Book Title: Arhat Vachan 2011 01 04
Author(s): Anupam Jain
Publisher: Kundkund Gyanpith Indore

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Page 121
________________ पुरस्कार समर्पण समारोह तर कित्सा प्रो. प्रेमसुमन जैन कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ पुरस्कार-2009 से सम्मानित देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इन्दौर के अंतर्राष्ट्रीय शोध केन्द्र 2 दिसम्बर 2010 कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ, इन्दौर द्वारा देश का प्रतिष्ठित कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ पुरस्कार - 2009 राष्ट्रीय प्राकृत अध्ययन एवं संशोधन संस्थान, श्रवणबेलगोला के निदेशक प्रो. प्रेमसुमन जैन को प्रदान किया गया। प्रो. जैन को यह पुरस्कार प्राकृत भाषा के अध्ययन, अनुसंधान तथा पर्यावरण संरक्षण के प्रति जैनाचार्यों के योगदान के प्रचार-प्रसार हेतु प्रदान किया गया। प्रो. प्रेमसुमन जैन को पुरस्कार समर्पण का दृश्य ज्ञातव्य है कि प्रो. जैन अनेक वर्षों तक मोहनलाल सुखाडिया विश्वविद्यालय-उदयपुर में प्राकृत एवं जैन विद्या विभाग के विभागाध्यक्ष के रूप में अपनी सेवाएं प्रदान कर चुके हैं। प्रो. प्रेमसुमन जैन ने इस अवसर पर कहा कि जैन आगमों की मूल भाषा प्राकृत है। अतः प्राकृत के अध्ययन और अनुसंधान के अभाव में न तो इतिहास सुरक्षित रखा जा सकता है और न संस्कृति। जैन शास्त्र भण्डारों में पाण्डुलिपि के रूप में संग्रहीत जैनाचार्यों की अथाह ज्ञान राशि को प्रकाश में लाने हेतु प्राकृत भाषा का अध्ययन अनिवार्य है। मुझे यह कहते हुए प्रसन्नता है कि श्रवणबेलगोला के संस्थान द्वारा संचालित पत्राचार पाठ्यक्रम का एक प्रमुख केन्द्र कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ है। इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में अपने उद्गार व्यक्त करते हुए इंजी.श्री एस.के. जैन ने कहा कि मैं जबसे कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ से जुड़ा हूँ , इसकी गतिविधियां निरन्तर बढ़ रही हैं, जो संतोष का विषय है। फ्लोरिडा अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय, मियामी के निदेशक प्रो. नेथन केट्ज के आगमन के साथ इस शोध केन्द्र की गतिविधियों को अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान करने की दृष्टि से एक नया सूत्रपात हुआ है। जो जैन संस्कृति की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। आज जरूरत इस बात की है कि आधुनिक संचार साधनों, इंटरनेट आदि का प्रयोग कर संस्कृति का प्रचार-प्रसार किया जाये। उच्चशिक्षा विभाग के इंदौर-उज्जैन संभाग के अति. संचालक डॉ. नरेन्द्र धाकड़ ने कहा कि 'सम्प्रदायगत मतभेदों, क्रियाकाण्डों एवं वैचारिक संकीर्णताओं से ऊपर उठकर भारतीय संस्कृति विशेषतः जैन संस्कृति के अध्ययन, अनुसंधान कार्य में कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ का योगदान प्रशंसनीय है। उन्होंने प्राकृत भाषा के प्रचार में प्रो. प्रेमसुमन जैन द्वारा प्रदत्त योगदान की प्रशंसा की। स्वागत भाषण संस्थाध्यक्ष डॉ.अजित कासलीवाल ने दिया तथा कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ की बहुआयामी गतिविधियों तथा अब तक की उपलब्धियों की जानकारी संस्था सचिव डॉ. अनुपम जैन ने दी। मंच पर पं. रतनलाल जैन, श्रीमती आशा सोनी (पार्षद), डॉ. देवकुमार जैन-रायपुर, डॉ. गोकुलचंद जैन-वाराणसी, प्रो. श्रेणिक बण्डी, श्री सूरजमल बोबरा आदि की उपस्थिति उल्लेखनीय रही। अतिथियों का स्वागत श्री होलास सोनी, डॉ. सुरेखा मिश्रा, श्री अरविन्द कुमार जैन, श्री माणकचंद जैन आदि ने किया। मंगलाचरण श्रीमती सुलोचना बड़जात्या ने किया तथा मेरी भावना का पाठ वीर निकलंक के सम्पादक श्री रमेश कासलीवाल ने किया। आभार माना ट्रस्टी श्री प्रदीप कासलीवाल ने। अर्हत् वचन, 23 (1-2),2011 121

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