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शीतलजिन स्तुति १०
नय भंग निक्षेपे करीतत्त्व विचार, त्यां अस्ति नास्ति अवक्तव्य आदि प्रकार ; अविरोध सिद्धि ए स्याद्वाद-चमत्कार,
शीतल सिद्धान्ते सहजानंदघन सार ; ॥१०॥ श्रेयांसजिन स्तुति ११
कत्तृत्त्वाभिमाने कर्म शुभाशुभ-बंध, सधे ज्ञप्ति क्रिया थी बोधी-समाधि अबंध ; कर्ता न कदापि चेतन पर जड़ - धंध,
श्रेयांस-बोध ए सहजानंद सुगंध ; ॥११॥ वासुपूज्यजिन स्तुति १२
कर्त्तापद-सिद्धि व्याप्य-व्यापक न्याये, तत्स्वरूप न जुदा कर्ता-कर्म-क्रिया ए; परिणति परिणामी परिणाम एक ध्याये,
सहजानंद-रस प्रभु-वासुपूज्य गुण न्हाये ॥१२॥ विमलजिन स्तुति १३
सजीवन मूर्ति करी माथे समर्थ नाथ, पछी शत्रुदल थी करीए बाथम्बाथ ; प्रभु विमल कृपा थी विजयलक्ष्मी करी हाथ,
त्यां सहजानंदघन थाय त्रिलोकीनाथ ; ॥१३।। अनंतजिन स्तुति १४
करी विविध क्रिया ज्यां आश्रवबंध प्रकार, तोय माने हुं साधु समिति गुप्ति व्रत धार ; निज लक्ष-प्रतीति-स्थिरता नहिं तिलभार
केम पामे अनंत-प्रभु सहजानंद पद सार॥१४॥ १७०]
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