Book Title: Arhat Vachan 2011 01 04
Author(s): Anupam Jain
Publisher: Kundkund Gyanpith Indore

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Page 126
________________ आख्या पुष्पगिरि में विद्वत् सम्मेलन सम्पन्न श्रीमद जिनेन्द्र पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव, पुष्पगिरि (सोनकच्छ) में दिनांक 18 जनवरी 2011 को आचार्य श्री पुष्पदन्तसागरजी की प्रेरणा एवं पूज्य मुनि श्री पुलकसागरजी के मार्गदर्शन में विद्वत् सम्मेलन आयोजित किया गया। वरिष्ठ विद्वान पं. खेमचन्द जैन (कार्याध्यक्ष-तीर्थंकर ऋषभदेव जैन विद्वत् महासंघ) जबलपुर की अध्यक्षता एवं युवा विद्वान तथा तीर्थंकर ऋषभदेव जैन विद्वत् महासंघ के महामंत्री डॉ. अनुपम जैन के संयोजकत्व में आयोजित इस सम्मेलन में मुख्य अतिथि के रूप में पंडिताचार्य स्वस्ति श्री भट्टारक चारुकीर्ति स्वामीजी मूडबिद्री उपस्थित रहे। 'पुष्पगिरि तीर्थ एवं जनकल्याणकारी योजनाएं' शीर्षक केन्द्रीय विषय पर बाहर से पधारें विद्वानों डॉ. देवकुमार जैन-रायपुर, डॉ. सुशील जैन-मैनपुरी, डॉ. संजीव सराफ-वाराणसी, डॉ. सविता जैन-उज्जैन, पं. अशोक शास्त्री-दिल्ली, पं. वृषभसेन जैन-सांगली, पं. चन्द्रकांत गुन्डप्पा-कर्नाटक, पं. पारस उपाध्याय-कोल्हापुर ने अपने विचार व्यक्त किये। इंदौर से श्री जयसेन जैन, श्री रमेश कासलीवाल, श्रीमती सुमन जैन, श्रीमती उषा पाटनी, डॉ. संगीता विनायका, श्री अभय बाकलीवाल एवं डॉ. सुरेखा मिश्रा भी उपस्थित रहीं। मंच पर आचार्य श्री पुष्पदंतसागरजी आचार्य श्री कुमुदनन्दीजी, आचार्यश्री गुप्तिनंदीजी एवं आचार्यश्री पुष्पदंतसागरजी के शिष्यगण (मुनिराज) विराजमान थे। वक्ताओं ने आचार्य श्री पुष्पदन्त सागरजी की प्रेरणा से संचालित हो रही 27 जनकल्याणकारी योजनाओं की चर्चा करते हुए इस बात को रेखांकित किया कि यह तीर्थ शिक्षा, स्वास्थ्य एवं मानव कल्याण की योजनाओं के कारण धार्मिक आस्था के केन्द्र के अतिरिक्त जनजागरण एवं संस्कृति संरक्षण का केंद्र भी बनेगा। मुनिश्री पुलकसागरजी महाराज की प्रेरणा से बनाये गये वात्सल्य धाम की मुक्त कंठ से प्रशंसा करते हुए वक्ताओं ने कहा वे दिन दूर नहीं जब इस संस्था से जैन समाज के बच्चे आई.ए.एस डॉक्टर और इंजीनियर बनकर निकलेंगे। वक्ताओं ने आचार्य श्री से आग्रह किया कि संस्कृति के संरक्षण एवं जैन साहित्य के अध्ययन एवं अनुसंधान की योजनाओं को प्राथमिकता के आधार पर पूर्ण करायें क्योंकि आज विश्व में जैन साहित्य की विशेषतः मूल परम्परा के साहित्य की उपेक्षा हो रही है । इसके फलस्वरूप अनुसंधानकर्ताओं विशेषत: विदेशी विद्वानों को मूलपरम्परा के साहित्य के बारे में त्रुटित, दोषपूर्ण एवं पूर्वाग्रह के साथ लिखी गई जानकारियाँ ही मिलती हैं। हमारे आचार्यों के काल , कृतित्व एवं अवदान के बारे में सम्यक जानकारी नहीं मिल पा रही है। इस बारे में पुष्पगिरि तीर्थ को ध्यान देना चाहिये। पूज्य आचार्य श्री ने विद्वानों का आव्हान किया कि वे निरन्तर इस क्षेत्र पर आवागमन बनाये रखें और अपने सुझाव भी मुझे देते रहें। सभी अच्छे सुझावों का सदैव स्वागत है। आपने कहा आलोचनाओं की तो मैं परवाह नहीं करता किन्तु अच्छे कार्यकर्ताओं और विद्वानों का सदैव सम्मान करता हूँ। समागत सभी विद्वानों का प्रशस्ति पत्र, प्रतीक चिन्ह, शाल एवं पगड़ी से सम्मान किया गया। पूज्य आचार्य श्री का वात्सल्यपूर्ण आशीर्वाद सभी विद्वानों को मिला। डॉ. अनुपम जैन 126 अर्हत् वचन, 23 (1-2), 2011

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