Book Title: Anandghan Chovisi
Author(s): Sahajanand Maharaj, Bhanvarlal Nahta
Publisher: Prakrit Bharti Academy
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श्री महावीर जिन स्तवन-३ ( पंथड़ो निहालूं रे बीजा जिन तणो रे, ए देशी ) चरम जिनेश्वर विगत स्वरूप नूं रे, भावू केम स्वरूप ? साकारी विण ध्यान न संभवे रे, ए अविकार अरूप ॥१॥
आप सरूपे आतम मां रमे रे, तेहना धुर वे भेद । असंख उक्कोसे साकारी पदे रे, निराकारो निर्भेद ॥२॥
सुखम नाम करम निराकार जे रे, तेह भेदे नहिं अंत । निराकार जे निरगति कर्म थी रे, तेह अभेद अनंत ॥३॥ रूप नहि कइए बंधन घट्यु रे, बंधन मोख न कोय । बंध मोख विण सादि अनंतनु रे, भंग संग किम होय ? ॥४॥ द्रव्य बिना जिम सत्ता नवि लहे रे, सत्ता विण स्यो रूप । रूप बिना किम सिद्ध अनंततारे, भावं अकल स्वरूप ॥५॥ आतमता परिणतिजे परिणम्या रे, ते मुझ भेदाभेद । तदाकार विण मारा रूपनुं रे, ध्यावं विधि प्रतिषेध ॥६॥ अंतिम भव ग्रहणे तुझ भावनुं रे, भावस्यं शुद्ध स्वरूप। तइये 'आनंदघन' पद पामस्यु रे, आतम रूप अनूप ॥७॥
३ चरम = अंतिम । विगत = बीता हुआ। साकारी= आकार वाला। अविकार = विकार रहित । धुर = प्रथम। बे= दो। उक्कोसे = उत्कृष्ट । निरभेद = भेद रहित । सूखम = सूक्ष्म । निरगत = निर्गति। स्यों = कैसा। तइयें तब।
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