Book Title: Arhat Vachan 2011 01 04
Author(s): Anupam Jain
Publisher: Kundkund Gyanpith Indore

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Page 27
________________ आचार्य श्री विशुद्धसागरजी की प्रस्तुत कृति 'तत्त्व देशना' का आधार 'तत्त्वसार' है । तत्त्वसार की 74वीं गाथा निम्नवत है सोऊण तच्चसारं रइयं मुणिणाह देवसेणेण । जो सदिट्ठि भावइ तो पावइ सासयं सोक्खं ॥ मुनिनाथ देवसेन के द्वारा रचित 'तत्त्वसार' को सुनकर जो सम्यग्दृष्टि उनकी भावना करेगा वह शाश्वत सुख को पाएगा। इससे स्पष्ट है कि 'तत्त्वसार' आचार्य देवसेन की अध्यात्म विषयक कृति है। आचार्य श्री विशुद्धसागरजी ने प्राकृत भाषा की 74 गाथाओं में निबद्ध आचार्य देवसेन (गणि) (10वीं ई.) की आध्यात्मिक कृति 'तत्त्वसार' पर विदिशा (म.प्र.) में सन् 2004 में सम्पन्न ग्रीष्मकालीन वाचना में 49 सारगर्भित प्रवचन दिये थे। जिसमें गूढ़ रहस्यों को अनेक इतर ग्रंथों के उदाहरणों के माध्यम से स्पष्ट किया गया । तत्त्वदेशना इन 49 प्रवचनों का ही सम्पादित रूप है । भाषा भावों की अभिव्यक्ति का माध्यम है। जैनाचार्यों ने प्राकृत, संस्कृत एवं अपभ्रंश तीनों भाषाओं में विपुल परिमाण में साहित्य का सृजन किया। प्राकृत एवं अपभ्रंश तत्कालीन जन भाषायें रहीं एवं संस्कृत अभिजात्य वर्ग की भाषा । अतः शास्त्रार्थ एवं विद्वत् समुदाय में अपने मत को समीचीन रूप में प्रस्तुत करने हेतु संस्कृत में साहित्य सृजन जरूरी था तथा जन-जन तक अपना मंतव्य प्रेषित करने हेतु प्राकृत एवं अपभ्रंश भाषाओं में भी । जहाँ जैन परम्परा के मूल ग्रंथ महावीर-कालीन जनभाषा 'प्राकृत' में हैं, वहीं उत्तरवर्ती काल में राजस्थान के विद्वानों ने तत्कालीन जनभाषा 'ढुंढारी' में भी साहित्य का सृजन किया। 19वीं शताब्दी में परिष्कृत हिन्दी के प्रचार से पूजा एवं भक्ति साहित्य परिष्कृत हिन्दी में लिखा गया किन्तु आगम ग्रंथों की टीकाएँ / व्याख्याएँ ढुंढारी भाषा में ही चलती रही। 20वीं शताब्दी में जैन साहित्य में तब क्रांति आई, जब अनेक ग्रंथों के हिन्दी अनुवाद हिन्दी ग्रंथ रत्नाकर कार्यालय मुंबई, माणिकचंद ग्रंथमाला-मुंबई, जैन संस्कृति संरक्षक संघ - सोलापुर एवं भारतीय ज्ञानपीठ - दिल्ली के माध्यम से प्रकाश में आये । अन्य अनेक प्रकाशन संस्थाओं का योगदान भी सराहनीय रहा । इन कृतियों के प्रकाश में आने से हिन्दी भाषी श्रावक भी इनके विषय को ठीक से हृदयंगम कर सके । आज यदि भारत में 1200 के लगभग पिच्छीधारी दिगम्बर मुनि, आर्यिका, ऐलक, क्षुल्लक, क्षुल्लिका विहार कर रहे हैं, स्वाध्याय एवं ज्ञानार्जन के माध्यम से अपने वैराग्य को वृद्धिंगत कर रहे हैं तो इसमें प्राचीन आचार्य प्रणीत ग्रंथों के उपलब्ध हिन्दी अनुवादों की भी महत्वपूर्ण भूमिका को नकारा नहीं जा सकता । कृति के प्रारंभ में ही आचार्यश्री रेखांकित करते हैं कि - 'एक गूढ़वादी के लिये यह आवश्यक नहीं कि वह बहुत बड़ा विद्वान हो और न ही वर्षों तक व्याकरण तथा न्याय में सिर खपाकर वह सुयोग्य बनने का ही प्रयत्न करता है, किंतु मानव समाज को दुःखी देख आत्म साक्षात्कार का अनुभव ही उसे उपदेश देने के लिये प्रेरित करता है और व्याकरण आदि के नियमों का विशेष विचार किये बिना जनता के सामने वह अपने अनुभव रखता है। अतः उच्चकोटि की रचनाओं में प्रयुक्त की जाने वाली भाषा को छोड़कर समय की प्रचलित भाषा को अपनाना महत्व से खाली नहीं (अर्थात महत्त्वपूर्ण) है।' यह कथन विषय की विवेचना में जन-भाषा के महत्व को दर्शाता है | 5 तत्त्वदेशना में भेद ज्ञान स्व एवं पर के भेद को समझना जितना सरल है, उतना ही कठिन भी है। वास्तव में शास्त्र की सभाओं में यह विषय जितना सरलता से बता दिया जाता है उसे समझना एवं अर्हतु वचन 23 (1-2), 2011 27

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