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करना पड़ा। अब जब कि तू मेरी गोद म आ गया, तब भला ! बता कि यहाँ अशान्ति कहाँ है ? क्योंकि मैं आत्मा हूँ और आत्मा ही शान्तिका घर है एवं यह निज स्वरूप है | अतः शान्ति प्राप्त करने के लिए निज- स्वरूप का और अशान्ति से बचने के लिये पर स्वरूप का परिज्ञान कर लेना नितान्त आवश्यक है । जैसे कि विश्व में ये शरीर आदि पदार्थ है वैसे ही आत्मा भी एक पदार्थ है । आत्मा, पुद्गल-परमाणु, कालाणु, आकाश, धर्मास्तिकाय और अधर्मास्तिकाय — इन छः द्रव्यों के समुदाय को विश्व कहते हैं । ये सभी पदार्थ भावात्मक अर्थात् अपने अस्तित्व को कायम रखने वाले होने से सत्ता स्वरूप है, क्षीर-नीर वत् परस्पर मिले हुये होने पर भी स्वतंत्र हैं । ये किसी से बने हुये न होने से अनादि एवं विनाशशील न होने के कारण अनन्त हैं । इनमें आत्मा, स्व-पर को देखने जानने के स्वभाव वाला चेतनस्वरूप होने से चेतन कहलाता है तथा शेष पाँचों ही वैसी योग्यता वाले न होने के कारण जड़ कहलाते हैं । संख्या में प्रथम के तीन अनेक एवं शेष तीनों ही एक एक हैं ।
चेतन सृष्टि में बहुत से चेतन तो शरीर गाड़ी से चालक वत् सम्बन्ध से मुक्त हैं ; सम्बन्ध रखने वाले बद्ध हैं, एवं थोड़े से शरीर जबकि अचेतन सृष्टि में भी बद्ध पुद्गल पिण्ड-रूप शरीर गाड़ियाँ एकेन्द्रिय से पञ्चेन्द्रिय तक की व्यवस्था वाली छोटी-बड़ी अनन्तानन्त हैं और शरोराकार से मुक्त पुद्गल स्कन्ध एवं परमाणु भी अनन्तानन्त हैं । आकाश सभी को जगह देता है और खुद स्व-प्रतिष्ठा है । त्रिश्व मर्यादा स्थित आकाश-चित्रण लोकाकाश और शेष विभाग अलोकाकाश कहलाता है । गति के माध्यम रूप धर्मास्तिकाय के निमित्त से गतिशीलों की गति होती है और स्थिति के माध्यम रूप अधर्मास्तिकाय के निमित्त से स्थितिशीलों की स्थिति होती है । केवल चेतन और पुद्गल गति पूर्वक स्थिति तथा स्थिति पूर्वक गति
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