Book Title: Arhat Vachan 2011 01 04
Author(s): Anupam Jain
Publisher: Kundkund Gyanpith Indore

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Page 106
________________ 6. समय ने करवट बदली, अन्य व्यापार की तरह मांस और चमड़े के व्यापार का भी अब वैश्वीकरण हो गया है। बूचड़खाना आज स्थानीय मांग के अतिरिक्त भी लाभ देने वाला एक बड़ा व्यापार बन गया है। दूसरी तरफ आधुनिक कृषि और शहरी परिवेश में पशुओं की उपयोगिता सीमित हो गई है। यूरोप की तर्ज पर भारतवर्ष में भी सरकारी सोच के अनुसार गौवंश की उपयोगिता दूध ओर मांस के लिए ही रह गयी है। पंचगव्य और ड्रॉट एनिमल पॉवर का उपयोग और क्षेत्र सिकुड़ गया है। 7. ऐसी परिस्थितियों में हमारा दुर्भाग्य यह रहा कि समय के साथ-साथ हम अहिंसा प्रेमी, पशु प्रेमी, गौ प्रेमी और जीवदया प्रेमी समुदाय के लोग भावनात्मक कार्य पद्धति वाली उसी पुरानी मानसिकता से आज भी इन क्षेत्रों में कार्यरत है, जबकि आज की आवश्यकता प्रोफेशनल कार्यशैली की है। 8. आज कारपोरेट का जमाना है। नीरा राडिया प्रकरण के बाद अब कारपोरेट लॉबिंग की ताकत को पूरा देश जान चुका है। देश में ताकतवर मांस लॉबी, मांस निर्यात लॉबी, चर्म उद्योग लॉबी, फर्टिलाइजर लॉबी, पाल्ट्री लॉबी, सी फूड लॉबी और न जाने कौन-कौन सी लॉबी काम कर रही है जो हमारे गौवंश संरक्षण संवर्द्धन के क्षेत्र के सबसे बड़े रोड़े है। उनकी सरकारी तन्त्र पर पकड़ हमसे बहुत अधिक है। वे अधिकारियों व विशेषज्ञों की सोच को प्रभावित करने के लिए हर हथकण्डे प्रयोग में लाते हैं। उनके पास आर्थिक ताकत है तथा उनकी प्रोफेशनल कार्यशैली है। 9. इन परिस्थितियों में हमें भी अपनी कार्यशैली में बदलाव लाना जरुरी है। मात्र सरकार को कोसते रहना या व्यवस्था को दोषी करार कर देना पर्याप्त नहीं है। 10. देश में कुल पशुधन सन् 2003 के आंकड़ों के अनुसार 46 करोड़ 44 लाख था जिनमें 15 करोड़ 68 लाख देशी गौधन, 2 करोड़ 20 लाख विदेशी गौधन अर्थात कुल 17 करोड़ 88 लाख देश में कुल गौधन था। 11. देश में करीब दो करोड़ गौवंश का प्रतिवर्ष बूचड़खानों में कत्ल होता है। अर्थात 55 से 60 हजार गौधन प्रतिदिन । अन्य पशुओं के कत्ल के आंकड़े इनके अतिरिक्त है। 12. देश में अधिकृत करीब तीन हजार गौशालाएं हैं, जहां अन्दाजन 30 लाख गौवंश को संरक्षण प्राप्त 13. गौशालाओं की क्षमता पिछले 25-30 वर्षों में दो गुना से ज्यादा नहीं बढ़ पाई है। 14. गौशालाओं में करीब तीन हजार करोड़ रुपया प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष प्रतिवर्ष खर्च बैठता है। प्रति गाय दस हजार रुपये प्रतिवर्ष के हिसाब से। कोर्ट कचहरी के, कत्लखाने विरोध आंदोलन के एवं अन्य खर्च अतिरिक्त 15. अधिकांश गौशाला खर्च जीवदया प्रेमी बंधुओं के आर्थिक सहयोग से ही पूरा होता है। 16. विचारणीय तथ्य यह है कि हमारी सामाजिक क्षमता 30 लाख गौ-संरक्षण तक सीमित है और कटने वाले गौवंश के आंकड़े है दो करोड़ गौधन प्रतिवर्ष । 17. क्या हम इतनी बड़ी संख्या में कटने वाले पशुओं को बचा पाने में सक्षम है ? क्या हमने सार्थक समाधान ढूँढने की दिशा में कोई बड़ी पहल की है ? क्या इसका कोई फार्मूला हमारे पास है? 18. हमारा प्रयास वैसा ही है जैसे पत्ते और टहनी की देखभाल करना, जबकि सम्पूर्ण जड़ ही खतरे में है, आज तो गाय के अस्तित्व पर ही खतरा मंडरा रहा है। असल में हम मूल समस्या की अनदेखी कर रहे हैं। हमारी सारी शक्ति - श्रम और संसाधन, मात्र भावनात्मक संतुष्टि हेतु कुछ पशुओं को प्रत्यक्ष अभय देने में ही समाप्त हो रही है। 19. हम अधिकांश लोग व्यापारी समाज में हैं। हम अपने व्यापार का प्रतिवर्ष हानि-लाभ का हिसाब बनाते है। उसका आकलन करते है। हमें अपने गौरक्षा अभियान का भी ऐसा ही एक आकलन तैयार करना चाहिए। देश स्वाधीनता के इन 64-65 वर्षों में उस महान आंदोलन के हानि-लाभ का क्या हिसाब-किताब है? स्थिति 106 अर्हत् वचन, 23 (1-2), 2011

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