Book Title: Arhat Vachan 2011 01 04
Author(s): Anupam Jain
Publisher: Kundkund Gyanpith Indore

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Page 122
________________ EVM ATH प्रथमाचार्य चारित्रचक्रवर्ती शांतिसागर वर्ष प्रसंग संस्कृति संरक्षण हेतु इतिहास का ज्ञान जरूरी -सूरजमल बोबरा परमपूज्य गणिनीप्रमुख आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी की अधिकारी आमा प्रेरणा से सम्पूर्ण देश में मनाये जा रहे Pangenज्ञानपी इन्दौर, 1.12. प्रथमाचार्य चारित्रचक्रवर्ती शांतिसागर वर्ष में कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ व्याख्यान का आयोजन दिनांक 1 दिसम्बर 2010 को रात्रि 8.00 बजे किया गया । इसकी अध्यक्षता दर्शन शास्त्र के उद्भट विद्वान प्रो. गोकुलचन्द जैन-वाराणसी ने की। डॉ. सुनीता जैन द्वारा मंगलाचरण में संबोधित करते हुए श्री बोबरा जी, मंचासीन डॉ. विनायका एवं डॉ. सुनीता जैन गोम्मटेशथुदि के सस्वर पाठ के बाद डॉ. अनुपम जैन ने आचार्य श्री के जीवन पर प्रकाश डाला। मुख्य वक्ता श्री सूरजमल बोबरा ने जैन इतिहास के पक्षों पर विस्तृत प्रकाश डालते हुए कहा कि जब भारत का भौगोलिक, ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक इतिहास लिखा जा रहा था तब जैन इतिहास से संबंधित तथ्यों की घोर उपेक्षा हुई। जैन पुराणों एवं अन्य जैन साहित्य में उपलब्ध संदर्भो को न कोई महत्व दिया गया और न कोई विश्लेषण किया गया। इसी कारण आज जैन इतिहास बहुत विश्रृंखलित है। जैन धर्म और इतिहास के विद्यार्थी टूटी कड़ियों को न जोड़ पाने के कारण ही तीर्थंकर परम्परा को कपोल कल्पित बताने लगते हैं। जबकि केवल महावीर ही नहीं पार्श्वनाथ और नेमिनाथ के ऐतिहासिक और साहित्यिक प्रमाण जैनेतर साहित्य में आज भी मिल रहे हैं। क्या कारण है कि भगवान आदिनाथ के बाद 20 तीर्थंकरों ने सम्मेदशिखर को ही मोक्ष प्राप्ति की साधना हेतु उपयुक्त पाया ? इन तीर्थंकरों के काल में सम्मेदशिखर का स्वरूप क्या था ? ऋषभनिर्वाण भूमि अष्टापद क्या आदिनाथ के काल में भी इसी प्रकार थी? आचार्य श्री विद्यानंद जी महाराज ने बताया कि भगवान महावीर के समय इस देश में जैन धर्मावलम्बियों की संख्या 4 करोड़ से अधिक थी। फिर जैन धर्म का इतना ह्रास क्यों हो गया? इन सब बिन्दुओं पर अनुसंधान के साथ ही 20वीं शती में आचार्य शांतिसागरजी द्वारा पुनर्व्यवस्थित की गई श्रमण परम्परा के अवदान और इतिहास को भी सही तरीके से संजोये जाने की जरूरत है। कार्यक्रम में प्रो. प्रेमसुमन जैन-उदयपुर, डॉ. सरोज जैन-उदयपुर, डॉ. देवकुमार जैन-रायपुर, डॉ. सुशील सालगिया, श्रीमती रेखा पतंग्या, श्रीमती उषा पाटनी, डॉ. प्रगति जैन, डॉ. मनीषा जैन, श्रीमती समता जैन, डॉ. सरोज कोठारी, श्रीमती समता जैन, श्री सुभाष भाचावत, श्री तरुण जैन, श्री तरीन मेहता, श्री अरविंद जैन, श्री माणकचंद जैन, श्राविकाश्रम की बहनें एवं उदासीन आश्रम के भैय्याजी आदि उपस्थित रहे। कार्यक्रम का सशक्त संचालन डॉ. संगीता विनायका ने किया एवं आभार माना डॉ. सुरेखा मिश्रा ने। 122 अर्हत् वचन, 23 (1-2), 2011

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