Book Title: Arhat Vachan 2011 01 04
Author(s): Anupam Jain
Publisher: Kundkund Gyanpith Indore

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Page 111
________________ संक्षिप्त आख्या अर्हत वचन कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ, इन्दौर I.C.T.M.-2010 हस्तिनापुर, 30-31 अक्टूबर 2010 * अनुपम जैन* शोभित विश्वविद्यालय, मेरठ द्वारा दिगम्बर जैन त्रिलोक शोध संस्थान, हस्तिनापुर द्वारा विकसित आधारभूत संरचनाओं (भवन, पुस्तकालय आदि) का उपयोग करते हुए दिगम्बर जैन त्रिलोक शोध संस्थान, जम्बूद्वीप, हस्तिनापुर के परिसर में स्थापित गणिनी ज्ञानमती शोधपीठ केन्द्र पर I.C.T.M. - 2010 (International Conference on Indian Civilization through Millenia) अर्थात 'सहस्राब्दियों में भारतीय सभ्यता'2010 शीर्षक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन 30-31 अक्टूबर 2010 को किया गया। जैन समाज की सर्वोच्च साध्वी, गणिनी प्रमुख, आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी एवं उनके संघ की मांगलिक उपस्थिति से सम्पूर्ण सम्मेलन को अत्यन्त गरिमा प्राप्त हुई। इस सम्मेलन के 5 अकादमिक सत्रों में 56 आमंत्रित व्याख्यानों / शोध पत्रों की प्रस्तुति दी गई। सम्मेलन के अवसर पर पढ़े जाने वाले आलेखों की विस्तृत आख्या (Proceedings) का विमोचन भी उदघाटन सत्र में कराकर इसका प्रतिभागियों में वितरण किया गया। इस आख्या में 4 खण्डों में 68 शोधपूर्ण आलेखों का प्रकाशन किया गया है। सम्मेलन के विभिन्न सत्रों का सत्रवार विवरण निम्नवत् है। 30.10.2010, प्रातः 11.00 बजे, उद्घाटन सत्र :मुख्य अतिथि : कुँवर शेखर विजेन्द्र, प्रतिकुलाधिपति-शोभित वि.वि., मेरठ अध्यक्षता : प्रो. अनूप स्वरूप, कुलपति-शोभित वि.वि., मेरठ वि. अतिथि : डॉ. आकाश आउची, जापानी विद्वान संचालन : डॉ. अनुपम जैन, निदेशक-गणिनी ज्ञानमती शोधपीठ, हस्तिनापुर प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चन्दनामती माताजी ने सरस्वती स्तोत्र के सस्वर पाठ से सम्मेलन का शुभारम्भ किया। स्वागत भाषण दिया सम्मे के संयोजक प्रो. सुरेश चन्द्र अग्रवाल, मेरठ ने। आपने शोभित विश्वविद्यालय की उपलब्धियों एवं गतिविधियों का संक्षिप्त परिचय भी दिया। कर्मयोगी ब्र. रवीन्द्र कुमार जैन ने संस्थान एवं शोधपीठ का परिचय देते हुए इस शांत, सुरम्य परिसर में सभी का स्वागत किया। विशिष्ट अतिथिजापान स्थित शोकागकाई इंटरनेशनल से पधारें डॉ.आकाशआउची ने कहा कि हस्तिनापुर से महाभारत की पहचान जुड़ी है। वेद, उपनिषद और पुराणों में भारतीय सभ्यता के तत्त्व मौजूद हैं। बौद्ध धर्म भारत में ही जन्मा और चीन होते हुए जापान पहुंचा। सम्मेलन की विषय वस्तु का परिचय देते हुए सत्र के अध्यक्ष कुलपति प्रो. अनूप स्वरूप ने कहा कि हमारा उद्देश्य भारतीय सभ्यता के प्रति जन-जन में जागृति पैदा करना है। उन्होंने कहा कि भारत देश में हिन्दू, जैन, बौद्ध,पारसी, सिख, इसाई आदि अनेक संस्कृतियों का समागम एक साथ मिलता है तथा हर धर्म व समाज की प्राचीन सभ्यता इस देश से जुड़ी हुई है। अतः हमें वर्तमान में भारतीय सभ्यता पर समाज के बीच जागृति लाने की आवश्यकता है। मुख्य अतिथि कुंवर शेखर विजेन्द्रजी ने कहा कि एक मंच पर विभिन्न विधाओं के विद्वानों को विभिन्न सभ्यता एवं संस्कृतियों पर अपने शोध से परिचित कराने का अवसर प्रदान करने हेतु यह सम्मेलन आयोजित है। सभी शिक्षाविद् अपने ज्ञान को समाज के मध्य आसानी से पहुंचा सकें और समाज में संस्कृति और सभ्यता के प्रति रुचि व चेतना जागृत हो सके, यही इसका उद्देश्य है। ___ गणिनीप्रमुख, आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी ने कहा कि इस युग में भारतीय संस्कृति का उद्भव जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव के साथ हुआ है। आपने कहा कि भगवान ऋषभदेव के पुत्र भरत के नाम पर ही इस देश का नाम भारत पड़ा है। हस्तिनापुर का उल्लेख करते हुए आपने कहा कि इस भूमि पर करोड़ों वर्ष पूर्व भगवान ऋषभदेव ने राजा श्रेयांस के करकमलों से प्रथम आहार ग्रहण किया था पुनः तीन तीर्थंकर भगवान शांति-कुंथु-अरहनाथ का जन्म भी इस हस्तिनापुर नगरी में ही हुआ। इस अवसर पर आपने अर्हत् वचन, 23 (1-2), 2011 111

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