Book Title: Arhat Vachan 2011 01 04
Author(s): Anupam Jain
Publisher: Kundkund Gyanpith Indore

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Page 34
________________ दीर्घ अथवा संधिकृत ए और ओ छः और आठ में अन्तर्निहित होते हैं । ऋ सात और लु दस में समाहित हो जाता है । दस का अर्थ शून्य होता है । इकाई तक के वर्ग क्रम में 1,3,5,7 ही ऐसे अंक हैं जो विभक्ति वा गुणित जैसी क्रियाओं से प्रभावित नहीं होते हैं। इसके पश्चात् व्यंजनों का वर्गक्रम आता है जो पंचीकरण पद्धति से चलता है। स्वरों का वर्तन विकास त्रिवृत क्रम से चला था, व्यंजन क्रम में पाँच का घटक प्रमुख विघायक बनता है। जो प्रकृति में पांच तत्व, पांच तन्मात्रा, पांच ज्ञानेन्द्रियां, पांच कर्मेन्द्रियां और पंचकोशमय व्यष्टिगत एवं समष्टिगत विस्तार का वितान बनता है। आगे की स्थितियां भी इन्हीं अंकों के चिन्हों से निर्मित, अभिव्यक्त होती हैं जिनमें युति-वियुति, गुणित-विभक्त की क्रिया से इनका विस्तार होता है। वे संख्याएं जो अभाज्य है वे ऋकारादि नपुंसक स्वरों के ही विकसित वर्घित रूप हैं। पंजीकरण के सिद्धांत का संबंध भी चतुष्कोण की तरह ही है क्योंकि पांच उस एक का क्रमिक स्थूलीकरण है। स्थूलीकरण में एक-एक करके पांच तक प्रबुद्ध होने का क्रम है। यही क्रम जब संहरित होता है तो प्रतिलोम विधि से पाँच पदक्षेपों में चलता है जिसका योग दस होता है। शेष को मूलांक या भाग्यांक मानने की पद्धति भी है। सुविधा के लिए वर्णांकों का चक्र दिया जा रहा है। वर्ण अ आ इ ई उ ऊ ऋ ऋ लू लृ ए वर्णांक 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 वर्ण ऐ ओ औ अं अः वर्णांक 13 14 15 16 17 वर्ण क ख ग घ ङ वर्णांक 3 4 5 6 7 वर्ण च छ ज झ ञ वर्णांक 4 5 6 7 8 वर्ण ट ठ ड ढ ण वर्णांक 5 6 7 8 9 वर्ण त थ द ध न वर्णांक 6 7 8 9 10 वर्ण प फ ब भ म वर्णांक 7 8 9 10 11 वर्ण य र ल व वर्णांक 8 9 10 11 वर्ण श ष स ह वर्णांक 9 10 11 12 अनेक बार जिज्ञासाएं आती हैं कि फलित विचार के लिए कौन-सा नाम ग्राह्य हो । एक व्यक्ति का घर नाम कुछ है और संस्थागत कोई और। मेरे अपने विचार से जिस व्यक्ति का जो नाम सर्वाधिक प्रचलित हो वही फलित के लिए विचारणीय रहना चाहिए। 'अंक-विद्या के प्रामाणिक अध्ययन के लिए पाठकों को निम्न पुस्तकों का स्वाध्याय अवश्य करना चाहिए। 1. अंकोदया/इंजी. हरीश श्रीवास्तव/मेघ प्रकाशन, दिल्ली/2001 2. अंक दर्शन/पं. गोविन्द शास्त्री/मेघ प्रकाशन, दिल्ली/1997 प्राप्तः 02.04.2010 50 octor 409 34 अर्हत् वचन, 23 (1-2),2011

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