Book Title: Arhat Vachan 2011 01 04
Author(s): Anupam Jain
Publisher: Kundkund Gyanpith Indore

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Page 55
________________ से प्रथम तीर्थंकर ऋषभनाथ के रूप में इसकी पहचान संभव हुई है ।25 अकोटा समूह की एक अन्य प्रतिमा, जो कायोत्सर्ग मुद्रा में प्रथम तीर्थंकर ऋषभनाथ की है, विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। इसमें तीर्थकर आयताकार पादपीठ के मध्य में खड़े हैं। पादपीठ के दोनों सिरों पर दो कमलपुष्प अंकित हैं, जिन पर प्रत्येक में एक यक्ष तथा यक्षी की मूतियाँ हैं। पृष्ठभाग में अन्य तीर्थंकरों के लिए पट्टिका अथवा प्रभामण्डल के लिए आधार पेटिका या दोनों मूलतः उन छिद्रों में स्थित थे, जो पादपीठ के ऊपरी तल पर दृष्टिगोचर होते है । वृत में अंकित ऋषभनाथ की मूर्ति पृथक ढाली गयी है और केन्द्र में धर्मचक्र के ऊपर संयुक्त कर दी गयी। धर्मचक्र के दोनों ओर सुंदर हरिण है। ऋषभनाथ के रूप में तीर्थंकर की पहचान उनके स्कंधों पर लटकती हुई केशराशि से हुई है। इसमें संवारे हुए कुंचित केश और उष्णष दृष्टव्य हैं। बड़े नेत्र, विस्तृत ललाट, थोड़ी नुकीली नाक, सुडौल मुख तथा बौने धड़ पर छोटी ग्रीवा ऐसी विशेषताएँ हैं, जो प्रारंभ में गुजरात तथा पश्चिम भारत के अन्य स्थानों में प्रकट हुई हैं तीर्थंकर के शरीर पर पारदर्शी धोती है, जिसमें से जनेन्द्रिय का स्वरूप स्पष्ट झलकता है। धोती सुंदर रंगों में छापी गयी है, जिसमें समानांतर पंक्तियों के मध्य पुष्प अंकित हैं। पुष्पों का अंकन एक आद्य कला प्रतीक है। स्कंध चौड़े और सुदृढ़ हैं, कटि पतली, हाथ और टाँगें, सुनिर्मित हैं तथा वक्षस्थल पर श्रीवत्स चिन्ह है। ये सभी विशिष्टताएँ उत्तर गुप्त युग, लगभग 540-50 शती ई. की बोधक है।26 अकोटा समूह में उपलब्ध कुछ और कांस्य मूर्तियों को उनकी शैली तथा कहीं-कहीं उनके अभिलेखों की पुरालिपि के साक्ष्य के आधार पर इस युग के अंतिम भाग की माना जा सकता है । जैन कला तथा प्रतिमा विज्ञान के इतिहास में जीवंतस्वामी की दो कांस्य मूर्तियां (एक अभिलेखांकित पादपीठ सहित तथा दूसरी पादपीठ रहित) अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। जीवंतस्वामी की पहली कांस्य प्रतिमा का पादपीठ नष्ट हो गया और जो आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त है। फिर भी, मुकुट सहित शीर्ष पूर्णतः सुरक्षित है । यह ऊँचा मुकुट मथुरा के कुषाणयुगीन विष्णु के बेलनाकार मुकट के समान निर्मित है। यह चौकोर है, जिसमें सामने की ओर चैत्य वातायन के समान अलंकरण तथा पार्श्व शीर्ष और पृष्ठभाग में कमल प्रतीक अंकित है। बालों की कुण्डलित लटें कंधों पर तीन पंक्तियों में गिरती हैं और सुंदर शैली में संवारे हुए केश पट्टे के नीचे दिखाई देते हैं, जो संभवतः मुकुट का ही भाग है । मूर्ति का निचला अधर ताम्र जड़ित है, जो अंधेरों के अरुणाभ होने का संकेत देता है। रजत मण्डित अर्धनिमीलित नयन ध्यान की गहनता का आभास देते हैं। उनके विशाल मस्तक पर वृताकार तिलक का चिन्ह है। आध्यात्मिक ध्यान एवं आनंद तथा पूर्ण यौवन की आभा से प्रदीप्त मुखमण्डल युक्त महावीर की यह प्रतिमा कदाचित अब तक प्राप्त मूर्तियों में श्रेष्ठतम है। मेखला (करधनी) से कसी हुई घुटनों से नीचे तक लटकी हुई है। मेखला के मध्य में बनी कुण्डलपाश से बांधा हुआ पर्यसत्क पार्श्व में नीचे की ओर लटक रहा है। धोती के मध्य भाग में एक अलंकृत लघुवस्त्र (पर्यसत्क) बँधा है, जिसके एक छोर की चुन्नटें नीचे की ओर लटक रही हैं तथा दूसरा छोर जो बायीं जाँघ को ढंकता है, विलक्षण अर्धवृत्ताकार चुन्नट में वल्ली जैसा प्रतीत होता है। इस प्रकार की धोती निःसंदेह पश्चिम भारतीय मूर्तिकला की आरंभिक शैली की विशेषता है । तीन धारियों युक्त ग्रीवा, चौड़े स्कंध, लम्बी भुजाएँ, साधारण रूप में उभरा वक्ष और क्षीण कटि में गुप्तकला की सभी विशषताएँ हैं ।7। अकोटा से प्राप्त जीवंतस्वामी की दूसरी प्रतिमा में उन्हें एक ऊँचे अभिलेखांकित पादपीठ पर खडगासन ध्यानमुद्रा में दिखाया गया है। पादपीठ का अभिलेख लगभग 550 ई. की लिपि में उत्कीर्ण अर्हत् वचन, 23 (1-2),2011 55

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