Book Title: Arhat Vachan 2011 01 04
Author(s): Anupam Jain
Publisher: Kundkund Gyanpith Indore

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Page 107
________________ क्यों बद से बदतर हुई है ? क्या हमें अपनी स्ट्रेटेजी में समय की मांग के अनुसार बदलाव नहीं लाना चाहिए? 20. वर्तमान में हमारी सारी शक्ति मात्र निम्न कार्यों में ही अधिक व्यय हो रही है - * गौशाला चलाने में, अकाल के वक्त चारा व्यवस्था करने में * बूचड़खाना जाती गायों को पकड़ने, संरक्षण देने और कोर्ट कचहरी करने में। * बूचड़खाने के निर्माण का विरोध करने में । आईये, अब हम कुछ करणीय कार्य तथा सुझावों की चर्चा करते हैं : 1. हमें राज्यवार स्थिति की समीक्षा करके उसके अनुसार अलग-अलग स्ट्रेटेजी बनाकर कार्य करना चाहिए। गुजरात और राजस्थान की स्थिति अलग है, बंगाल, पूर्वोत्तर राज्य और दक्षिण के तमिलनाडु व केरल की भिन्न स्थिति है। राज्यवार प्रति व्यक्ति दूध और मांस के खपत के आंकड़ों से इसे ठीक से समझा जा सकता है। गुजरात और राजस्थान में जहां प्रति व्यक्ति, प्रति माह मांस उत्पाद पर खर्च मात्र दस रुपये है वहीं पश्चिम बंगाल, केरल और पूर्वोत्तर राज्यों में यह सौ-सवा सौ रुपया है । इसके अतिरिक्त जल, कृषि, भूमि, पशु उपलब्धता व अन्य स्थितियां भी हर राज्य की भिन्न-भिन्न है, अतः सब राज्यों के लिए एक सी कार्य योजना कारगर नहीं हो सकती। 2. सम्पूर्ण गौशाला व्यय के एक शतांश का कम से कम दसवां भाग अर्थात् करीब तीन करोड़ रुपया प्रतिवर्ष प्रोफेशनल ढंग से कार्यरत समग्र सोच वाले व्यक्तियों के नेतृत्व में कलकत्ता, दिल्ली, मुम्बई सदृश शहरों में सम्पूर्ण साधन सम्पन्न कार्यालय खर्च हेतु प्रावधान करना आज समय की जरूरत है। 3. कार्यालय व्यय की उपयोगिता और प्रासंगिकता को ठीक से समझना बेहद जरूरी है। 4. इन कार्यालयों का कार्य देशव्यापी कार्यकर्ताओं की नेटवर्किंग स्थापित करना, सम्पूर्ण तथ्यगत आंकड़ों की सूक्ष्म समीक्षा करना, डाटा बैंक का कार्य करना तथा योजना आयोग स्तर पर, विशेषज्ञों के स्तर पर व सरकारी तंत्र के स्तर पर अधिकारियों को प्रभावी ढंग से अपने पक्ष में करने हेतु उपक्रम करना। जैसे व्यापार और उद्योग जगत फिक्की व एसोकैम जैसे संगठन के माध्यम से करते हैं। 5.जब तक हम ऐसे कारपोरेट कार्यालय की उपयोगिता को स्वीकार नहीं करते हैं, तब तक इस समस्या का जड़ से उपचार हमें सम्भव नहीं लगता। 6. पशुओं की उपयोगिता के दायरे को बढ़ाना, आर्गेनिक कृषि को बढ़ावा देना, देशी नस्ल सुधार के कार्यक्रम को बढ़ावा देना आदि अनेक महत्वपूर्ण कार्य हमें करने हैं। 7. गाय गौशाला में नहीं, किसान के पास और खेत में ही सुरक्षित रह सकती है। उन्हें अर्थ भार से मुक्त करने की दिशा में सार्थक और कारगर उपाय खोजने होंगे। सामाजिक और सरकारी, दोनों स्तर पर। तभी देश में सम्पूर्ण गौरक्षा संभव है। 8. देश में मांस की मांग कम हो, इसके लिए व्यापक स्तर पर मांसाहार बहुल क्षेत्रों में शाकाहार का प्रचारप्रसार करना होगा। वर्तमान में देश में मांस की खपत प्रतिव्यक्ति प्रतिवर्ष डेढ़ किलों से बढ़कर तीन किलो अर्थात दुगुनी हो गई है। 9. देश के युवा वर्ग को इस दिशा में विशेष जागरूक बनाना होगा। क्योंकि भविष्य के वे ही सक्रिय नागरिक बनने वाले हैं। 10. देश के प्रत्येक राज्य एवं जिले में कम से कम एक आर्थिक स्वावलम्बी आदर्श गौशाला की स्थापना करनी होगी, जो आदर्श मॉडल के रूप में प्रस्तुत की जा सके । मात्र भाषण देने से या लेख लिखने से यह कार्य संभव नहीं होगा। 11. वर्तमान में देश में इन क्षेत्रों में कार्यरत लोगों के बीच आपसी संवाद की बेहद कमी है, आपस में कोई समन्वय नहीं है। उसे इन कार्यालयों के माध्यम से दूर करना समय की मांग है। साथ आना शुरुआत है, साथ रहना प्रगति है और साथ काम करना ही सफलता की कुंजी है। Coming together is begining, अर्हत् वचन, 23 (1-2),2011 107

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