Book Title: Arhat Vachan 2011 01 04
Author(s): Anupam Jain
Publisher: Kundkund Gyanpith Indore

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Page 63
________________ I UnHk& 1. साक्षात् उन-उन भण्डारों का अवलोकन एवं फोटोस्टेट तथा डिजिटल फोटा द्वारा पाण्डुलिपियों की प्राप्ति। क्रमशः 7 पाण्डुलिपियाँ प्रथम तथा अन्तिम पृष्ट ( दंसणकहरयणकरंडु दर्शनकथारत्नकरण्ड)। 3. शास्त्री नेमिचन्द्र, तीर्थंकर महावीर और उनकी आचार्य परम्परा, पृष्ठ- 134 उपाध्ये ए.एन., प्राकृतग्रन्थ परिषद्, स्वाध्याय मण्डल, जैननगर, पालड़ी, अहमदाबाद (गुजरात) शास्त्री नेमिचन्द्र, तीर्थंकर महावीर और उनकी आचार्य परम्परा, पृष्ठ - 135 I d kkskuksi j kur i klr % 15-01-11 परिशिष्ट एनमोवीतरामाया मोजयत मितिमपिट मोरयासिनोकगईसपरतापदिलका लबरसोजयमतिलादीविध महमाई मनिलामयिक पवित्रा दिया जियनेमिरिवार दो।अकलेकोमल पावरलोपिम्पलकेवलजो बाउकोश्यमयलल/ Aamयलोमिडिविद्दिजयशिवदिहिवायकरालिहसरूजयदि उनीसमितिकरण अयरिसहरावयाकुम्मयपडिरवलणानियहरुम्मास्मियदलणाजयजयसिसवनी दिसतरणाबहिणंदणोजयतयाणेदारिकरणमयमुमतिणमुमतिल्लोकजण पायोमहये। महाजयगवारणास्यवस्जयमयसम्मारित्यकरणाविगयासससिलामजयनियजरात Imजयारपीर पदमुविदिसमलनसायलमदाक्यलिदहरणासयजयदि मयंससे मणिमुल मुवजयलिवामाप्रामाविमलयरगुणEMARATHI यजयजिणाणतन्त्रमाणपिशादणाजयक्षमावरधाममायोडवीडदणाजयमनिमंतियगयसयल जैन विद्या संस्थान, जयपुर में संग्रहीत दंसणकहरयणकरंडु की पांडुलिपि (वे.सं.-878) का प्रथम पृष्ठ अर्हत् वचन, 23 (1-2), 2011

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