Book Title: Agam 30 Mool 03 Uttaradhyayana Sutra Part 03 Sthanakvasi
Author(s): Ghasilal Maharaj
Publisher: A B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti

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Page 16
________________ उत्तराध्ययनसूत्रे वृत्तः, वेदवित् विद्यते जीवाजीवादितत्त्वमनेनेति वेद आगमस्तं वेत्तीति वेदवित् आगमज्ञः, तथा-आत्मरक्षितः रक्षितो दुर्गतिहेतोरपध्यानादेरात्मा येन स तथा, यद्वा-'आयरक्षितः' इतिच्छाया-रक्षितः-प्रायः रत्नत्रयप्राप्तिलक्षणो लाभो येन स नथा, प्राप्त सम्यग्दर्शनादि रत्नत्रयरक्षणशील इत्यर्थः, प्राकृतत्वाद् ‘रक्षित' शब्दस्य परनिपातः । यद्वा वेदस्य-आगमस्य-विदा-बुद्धिर्ज्ञानमिति यावत् , तया रक्षितः-कुगतिपतनात् आत्मा येन सः तथा, 'प्रज्ञा श्रद्धाधराज्ञप्तिः पण्डा संवेदनं विदा' इति शब्दार्णवः । अनेन आगमानुकूलसमाचरणशीलस्यैव मुनेरात्मा रक्षितो भवतीति सूचितम् । तथा-माज्ञः हेयोपादेयबुद्धिमान् , सर्वदर्शी-सर्व इसी बात को सूत्रकार विशेषरूप से स्पष्ट करते हैं-'राओवरयं' इत्यादि। अन्वयार्थ (लाढे-लाढः) सदनुष्ठान-संमय में तत्पर (विरए-विरतः) आस्रव से निवृत्त (वेदविया-वेदवित्) आगमका ज्ञाता तथा (आयरक्खिए-आत्मरक्षितः) आत्माका रक्षक (पन्ने-प्राज्ञः) हेय और उपादेय की बुद्धि से संपन्न एवं (सव्वदंसी-सर्वदर्शी) समस्तभूतों को अपने समान समझनेवाला मुनि (अभिभूय-अभिभूय) परीषह एवं उपसर्गों को पराजित करके-जीत करके-(राओवरयं-रागोपरतम्) कामभोगाभिलाषरहित होकर (चरेज-विहरेत्) विचरता है और उस विहार में (जे-यः) जो (कम्हिवि न मुच्छिए-कस्मिन् अपि मूच्छितः न भवति) किसी भी सचित्त अचित्त एवं मिश्र वस्तुओं में मूच्छित आसक्त नहीं होता है (स भिक्खू-स भिक्षुः) वह भिक्षु है। " वेदविदायरक्खिए" इस पदकी " वेदवित् आयरक्षितः” ऐसी भी छाया होती है-इसका अर्थ इस या वातन सूत्रधार विशेष३५थी प्रगट ४२ छ “राओवरयं" त्या ! अन्वयार्थ -लाढे-लाढः सहनुहानमा तत्५२, विरए-विरतः साखथी निवृत्त वेदविया-वेदवित् मागमना ज्ञाता तथा आयरक्खिए-आत्मरक्षितः मात्माना २क्ष प्रन्ने-प्रज्ञः इय अन पायनी मुद्धिथी संपन्न भने सम्बदंसी-सर्वदर्शी वाने पोताना समान समभावा मुनि अभिभूय-अभिभूय परीष भने पनि परात ने राओवरयं-रागोपरतम् मिसागनी अभिसापाथी २डित मनीन चरेज्ज-विहरेत पियरे छ, वजी ते विहारमा जे-यः २ कम्हिवि न मुच्छिएकस्मिन्अपि न मूच्छितः ॥ ५९४ सथित्त सचित्त मन मिश्र-वस्तुमामा मासत भनत नयी स भिक्खू-स भिक्षुः मि छ. "वेदविदाय रक्खिए" मा पहनी "वेदवित् आयरक्षितः" मेवी ५५ छाया भने छे. मानो म मा प्रभारी छ. उत्त२॥ध्ययन सूत्र : 3

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