक दसणकहरयणकरंडु नामक पाण्डुलिपि की अनेक प्रतियाँ जयपुर के अनेक भण्डारों में विद्यमान हैं। यह ग्रन्थ जैनपरम्परानुसार श्रावक की आचार संहिता का विस्तार से वर्णन करता है। आचार संहिता परक ग्रन्थ होने पर भी इसमें काव्यात्मक गुणवत्ता है। अतः इसे काव्य कोटि का ग्रन्थ कहा जा सकता है। दसणकहरयणकरंडु ग्रन्थ दर्शनशास्त्र, आचार शास्त्र एवं भारतीय जीवनमूल्यों की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। प्राकृत भाषा का ही विकसित सरल रूप अपभ्रंश भाषा है। इसका साक्षात् संबंध हिन्दी भाषा से है तथा पश्चिमोत्तर भारत की अन्य भाषाओं का स्रोत भी यही अपभ्रंश भाषा मानी जाती है। 7वीं शताब्दी के बाद अपभ्रंश भाषा में विपुल साहित्य लिखा जाने लगा था। 10वीं से 17वीं शताब्दी तक तो अपभ्रंश साहित्य की अनेक विधाओं में * विकास प्राधिकारी (प्राकृत) राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान, जयपुर - परिसर, त्रिवेणी नगर, जयपुर-302018

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