Book Title: Arhat Vachan 2011 01 04
Author(s): Anupam Jain
Publisher: Kundkund Gyanpith Indore

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Page 127
________________ गतिविधियाँ वैशाली संस्थान में डॉ. गुलाबचन्द्र चौधरी स्मारक व्याख्यानमाला प्राकृत, जैनशास्त्र और अहिंसा शोध संस्थान, वैशाली में डॉ. गुलाबचन्द्र चौधरी स्मारक व्याख्यानमाला का आयोजन 20 नवम्बर 2010 को किया गया, जिसका प्रारम्भ संस्थान की व्याख्याता डॉ. मंजुबाला के मंगलाचरण-णमोकार मंत्र एवं सरस्वती वन्दना से हुआ। तत्पश्चात् समागत अतिथियों द्वारा दीप प्रज्जवलित कर व्याख्यानमाला का विधिवत् उद्घाटन किया गया । इसकी अध्यक्षता डॉ. रवीन्द्र कुमार सिंह अध्यक्ष, दर्शन विभाग, भीमराव अम्बेडकर बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर ने की । संस्थान के निदेशक ने समागत अतिथियों का माल्यार्पण द्वारा स्वागत किया। इसके बाद अध्यक्ष द्वारा वर्ष-2008 में प्राकृत और जैनशास्त्र' विषय में प्रथम श्रेणी में प्रथम स्थान प्राप्त करने वाले संस्थान के छात्र श्री रत्नाकर शुक्ल को 'श्रीमती तुलसादेबी गोरेलाल जैन चेरिटेबल ट्रस्ट, नागपुर' की ओर से प्रवर्तित 'प्रो. भागचन्द्र पुष्पलता जैन स्वर्ण पदक' प्रदान किया गया। व्याख्यानमाला को सम्बोधित करते हुए डॉ. श्रीयांश कुमार सिंघई आचार्य एवं अध्यक्ष, जैन दर्शन विभाग, राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान (मानित विश्वविद्यालय), जयपुर ने 'पवयणपाहुड में श्रमण' विषय पर व्याख्यान दिया, उन्होंने प्रवनचसार जैसे गूढ़ ग्रन्थ के सन्दर्भ में श्रमण के यथार्थ स्वरूप को स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि जिस कार्य को करने में आनन्द मिलता है वह कार्य अच्छा होता है। इसी आधार से हमें अच्छे बुरे का विवेकपूर्वक निर्धारण करना चाहिए। अध्यक्षीय वक्तव्य में डॉ. रवीन्द्र कुमार सिंह ने कहा कि वक्ता ने अपने व्याख्यान में मानव जीवन का निहितार्थ बता दिया है। यदि हम आज के इस व्याख्यान से थोड़ा भी ग्रहण कर सके तो जीवन सार्थक हो जायेगा। संस्थान में ऐसे व्याख्यानों के आयोजनों से मानवमात्र का भला होगा। अन्त में संस्थान के निदेशक डॉ. ऋषभचन्द्र जैन ने सभी आगत अतिथियों के प्रति आभार व्यक्त किया। डॉ. जिनेन्द्र जैन को 'विक्रम कालिदास राष्ट्रीय पुरस्कार' जैन विश्वभारती विश्वविद्यालय, लाडनूं के संस्कृत एवं प्राकृत विभाग के एशोसिएट प्रोफेसर एवं महावीर पथ-पत्रिका के प्रधान सम्पादक डॉ. जिनेन्द्र जैन को विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन में आयोजित कालिदास समारोह में 'विक्रम कालिदास राष्ट्रीय पुरस्कार 2010' से सम्मानित किया गया। डॉ. जैन को यह पुरस्कार कालिदास समारोह में प्रस्तुत शोध आलेख 'कालिदास के संस्कृत नाटकों में प्रयुक्त प्राकृत भाषा का वैशिष्टय' पर दिया गया । पुरस्कार स्वरूप प्रशस्ति पत्र, स्मृति चिन्ह, अंगवस्त्र एवं पुरस्कार राशि प्रदान की गयी। इससे पहले डॉ. जैन को राजस्थान सरकार एवं अनेकों सामाजिक संस्थाओं के साथ-साथ श्री महावीरजी द्वारा प्रवर्तित 2005 का ब्र. पूरणलता ऋद्धि पुरस्कार उनकी मौलिक कृति 'जैन काव्यों का दार्शनिक मूल्यांकन' के लिए प्रदान किया जा चुका है। ज्ञातव्य है कि डॉ. जैन 10 पुस्तकों तथा करीब 150 शोध आलेखों का लेखन करने के साथ-साथ कई पत्र-पत्रिकाओं के सम्पादक मण्डल के सदस्य एवं सम्पादक हैं। ज्ञातव्य है कि डॉ. जिनेन्द्र जैन प्रो. प्रेमसुमन जैन, उदयपुर के शिष्य एवं कर्मठ युवा विद्वान है। अर्हत् वचन, 23 (1-2),2011 127

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