Book Title: Anandghan Chovisi
Author(s): Sahajanand Maharaj, Bhanvarlal Nahta
Publisher: Prakrit Bharti Academy

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Page 207
________________ श्री मल्लि जिन स्तवन ( राग-काफी ) ढाल-सेवक किम अवगणियहो एह अचंभो भारी हो, मल्लिजिन एह अचंभो भारी। ए अब शोभा सारी हो मल्लिजिन, ए अब शोभा खारी ॥ अवर जेहने आदर अति दिये, तेहने मूल निवारी हो ॥ मल्लि० ॥१॥ ग्यान सरूप अनादि तुमारूंः ते लीघो तुमे ताणी। जूओ अज्ञान दशा रीसाणी, जातां काण न आणी हो ॥ मल्लि० ॥२॥ निद्रा सुपन जागरुजागरता, तुरीय अवस्था आवी। निद्रा मुपन दशा रीसाणी, जाणी न नाथ मनावी हो ॥ मल्लि० ॥३॥ समकित साथे सगाई कीधी, सपरिवार सू गाढी। मिथ्यामति अपराधण जाणी, घर थी बाहिर काढी हो ॥ मल्लि० ॥४॥ हास्य अरति रति शोक दुगंछा, भय पामर करसाली। नोकषाय-गज श्रेणी चढतां, श्वान तणी गत झाली हो ॥ मल्लि० ॥५॥ राग द्वेष अविरतनी परिणति, ए चरण मोहना जोधा। वीतराग परिणति परणमतां, ऊठी नाठा बोधा हो ॥ मल्लि० ॥६॥ वेदोदय कामा परिणामा काम्यकर्म सहुत्यागी काम्यक रस हू त्यागी। निक्कामी करुणारस सागर, अनन्त चतुष्क पद पागी हो ॥ मल्लि० ॥७॥ Jain Educationa International For Personal and Private Use Only www.jainelibrary.org

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