Book Title: Anusandhan 2017 11 SrNo 73
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad

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Page 28
________________ अनुसन्धान-७३ मणीमद(दे) पुत्र संघवी रत्नसिंह पुत्र पासराज कलवग्रा. वास्तव्य श्रीजीराउलाभुवने चतुष्किका शिखरं कारापितं. शुभं भवतु. श्रीपार्श्वनाथ प्रसादात्. १२. चतुष्किका (चोकीयारा) तपागच्छे संवत् १४८३ वर्षे भादरवा वदि ७ गुरु श्रीतपागच्छनायक देवसुन्दरसूरिपट्टे श्रीसोमसुन्दरसूरि श्रीमुनिसुन्दरसूरि श्रीजयचंद्रसूरि श्रीभुवनसुन्दरसूरि उपदेशेन करापितं सौत्रानगरे श्रीमालज्ञातीय रंगरत्न चंपाई पुत्र पृथ्वीरत्न श्रीजीराउलाभुवने चतुष्किका कारापितं. १३. (स्तम्भ) सं. १४९२ पोस वदि १० बुधे श्रीवडगच्छे तपाभट्टारक श्रीजयशेखरसूरि तत्पट्टे श्रीवेरसेनसूरि तत्पट्टे श्रीहेमतिलकसूरिपट्टे श्रीरत्नशेखरसूरिपट्टे श्रीप्रश्नचंद्रसूरिपट्टे प्रताट(?) मुगटाः श्रीहेमहंससूरयः श्रीपार्वं प्रणेमुः भक्त्या यनीतं (?) १४. (स्तम्भ) श्रीरत्नसागरसूरि प्रभृति परिकरयुताः प्रणमन्ति पुन्यप्रभगणि-वज्रमेरुगणिलक्ष्मीसागरमुनि-यतिप्र. रत्नसुन्दरगणि आदियतिभिः म. बालूसा पुत्र मि. ठाकोरसिंह सर्वे समायाताः शुभम्. १५. सं. १९८८ फागुण सुदि १३ वार रवि. सीरोही नरेश सरूपसिंहजी (जीरावल) ठा. भोपालसिंहजी नीवक (?) गोत्रना अवेसा (?) चहुआण शा. जेठा ओपाजी (रामपुरा) वाला वाव बंधावी छे. जैन यात्रालुओने वो गायांने होद पर वाव बंधावेल छे. कोई घणी गायांने वा माणसांने पाणी पीवारी रोकटोक करे नही. करे तो छीपना- पाप. चमनजीना प्रयासथी शा. जेगजी ओवाजीए परब बंधावेल छे.

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