Book Title: Arhat Vachan 2011 01 04
Author(s): Anupam Jain
Publisher: Kundkund Gyanpith Indore

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Page 54
________________ की सम्पूर्ण आकृति के पीछे कुण्डली मारे हुए एक विशाल नाग को दर्शाया गया है, जिसने तीर्थंकर के शीर्ष पर अपने फण से एक छत्र बनाया हुआ है। ऐसा प्रतीत होता है कि गुप्तकाल में नचना के ब्राह्मण धर्म केन्द्र के निकट ही सीरा पहाड़ी पर जैन धर्म का केन्द्र था। इस क्षेत्र में यदि पुनः उत्खनन किया जाये तो और अधिक जैन अवशेष, मात्र इसी स्थान से ही नहीं अपितु इसके समीपवर्ती क्षेत्रों से भी, उपलब्ध हो सकते है। जोन विलियम्स द्वारा गुप्तकालीन दो सुंदर तीर्थंकर प्रतिमाओं को प्रकाश में लाया गया है, जो जिला पुरातत्व संग्रहालय पन्ना में सुरक्षित हैं। बताया जाता है कि ये प्रतिमाएँ नचना से उपलब्ध हुई हैं। तीर्थंकर को पादपीठ स्थित आसन पर पद्मासन मुद्रा में दर्शाया गया है। धर्मचक्र और उसके पार्श्व में दोनों किनारों के निकट सिंह अंकित है। धर्मचक्र के प्रत्येक छोर पर घुटनों के बल बैठा हुआ एक भक्त है, जो संभवतः तीर्थंकर का गणधर (प्रथम अनुयायी) या फिर कोई साधु है। दूसरी प्रतिमा में पादपीठ के मुखभाग पर चार भक्त अंकित हैं। प्रतिमा की मुखाकृति और सिर पूर्णरूपेण सुरक्षित हैं तथा कंधे और धड़ की संरचना में उत्कृष्ट गुप्तकाल की कला परम्परा का निर्वाह हुआ। जहां तक मुखाकृति की भावाभिव्यक्ति का संबंध है, इसे गुप्तकालीन श्रेष्ठ तीर्थंकर मूर्तियों की श्रेणी में रखा जा सकता है।22 कहोम - कहौम (देवरिया, उ.प्र.) के 461 ई. के एक स्तम्भ लेख में पाँच जिन मूर्तियों के स्थापित किए जाने का उल्लेख है। स्तम्भ की पाँच कायोत्सर्ग एवं दिगम्बर जिन मूर्तियों की पहचान ऋषभनाथ, शांतिनाथ, नेमिनाथ, पार्श्वनाथ एवं महावीर स्वामी से की गई है। सीतापुर (उ.प्र.) से भी एक जिन मूर्ति मिली है ।23 वाराणसी- वाराणसी से मिली लगभग छठी शती ई. की एक ध्यानस्थ महावीर मूर्ति भारत कला भवन, वाराणसी से संग्रहित है । राजगिर की नेमि मूर्ति के समान ही इसमें भी धर्मचक्र के दोनों ओर महावीर के सिंह लांछन उत्कीर्ण हैं। वाराणसी से मिली और राज्य संग्रहालय, लखनऊ में सुरक्षित लगभग छठी-सातवीं शती ई. की एक अजितनाथ की मूर्ति में भी पीठिका पर गज लांछन की दो आकृतियाँ उत्कीर्ण है ।24 अकोटा - अकोटा (बड़ौदा, गुजरात) से चार गुप्तकालीन कांस्य मूर्तियां मिली हैं। पांचवीछठी शती ई. की इन श्वेताम्बर मूर्तियों में दो ऋषभनाथ की और दो जीवन्तस्वामी महावीर की हैं। सभी मूलनायक कायोत्सर्ग में खड़े हैं। एक ऋषभ मूर्ति में धर्मचक्र के दोनों ओर दो मृग और पीठिका छोरों पर यक्ष-यक्षी निरुपित हैं । यक्ष-यक्षी के निरूपण का यह प्राचीनतम ज्ञात उदाहरण है। द्विभुज यक्ष-यक्षी सर्वानुभूति एवं अम्बिका है। इन मूर्तियों में एक तीर्थंकर ऋषभनाथ की धोती धारण किए हुए खडगासन कांस्य प्रतिमा है, पर दुर्भाग्य से यह आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त है तथा इसका पादपीठ नष्ट हो चुका है। फिर भी इसकी रचना सुंदर है तथा विशुद्ध गुप्तकालीन शैली में है, जिसकी तुलना सुलतानगंज से प्राप्त उत्कृष्टता पूर्वक ढाली हुई बुद्ध की ताम्र प्रतिमा से की जा सकती है। अत्यधिक क्षतिग्रस्त होने पर भी यह मूर्ति उत्तर भारत में प्राप्त सुंदरतम कांस्य प्रतिमाओं में से एक है। रजतमण्डित अर्धनिमीलित नेत्र तीर्थंकर की आनंदमय मुद्रा का संकेत देते है। निचला अधर, जो महापुरुष लक्षण के अनुसार अरुणाभ होना चाहिए, ताम्र मण्डित है तीन धारियों से युक्त अत्यधिक क्षतिग्रस्त ग्रीवा शंखाकार (कंबु-ग्रीव) है, जिसे गुप्तकाल में शरीर सौंदर्य का प्रतीक माना जाता था, सुघड़ता से रचित धड़ के विशाल तथा सुडौल स्कंध तथा क्षीण कटि (तनुवृत-मध्य) भी गुप्तशैली के अनुरूप है। स्कंधों तक लटकती केशराशि की सहायता 54 अर्हत् वचन, 23 (1-2), 2011

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