Book Title: Anandghan Chovisi
Author(s): Sahajanand Maharaj, Bhanvarlal Nahta
Publisher: Prakrit Bharti Academy

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Page 211
________________ श्री नमि जिन स्तवन ( राग - आसावरी - 'धन धन सम्प्रति सांचो राजा, ए देशी ) षड् दरसण जिन अंग भणीज, न्यास षडंग जो साधै रे । नमि जिनवर ना चरण उपासक, षड दरसण आराधे रे || षड्० ॥ १॥ जिन सुरपादप पाय बखाणु, सांख्य जोग दुय भेदे रे । आतम सत्ता विवरण करतां, लहो दुग अंग अखेदे रे || षड्० || २ || भेद अभेद सुगत मीमांसक, जिनवर दुय कर भारी रे। लोकालोक अलंबन भजिये, गुरुगम थी अवधारी रे || षड्० || ३ || लोकायतिक कूख जिनवरनी, अंस विचार जो कीजै रें । तत्व विचार सुधारस धारा, गुरुगम विण किम पीजै रे || षड्० ॥४॥ जैन जिणेसर वर उत्तमअंग, अंतरंग अक्षर न्यास धरी आराधक, आराधे बहिरंगे रे । गुरुसंगे रे || ० ||५|| जिनवरमा सगला दरसण छै, दरसण जिनवर भजनारे । सागरमा सघली तटनी छै, तटनी सागर भजना रे || षड्० ॥ ६ ॥ जिन सरूप थइ जिन आराधे, ते सहि जिनवर होवे रे । भृंगी इलिकाने चटकावै, ते भृंगी जग जोवे रे । षड् ० ॥७॥ Jain Educationa International For Personal and Private Use Only www.jainelibrary.org

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