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मनकान्त
सम्पादक-जुगलकिशोर मुख्तार 'युगवीर'
QOGIG
विषय-सूची
१११
कान्त
१ ज्ञानीका विचार-[कविवर द्यानतराय दशलाक्षाणिक धर्मस्वरूप-[कयिवर रइधू
...१०८ 'वीतराग-स्तवन' के रचयिता अमर कवि-[श्री अगरचन्द नाहटा ११३ दशधर्म और उनका मानव जीवनसे सम्बन्ध
[पं० वंशीधरजी व्याकरणाचार्य... ५ उत्तम क्षमा-[पं० परमानन्द जैन शास्त्री ... ६ दस लक्षण धर्म-पर्व-[श्री दौलतराम 'मित्र'...
... १२२ ७ उत्तम मार्दव-[श्री १०५ पूज्य चुल्लक गणेशप्रसादजी वर्णी... १२३ सत्य धर्म-[
... १२६ शौच धर्म-[ले. पं० दरबारीलाल कीठिया, न्यायाचाय १० श्रार्जव-[अजितकुमार जैन ...
१३० ११ उत्तम तप-[पी० एन० शास्त्री
१३१ १२ संग्रहकी वृत्ति और त्याग धर्म
(ले. श्री पं० चैनसुखदासजी न्यायतीर्थ १३ तत्वाथ-सूत्रका महत्व पं७ वंशीधरजी व्याकरणाचा
१३२ १४ संयम धर्म-- श्री राजकृष्णजी जैन १५ आकिंचन्य धर्म-[परमानन्द शास्त्री १६ ब्रह्मचय पर श्रीकानजी स्वामीके कुछ विचार
... १४२ १७ आत्मा, चेतना या जीवन-[बा०अनन्तप्रसादजी B.Sc.Eng. १४३
सितम्बर
सन् १९५३
३
... १४०
अनेकान्तके ग्राहक बनना और बनाना प्रत्येक साधर्मी भाईका कर्तव्य है
GRAM
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माता और पुत्रका दुःमह-वियोग !! अनेकान्त पाठकाका यह जानकर दुःख तथा अफसोस हा बिना नहीं रहेगा कि उनके चिरपिरिचित एवं सेवक पं. परमानन्दजी शास्त्रीको हालमें दो दुःसह वियोगांका सामना करना पड़ा है ! उनकी पूज्य माताजी का ता. २८ अगम्तको शाहगढ़ (सागर) में स्वर्गवास हो गया और उसके तीन दिन बाद (ना० ३१ अगस्तकी) उनका मझला पुत्र राजकुमारभी चल बसा !! दोनाकी मृत्युक समय पंडितजी पहुँच भी नहीं पाए। इस पाकम्मिक वियोगसे पंडितजीको जो कष्ट पहुँचा है उस कौन कह सकता है ? उनकी पन्नीक वियांगको अभी दो वर्ष ही हो पाए थे कि इतने में ये दो नये प्राधात उनको और पहुंच गय !! विधिको गति बड़ी विचित्र है, उस काई भी जान नहीं पाता। एक सम्यग्जान अथवा सद्विवेकके बिना दुसरा कोई मा से कटिन अवसरों पर अपना पहायक और संरक्षक नहीं होता। पंडितजीके इस दुःखमें वीरसेवामन्दिर परिवारकी पूरी महानत है और हादिक भावना है कि दोनों प्राणियोंको परलोकम मदर्गातको प्राप्ति हो । माधही पंडितजीका विक पविशाप रूपसे जागृत होकर उन्हें पूर्ण धैर्य एवं दिलासा दिलाने में समर्थ हो ।
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श्रीबाहुबलि-जिनपूजा उपकर तय्यार !!
श्री गोम्मटेश्वर बाहुबलिजी की जिस पूजाको उत्तमताके माथ छपानेका विचार गत मई मामकी किरण में प्रकट किया गया था वह अब मंशोधनादिके साथ उत्तम पार्ट पेपर पर माटे टोइपमें फोटो ब्राउन रङ्गीन म्याहीसे छपकर तैयार हो गई है। साथमें श्रीबाहुबली जीका फाटो चित्र भो अपूर्व शोभा दे रहा है। प्रचार की दृष्टि से मूल्य लागत से भी कम रखा गया है। जिन्हें अपने , तथा प्रचार के लिये आवश्यकता हो वे शीघ्र ही मंगाले। क्यों कि कापियाँ थोड़ी ही छपा है, ... कापी एक साथ लेने पर १२) रु. में मिलेंगी। दो कापी तक एक आना पोप्टंज लगता है। १० से कम किमीको वी. पी. से नहीं भेजी जाएंगी।
मैनेजर-वीर सेवामन्दिर
दरियागंज दिली
अनेकान्तकी सहायताके सात मार्ग
(१) अनेकान्तके 'संरक्षक' तथा 'सहायक' बनना और बनाना। (२) स्वयं अनेकान्तक ग्राहक बनना तथा दसरीको बनाना । (३) विवाह-शादी आदि दानके अवसर पर अनेकान्तको अच्छी सहायता भेजना तथा भिजवाना। (४) अपनी ओर से दसरांको अनेकान्त भेट-स्वर अथवा फ्री भिजवाना; जैसे विद्या संस्थामा लायरिया.
सभा-पोसाइटियों और जैन-अजैन विद्वानोंकी। (२) विद्यार्थियों आदिको अनेकान्त अर्ध मूल्यम देने के लिये २५),५०) ग्रादिकी सहायता भजन।। ... की
सहायता 10 को अनेकान्त अभृत्यमें भेजा जा सकेगा। (६) अनेकान्तक ग्राहकांको अच्छे ग्रन्थ उपहारमें देना तथा दिलाना । (७) लोकहितकी माधनामें महायक अच्छे सुन्दर लेख लिग्बकर भेजना तथा निनादि या ग्रीकी
प्रकाशनार्थ जुटाना। नोट-दस ग्राहक बनानेवाले पहायकोंको
पहायनादि भेजने तथा पत्रव्यवहारका पना -- 'यनेकान्त' एक वर्ष तक भेट.
। वीरगवामन्दिर , : , दहली For Personal & Private Use Only
मेनेजर अनेकान्त
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वार्षिक मूल्य ५)
SAREESS REHEAR HO - BB BE CHES ------! -----
वर्ष १२ किरण ४
विश्व तत्त्व-प्रकाशक
स
ॐ अहम
का
नीतिविरोधध्वंसी लोकव्यवहारवर्तकः सम्यक् । | परमागमस्य बीजं भुवनैकगुरुर्जयत्यनेकान्तः ॥
सम्पादक — जुगलकिशोर मुख्तार 'युगवीर'
वीर सेवामन्दिर, १ दरियागंज, देहली
भाद्रपद वीरनि० संवत् २४७६, वि० संवत् २०१०
ज्ञानी का विचार
( कविवर द्यानतराय)
ज्ञान ऐसो ज्ञान विचारै ।
राज सम्पदा भोग भोगके, बंदी खाना धारे ॥ १ ॥ धन यौवन परिवार आपतैं, प्रोछो और निहारै दानशील तपभाव आप, ऊँचे माहिं चितारै ॥ २ ॥ दुख आए पै धीर धरै मन, सुखवैराग सम्हारै | आतम-दोष देख नित भूरे, गुन लखि गरब विडारै ॥ ३ ॥ आप बड़ाई परकी निन्दा, मुखतैं नाहि उचारै । आप दोष परगुन मुख भाषै मनतैं शल्य निवारें ॥ ४ ॥ परमारथ विधि तीन योगसौं, हिरदे हरष विथारै । और काम न करें जु करै तो, योग एक दो हार ॥ ५ ॥ ग वस्तु को सोचै नाहीं, आगम चिन्ता जारै । वर्तमान वर्तै विवेकसौं, ममता-बुद्धि विसारै ॥ ६ ॥ बालपने विद्या अभ्यास, जोवन तप विस्तारै । वृद्धपने संन्यास लेयके, आतम काज सँभारै ॥ ७ ॥ छहों दर नव तत्व माहि तैं, चेतन सार निहारै । 'द्यानत' मगन सदा निज माहीं. आप तरे पर तारै ॥ ८ ॥
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वस्तु तत्त्व-संद्योतक
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mikla
एक किरण का मूल्य | )
सितम्बर
१६५३
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दशलाक्षणिक धर्मस्वरूप
(कविवर रइधू) [ तेरहवीं शताब्दीके विद्वान कविवर रइधूने जिनकी संजादा अइविसमा इय मण्णिविणो खमा चत्ता ॥१० बनाई हुई दशलक्षण पूजाकी जममाल दशलक्षण पर्वमें जइजि परीसह-संगरि-कसाय-सुहडेण ताडमाणेण। प्रायः सर्वत्र पढ़ी और व्याख्यान की जाती है, 'वृत्तसार' जइ खमदुग्गं छंडसि ता खयजामीह कयणिच्छ..११॥ (चारित्रसार) नामका एक सुन्दर ग्रन्थ प्रायःप्राकृत भाषामें मिच्छाइट्ठी मूढो जइ सो पीडेइ ता जि णवि दोसो। गाथाबद्ध रचा है. जिसके रचने में हालू साह अग्रवालके पुत्र जंहउं विवेय-जुत्तो कोहं गच्छेमि तंपिणो णा॥१२।। श्राद साह खास तौरसे प्रेरक हुए हैं और इस लये जो जइ दुव्वयणं जंपिवि मज्झ सुही होइ दुज्जणो दोसी। उन्हींके नामाङ्कित किया गया है। यह ग्रन्थ अभी तक ता महु जीविययवं सहलं भवदीह लोयम्मि ।।१३।। प्रकाशमें नहीं पाया है। इसमें दशलक्षण धर्मके स्वरूप- कम्मोदए पवरणे भव्वु वियारेइ एम पियचित्ते । वर्णन-विषयका एक सर्ग (अंक) ही भलग है, जो प्रकृत एहु वि णो अण्णाओ कियकम्मं जं फलं देइ ॥१४॥ विषय पर अच्छा प्रकाश डालता है और काफी सरल ज मई चिरभवि विहिदं सुहासुहं कम्म तजि सुहदुक्खं । तथा सुबोध है । अतः इस शुभ अवसर पर इसे यहाँ उद्धृत देइजि णियमादो इह णिमित्तमत्त पुणो अपणो ।।१।। किया जाता है। पूरे ग्रन्थको वीरसेवामन्दिरसे सानुवाद महु उतमखम णिसुवि वइरियणा छेय-भेयणाई हिं। प्रकाशनका भी विचार चल रहा है।
तं पेक्खु णत्थि आया खणु विम छंडेहि सा धीरा ॥१६
-सम्पादक ] हउं महवय-भर-कुसलो विवेय-जुत्तो वि पावणा संतो। उत्तम-क्षमा
णिम्ममओ विणियकाए कोहं गच्छंतु लज्जेमि ॥२७॥
जह जह कुवि उवसग्गो करेइ सवणस्स तह तह चेव । असमत्थेण जि विहिदं उवसग्गं जइ सहेइ सु-समत्थो। ता होइ उत्तमा सा खमा जि सग्गाणिस्सेणि ॥१॥
उत्तमखमा सुवणणं अहिययरं णिम्मलं होइ ॥१८।। चिरकियकम्में सुहु-दुहु लम्भइ चिक्तम्मि एवमएणतो।
जं पुणकारणजादे खमागुणं होई तं ज क य संसं । णो रज्जदि णो कुद्धदि उत्तमखम भावदे णिच्चं ॥२ ।
णिक्कारणेण कोई अस्थि खमा-वग्जिदो लोगो ॥१ णीयजणहिं अवगणिदो उत्तमुसाहूवि झाण सामत्थं ।
तव-संजम-सीलाणं जणणी को ग्गि-तात्र-मण-विट्ठी णो कुद्धदि तम्सोवरि सकम्म-विलयं वियाणंतो ।।३।।
सिवगइ बहुहि सहिल्ली उत्तमरूम पावणा किच्ची तव-संजम-आरामं चिरकालेणावि पालिदं फलदं।
जो गुरुयणाणदासं लज्जा-भय-गारव-वसादो ऊ। तं कोहग्गिउदिण्णा पज्जालयदीह लीलेव । ४॥ .
सहइ ण सा उक्.मखमा तीज खमा णाममत्त य ॥२१॥
हउ कोसिदोण णिहदा णिहदोविण मारिदो य दयचत्त कोहंधु डहइ पढम अप्पाणं एत्थु संजमाधार। अण्णस्स डहदि णो वा इदि मएिणवि तंण कायव्वं ॥५ मरणे पत्तु वि तहवि हु ण कोहयामीदि मे बुद्धा उक्तंच-दसणणाणचरित्तहिं अणग्घरयहि पूरियं सददं
उत्तम-मादव मणकास लुटिज्जइ कसायचोरेहिं कर्याणच्छं ॥६॥ माणकसाएं छडिवि किज्जइ परिणामु कोमलं जत्थ । विहु ल यस्स विरुद्ध दुग्गइ गमणस्स सहयर णिच्चं। सव्वहं हिउ चिंतिज्जइ महवगुणभासिदो तत्त्थ ॥२३॥ तं कोहं मुणिणाहे उत्तम खमयाए जेयव्बं ।।७। संजम-वय-तव-मुलं पसत्थ-धम्मस्स कारणं पढमं । जो उवसग्गु वियंभिवि कम्म-गदं मझ फेडई विविहं। चित्तविसुद्धीहेदो महवं अंगो य कायव्वो ॥२४॥ सो णिक्कारणमित्तो तस्स रुसंतो ण लज्जेमि ॥८॥ काय वाइय तह पुणु माणसियं होइ विणउ तिहभेए। मह कय-कम्मंणासइ अप्पाण विणासएदि परलोयं । महवजुत्तणराणं तंचेव जि पायर्ड होदि २५ जोसई दुग्गइ गिवडइ तहु रूसंता ण साहेइ ॥६॥ उक्त च-कित्ती मित्ती माणस्स भंजणं गुरुयणे य बहुमाणं सिवमग्गि गम्ममाणे मज्झ परिक्खा कारणे विग्धा। तित्थयराणं आणा गुण-गहणं महवं होइ ।।२६।।
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किरण ४]
दशलाक्षणिक धर्मस्वरूप
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उत्तम-आर्जव
उत्तम-शौच अज्जवणामेण गुणं मायासल्लस्स होइ णिएणसे। परवत्थुलोहरहिदो चित्तो भव्वस्स होइ पुण जाया। मण-परिणाम-विसुद्धी तेण विणा णेव संभवइ ॥२७ ।
तइया सोचं णेयं ए/ तित्थजल-खालणे सोचं ॥४॥
मिच्छत्तमलविलित्तो विसयकसाएहिं मुज्झिदो जीवो। जं किंचिजि णियमाणसि चिंतदि भव्वो य तंजि वयणेण
तिच्थजलेण विण्हाणे किह सोचो होदि भो आद ॥२५ लोयहं अग्गइ अक्खइ तमज्जवं णाम धम्मंगं ॥२८॥ रिजु परिणाम अज्जव सुहगइ-गमणस्स कारणं तं जि।
परधापरबहुसंगे जं जिच्छिहा ताहि चाए तं धम्मो । मणकूर पावं दुग्गइ-पह संबलं त चि ॥२६॥
' पावस्स मूलुलोहो तम्हा लोहो ण कायब्वो ॥४६॥ जिह सिसु णियघरवत्थू पुच्छंताणं-णराणमहियाणं ।।
जो पुणु वय-तव-सुद्धो देहाइय दव्य-णिम्ममो संतो। घरमम्मु सच्चु अक्खइ तिह अज्जवधम्मसंजुत्तो ॥३०
। सो रय-मलिणु वि देहे परमसुई णिम्मलो सिट्ठो ॥४॥ इह पर लोयहि य माया-च हि अज्जवं धम्म ।
देहो बहुमलकिण्णो जलभारे हाविदो ण सुज्मेइ। तं पालिज्जइ भव्वें सिव-पय-गमणाउरेणेव ॥३१॥
मज्जपओरिउ कुभो बाहिरपक्वालिदोपि सोअसुइ ॥४८ अज्जव धम्महु मूलं सज्माणसिद्धीयरं हि तवसारं।
केस णह-दंत आई चेयणसंगेण तेवि सुपवित्ता । त्ण विणा गुणवंतु वि समाइउ वुच्चदे लोए ॥३२॥
कप्पूराइवि दव्या भव्ववि मालिणाय देहस्स ॥४६॥ चेयणरूवमखंडं विगयवियप्पं सहावसंसिद्ध।
उत्तम-सयम णाणमउ अप्पाणं अज्जवभावेण विप्फुरदि ॥३३॥
तस-थावर-जीवाणं मणवयकारण रक्खणं जत्थ ।
पाणासंजम णाम हवइ धुओ पावणो तत्स्थ ॥५०॥ उत्तम-सत्य
पचिंदियमणुछउ सग सग-विसएस णिच धावंतो। अलियाला वयणीह अदंतुरा मम्मछेयणे णिच्चं। रुधिविजहिं धारिजहि-इदियसंजम होइ ॥५१॥ लोहेण कलुसिदा जा ण हवदि जीहाय सा छुरिया ॥ ४ संमायिफच्छेदोपस्थापनापरिहारविशुद्धि जसु वयणादो वयणं अलियं णिग्गमइ तं जिणउ वयणं सूक्ष्मसांपराययथाऽख्यातभेदेन संयम: पंचविधोभवति विवरसमाणं णेयं जीहा अहिणी णिवासत्थे ।। ३५ सावज्जकिरियविरमणलक्खणपरिणामशुद्धियरणं हिं। ही हो अलियपभासी परसंतावीय णिदयारीय। चारित्त भारधरण सामाइय णाम तं णैयं ॥ ५२ ॥
जि णामग्गहणं ण कायव्वं ॥३६॥ आप्पसरुवि सचितो जंठाविज्जइ खणे खणे खलिदो। जो पुणु भणदि असच्चंणासदि तस्सेव संजमं सीलं। छेदोवट्टवणयं चरणं तं चेबणायव्वं ॥५३।। परमअहिंसाधम्म हवइण तं भव्व मोत्तव्वं ॥३॥ पडि दिण गाओ मत्तं विहरदि मोहक्खएप सीलदो। णउ भासिज्जइ अलियं भासा विज्जइण अण्णु णरुमंडि कारणु किंचि लहेप्पिणु तिठ्ठई छम्मास एक्कपाएण ॥५४ भासिज्जं तु सचित्ते अणुमणणं णेव कायव्वं ॥३८॥ परिणामसुद्धिहेदो णिवसंतो अयणु माणु सो सवणो। जह हह पत्तविओवो भामिणि घर लच्छि जोज विहडेड पावदि केवलणाणं णहचारणरिद्धिवासा हू ॥५॥ णियपाणविजई गच्छहि तहावि णो भासदेसच्चं ॥३६॥ इदि परिहारविशुद्धी चरियं सुहमति संपरायहि । सच्चेण गरो लोयहि देवसमाणो वि मराबादे एल्थु। उवसमियकसायखएण दुदहमे गुणठाणितुरियहि ॥५६ माणाझयणं तं तं मतं सुत्तं पविप्फुरदे ॥४०॥ चरित्तमोहपयडी खीयंति मुणीसरस्स सज्झाणे । परदोसं जो पयडड णियगण अणहांत लोएस्थिरते। जहि रिद्धि लद्धि तत्स्थजि जहखायं संजमं होदि ॥२७॥ गिदइ संजििणयरं तंपि असच्चं महादासं ॥४॥ छठ्ठम गुणसु पढमं छह सग वसु णवमि विदिय पुणुतिदियं जं परसवणहं सुलं हिंसामूलं हि जंजि पावड्ढं। दहमगुणठाणि तुरियं सेसठ्ठाणे जहाखायं ॥८॥ परमम्मोच्चेडणय सच्चमवीदं असच्चं तं ॥४२॥
उत्तम-तप सच्चं तं बोल्लिज्जइ उवएसिज्जेह तंजि फुडु सच्चं। णरभउ पाविवि दुलह कुलं विशुद्ध लहेवि वरबुद्धी। आयरणिज्जं सच्चं तेण जुदं सव्वु सकियत्त्थं ॥४॥ घरमोहं मेल्लेप्पिणु तवं पवितं हि कायव्व ॥१६॥
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११०]
बज्मन्भतरभेए' तवं तदंतीह भव्व सिम्मोहा । अप्पा झाति य लहूति णिरु सासयं सुक्खं ॥ ६० ॥ वरिसाले तरुमूले सिसरे चहुहट्ट गिम्हि गिरिसिहरे । माणे ठंता भव्वा तवं तवंतीह सत्तीए ॥ ६१ ॥ तवेण जि दंसणु सोहइ गाणं सोहेइ तेण सुयसयलं । जिद्द काय कडय लग्गो रय अणग्धो य सांइ ॥ ६२ ॥
अनेकान्त
[ किरण ४
सिंह कम्मदेह मिलिदो अप्पा मलिणो ण कइया वि ॥ ७३ ॥ चेयण अचेयणं गुणु मुणि वि उवादेय हेय जो भव्वो । भावदि गाणसरुवं तमकिंचण भासियं धम्मं ॥७४॥
1
उत्तम ब्रह्मचर्य
परमो बंभो जीवो सरीरविसएहिं वज्जिदो णिच्च' । तस्सार पुगु पुगु तं धम्मं बंभचेरक्खं ॥ ७५॥ जुवई संगं जत्थ जि मणवयकाएण णिच्च चयणिज्जं । तत्त्थेव बंभवज्जं भांति सूरी जुदा ते ॥ ७६ ॥ तव -णियम संजमाणि य कालकिले साथि भूरिभेयाणि । बवरण विणा वीलियराणीह सव्वाणि ॥७७॥ सिद्धतसत्थाणिरणा मईयमंदा हवेइ का मिस्स । विण्यायारादिय तह णासंति अबभचारिस्स ॥७८॥ इ भवयस्स कमवि सिविणे मते वि एइ अइयारो । पायच्छित्ते भव्वा तावदु सोहति अप्पणं ॥७६॥ जे तव वय-मज्जायं उल्लंघि वि सेवदीह तिय-सुक्खं । लाह' समाणा अमा यो अण्णा अस्थि तिल्लोए ॥८॥ मणसंभूदं मयणं मणविक्खेवेण तस्स विथ । तं ठाविदं सरुवे जइवर विदेहिं केम वयभंगो ॥१॥ जेविसीकउ चित्तो मित्तो वेरग्गु तच्च श्रभ्भासो । तह चिह बंभव्व कयाइ वियलेइ यो लाए ॥ ८२ ॥ मणविक्खेवणारी महिला तहि संगि केम वयसुद्धी । वयभंगेण वराओ भमदि भवे चउगई दुग्गे ॥८३॥ उ॒क्त'च-जूकाधामकचाः कपालमजिनाच्छादं मुखं योषिताँ तच्छिद्र नयने कुचौ पलभरौ बाहू तते कीकसे । ८४ तु मूत्र मला दिसद्मजघनं प्रस्पंदिवर्चो गृह' । पादस्थूणमिदं किमत्र महतां रागाय संभाव्यते ॥८५॥ रायो जणणिय महिलामुहलालपान असत्तो । चंदमुही इदि मणिवि पयासए ताहि गुणरुवं ॥ ८६ ॥ ते कई खोसवणा व बुहा गाभाणधराणो । जे पुर सराय भावें महिला रुवं पवणंति ॥८॥ साही- सुहं इंडिवि पर आसिदसुक्खे करइ जो राओ। पिच्छयदो । श्रमियरसं मेल्लिबि सो पिवदि विसं पाणखययारो॥८८॥
उत्तम त्याग
धम्मतरुस्स जि बीयं गुणगणधामंजस्सस्स वित्थरणं । चायं कायव्वं इह भब्वेण जि जम्मभीदेश || २|| दुल्लइयरे जिगरभवि सिवि सभावि जीविदेविते । जो ण वि करेइ चाए ं सो मूढो वंचिओ विहिणा ॥६३॥ जं भट्ट पुत्तलत्ताइ पोस|त्थे । जं वित्तं तं थक्कइ थिरु पत्तयदा ॥ ६४॥ असम किलेसहिं जंधणु समज्जियं रक्खियं पिजयोग तरस फलं मुणिचाएं होइ फुडं तेण विणु विहलं ६५ || मोक्खरस हेदुभूदं तवं पवित्तं सझाणणाणंच | सिफइ काए हाँति तस्स हिंदी अएए दो सिठ्ठा ॥ ६३ ॥ हत्थ भव्व सावय पत्तत्ति भेएसु चारिवरदाणं । जच्छंति णिच्च सुहृदं तं चाएं भासिदंसुते ||६|| धम्मस्वाणं भव्वहं सिस्साएं पाठणं च उवएसं । मग्गपट्टण करणं अरण्याराणं हि तं चाएं ॥ ६८ ॥
हवा दुट्ठ वियप्पं उत्पज्जं तारा जं जि परिचाओ । तं पुण परमं चाएं कायव्वं अप्पसिद्धीए ॥ ६६ ॥ उत्तम आकिंचन्य
सयलाणं संगाणं जत्थ महावो हवेइ दुविहाणं दिवे सुवितो किंचणु धम्मु तं ॥ ७० ॥ सयल-वियर-विरहिदो अतरणारा इधम्मसंपुरणो । सुद्धो चेरूवो जीवो आईंचरणो डऽणो ॥७१॥ दव्वाण पयस्थाणं तच्चाणं भेयलक्खणं याओ । चेयणरूपं गिरहृदि तमकिंचण धम्ममवि सिद्ध ॥७२॥ जिह किट्टियम्मि मिलिदो कराउ असुद्ध ग होइ
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भक्तियोग-रहस्य
जैनधर्मके अनुसार, सब जीव द्रव्यदृष्टिसे अविकसित, अल्पविकसित, बहुविकसित और पर्णअथवा शुद्धनिश्चयनयकी अपेक्षा परस्पर समान हैं- । विकसित ऐसे चार भागोंमें भी उन्हें बांटा जा सकता कोई भेद नहीं-सबका वास्तविक गुण-स्वभाव एक है
है। और इसलिए जो अधिकाधिक विकसित हैं वे ही है। प्रत्येक जीव स्वभावसे ही अनन्त दर्शन, अनंत
स्वरूपसे ही उनके पूज्य एवं आराध्य हैं जो अविकज्ञान, अनन्त सुख और अनन्त वीयोदि अनन्त
सित या अल्पविकसित हैं; क्योंकि आत्मगुणोंका शक्तियोंका आधार है-पिण्ड है। परन्तु अनादि
विकास सबके लिये इष्ट है। कालसे जीवों के साथ कममल लगा हुआ है, जिसकी ऐसी स्थिति होते हुए यह स्पष्ट है कि संसारी मूल प्रकृतियां आठ, उत्तर प्रकृतियाँ एकसौ अड़तालीस जीवोंका हित इसीमें है कि वे अपनी विभाव परिणऔर उत्तरोत्तर प्रकृतियाँ असंख्य हैं । इस कर्म-मलके तिको छोड़कर स्वभावमें स्थिर होने अर्थात् सिद्धिको कारण जीवोंका असली स्वभाव आच्छादित है, उनकी प्राप्त करने का यत्न करें। इसके लिए आत्न-गुणोंका वे शक्तियाँ आवकसित हैं और वे परतन्त्र हुए नाना परिचय चाहिये, गुणमें वर्द्धमान अनुराग चाहिये प्रकारकी पर्यायें धारण करते हुए नजर आते हैं। और विकास-मार्गकी दृढ श्रद्धा चाहिये। विना अनुअनेक अवस्थाओंको लिये हुए संसारका जितना भी गगके किसी भी गुणकी प्राप्ति नहीं होती-अननुरागी प्राणिवर्ग है वह सब उसी कर्ममलका परिणाम है- अथवा अभक्त हृदय गुणग्रहण का पात्र ही नहीं, विना उसीके भेदसे यह सब जीव-जगत भेदरूप है. और परिचयके अनुराग बढ़ा नहीं जा सकता और विना जीवकी इस अवस्थाको विभाव-परिणति' कहते हैं। विकास-मार्गको दृढ श्रद्धाके गुणों के विकासकी ओर जब तक किसी जीव की यह विभ व परिणति बनी रहता यथेष्ट प्रवृत्ति ही नहीं बन सकती। और इस लिये है, तब तक वह 'संसारी' कहलाता है और तभी तक अपना हित एवं विकास चाहनेवालोंको उन पूज्य महा उसे संसारमें कर्मानुसार नाना प्रकारके रूप धारण पुरुषों अथवा सिद्धात्माओंकी शरणमें जाना चाहिये. करके परिभ्रमण करना तथा दुःख उठाना होता है; उनकी उपासना करनी चाहिये, उनके गुणोंमें अनुराग जब योग्य साधनोंके बलपर यह विभाव-परिणति बढ़ाना चाहिये और उन्हें अपना मार्ग-प्रदर्शक मानमिट जाती है-आत्मामें कर्म-मलका सम्बन्ध नहीं कर उनके नक्शे कदम पर चलना चाहिये अथवा रहता और उसका निज स्वभाव सर्वाइंगरूपसे उनकी शिक्षाओं पर अमल करना चाहिये, जिनमें अथवा पूर्णतया विकसित हो जाता है, तब वह आत्माके गुणोंका अधिकाधिक रूपमें अथवा जीवात्मा संसारपरिभ्रमणसे छूटकर मुक्तिको प्राप्त हो पूर्णरूपसे विकास हुआ हो; यही उनके लिये कल्याजाता है और मुक्त, सिद्ध अथवा परमात्मा कहलाता है, यका सुगम मार्ग है । वास्तवमें ऐसे महान् आत्माओं के जिसकी दो अवस्थाएँ हैं—एक जीवन्मुक्त और दूसरी विकसित आत्मस्वरूपका भजन और कीर्तन ही हम विदेहमुक्त । इस प्रकार पर्यायदृष्टिसे जीवोंके 'संसारी' संसारी जीवोंके लिए आत्माका अनुभवन और मनन और 'सिद्ध' ऐसे मुख्य दो भेद कहे जाते हैं, अथवा है, हम 'सोऽहं ' की भावनाद्वारा उसे अपने जीवनमें
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उतार सकते हैं और उन्होंके - अथवा परमात्मस्वरूपके - आदर्शको सामने रखकर अपने चरित्रका गठन करते हुए अपने आत्मीय गुणका विकास सिद्ध करके तद्रूप हो सकते हैं । इस सब अनुष्ठानमें उनकी कुछ भी गरज नहीं होती और न इसपर उनकी कोई प्रसन्नता ही निर्भर है - यह सब साधना अपने ही उत्थान के लिए की जाती है । इसीसे सिद्धिके साधनोंमें ‘भक्ति-योग' को एक मुख्य स्थान प्राप्त है, जिसे 'भक्ति मार्ग' भी कहते हैं ।
अनेकान्त
सिद्धिको प्राप्त हुए शुद्धात्माओं की भक्तिद्वारा आत्मोत्कर्ष साधने का नाम ही 'भक्ति योग' अथवा 'भक्ति-मार्ग' है और 'भक्ति' उनके गुणोंमें अनुरागको, तदनुकूल वत्र्त्तेनको अथवा उनके प्रति गुणानुरागपूर्वक आदर-सत्काररूप प्रवृत्तिको कहते हैं, जो कि शुद्धात्मवृत्तिकी उत्पत्ति एवं रक्षाका साधन है । स्तुति, प्रार्थना, वन्दना, उपासना, पूजा, सेवा, श्रद्धा और आराधना ये सब भक्तिके ही रूप अथवा नामान्तर हैं। तुति-पूजा-वन्दनादि रूपसे इस भक्तिक्रियाको 'सम्यक्त्ववर्द्धिनी क्रिया' बतलाया है, शुभोपयोग चारित्र' लिखा है और साथ ही 'कृतिकर्म भी लिखा है जिसका अभिप्राय है पापकर्म छेदनका अनुष्ठान ' । सद्भक्तिके द्वारा औद्धत्य तथा अहंकार के त्याग पूर्वक गुणानुराग बढ़नेसे प्रशस्त अध्यवसायको कुशल परिणामकी - उपलब्धि होती है और प्रशस्त अध्यवसाय अथवा परिणामोंकी विशुद्धिसे संचित कर्म उसी तरह नाशको प्राप्त होता है जिस तरह काष्ठके एक सिरे में अग्निके लगनेसे वह सारा ही
"
[ किरण ४
काष्ठ भस्म हो जाता है । इधर संचित कर्मोंके नाशसे अथवा उनकी शक्तिके शमनसे गुणावरोधक कर्मों की निर्जरा होती या उनका बल क्षय होता है तो उधर उन अभिलषित गुणोंका उदय होता है, जिससे आत्माका विकास सकता है । इसीसे स्वामी समन्तभद्र जैसे महान् आचार्योंने परमात्मा की स्तुतिरूप में इस भक्तिको कुशल परिणामकी हेतु बतलाकर इसके द्वारा श्रेयोमार्गको शुलभ और स्वाधीन बतलाया हैं और अपने तेजस्वी तथा सुकृती आदि होनेका कारण भी इसीका निर्दिष्ट किया है और इसी लिये स्तुति वन्दनादिके रूप में यह भक्ति अनेक नमित्तिकं क्रियाओंमें ही नहीं, किन्तु नित्यकी षट् आवश्यक क्रियाओंमें भी शामिल की गई है, जो कि सब आध्यात्मिक क्रियाएँ हैं और अन्तर्दृष्टि पुरुषों ( मुनियों तथा श्रावकों ) के द्वारा आत्मगुणोंके विकासको लक्ष्य में रखकर ही नित्य की जाती हैं और तभी वे आत्मोत्कर्ष की साधक होती हैं । अन्यथा, लौकिक लाभ, पूजा-प्रतिष्ठा, यश, भय, रूढ़ि आदि के वश होकर करनसे उनके द्वारा प्रशस्त अध्यवसाय नहीं बन सकता और न प्रशस्त अध्यवसाय के विना संचित पापों अथवा कर्मोंका नाश होकर आत्मीय गुणोंका विकास ही सिद्ध किया जा सकता है । अतः इस विषय में लक्ष्वशुद्धि एव भावशुद्धि पर दृष्टि रखनेकी खास जरूरत है, जिसका सम्बन्ध विवेकसे है । विना विवेकके कोई भी क्रिया यथेष्ट फलदायक नही होती, और न विना विवेककी भक्ति सद्भक्ति ही कह लाती है ।
श्री पण्डित जुगलकिशो (जी मुख्तार
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वीतराग-स्तवन' के रचयिता अमर कवि
(श्री अगरचन्द नाहटा) अनेकान्त वर्ष १२ किरण ३ के प्रथम पृष्ट पर अमर- कवि अमरचन्द्रका समकालीन ग्रन्थकारोंमें सबसे कवि-रचित 'वीतराग-स्तवनम्'प्रकाशित हुआ है। महावीर- पहला उल्लेख सं. ११३४ में रचित प्रभाचन्द्रसूरिके जी अतिशय क्षेत्रके शास्त्र-भंडारकी सं० १८२७ की लिखित प्रभावकचरित्र में पाया जाता है । इस ग्रन्थके जीवदेवसूरिप्रतिसे नकल करके इसे प्रकाशित किया गया है । सम्पाद- प्रबन्धके अन्तमें कहा गया है "जिनके वंशमें आज भी कीय नोटमें इसके रचयिवाके सम्बन्धमें लिखा है कि- अमर जैसे तेजस्वी प्रभावक हैं" श्लोक इस प्रकार है"इसके कर्ता अमरकवि, जिनके लिये पुष्पिकामें 'वेणी "अद्यापि तत्प्रभावेण तस्य वंशे कलानिधिः भवे प्रभावककृपाण' विशेषण लगाया गया है, कब हुए है और उनकी सूरिरमराभ स्वतेसा ॥२००॥'इस उल्लेखसे मुनि कल्यादूसरी रचनायें कौन-कौन हैं यह अभी अज्ञात है। ग्रन्थ णविजयजीने आत्मानन्द जैनसभा भावनगरसे प्रकाशित प्रति सं० १८२७ की लिखी हुई है अतः यह स्तवन इसके इस ग्रन्थकी गुजराती अनुवादके पर्यालोचनमें यह सूचित पूर्वकी रचना है इतना तो स्पष्ट ही है, परन्तु कितने किया है कि सं० १३३४ तक जबकि यह प्रभावकचरित्र पूर्वकी है यह अन्वेषणीय है।"
बना, कवि अमरचन्द विद्यमान थे। इसीलिये 'अद्यापि' इस सम्पादकीय टिप्पणीको पढ़ते ही 'वेणीकृपाण' शब्द व्यवहृत हुमा है। इस उल्लेखसे इस कविकीविशेषण वाले श्वेताम्बर बायड़गच्छीय जिनदत्तसूरिके शिष्य प्रसिद्धि व महत्वका भली भांति पता लग जाता है। समकवि चक्रवर्ती अमरचन्दका स्मरण हो आया। यह स्त्रोत्र कालीन विद्वान उस वंशके महत्वको बतलानेके लिये उस भी सम्भव है किसी श्वेताम्बर जैनस्तोत्रसंग्रहमें प्रकाशित वंशके तेजस्वी नक्षत्रके रूपमें कवि अमरचन्द्रका नामोल्लेख हो चुका हो इस विचारसे 'जैनस्तोत्रसंदोह' प्रथम भागके करता है यह उनके लिये कम गौरवकी बात नहीं। अंतमें प्रकाशित जैनस्तोत्रोंकी सूची छपी है उसे देखने सं० १४०५ में रचित प्रबन्धकोश' अपरनाम 'चतुपर विदित हुया कि यह स्तोत्र भ्रातृचन्द्र ग्रन्थमाला विंशतिप्रबन्ध' में तो इस कविका परिचायक स्वतंत्र प्रबंध अहमदाबादसे प्रकाशित जिनेन्द्रनमस्कारादि संग्रह में प्रका- (१३) ही पाया जाता है । उस प्रबन्धके अनुसार वायड़शित होने के साथ-साथ प्रस्तुत जैनस्तोत्रसंदोह प्रथम भाग- गच्छके परकायप्रवेश विद्यासम्पन्न जीवदेवसूरि (जिनका में भी छपा है। इन दोनों ग्रन्थों में यह 'सर्वजिनस्तव' के प्रबन्ध भी इसी ग्रंथमें है) के सतांनीय जिनदत्तसूरिके नामसे अज्ञात रचयिता (निर्माणकार) के उल्लेखसह छपा बुद्धिमानोंमें चूड़ामणि आप सुशिष्य थे । कविराज अरिसिंहहै । परन्तु इस जैनस्तोत्रसंदोह ग्रन्थमें प्रकाशित स्तोत्रोंकी से इन्हें 'सिद्धसारस्वत' मंत्र मिला, जिसकी आराधना २१ अनुक्रमणिकाको देखने पर वहाँ रचयिताका नाम 'अमर- दिन तक आचाम्ल तपके साथ निद्राजय, आसनजय, कषायचन्द्रसूरि' लिखा हुआ मिला। इससे विदित होता है कि जय करते हुए एकाग्र चित्तसे की थी। स्वगच्छके महाइस ग्रन्थके पृ०२६ में जब इस स्तोत्रका मुद्रण हुश्रा तब भक्त विवेकके भंडार रूप कोष्टागारिक पद्मश्रावकके भवनइसके रचयिताका नाम ज्ञात न हो सका था, परन्तु इसके के एकान्त भागमें साधना करते हुए श्राप पर सरस्वतीदेवी सम्पादक चतु विजयजीको इस ग्रन्थकी अनुक्रमणिका प्रसन्न हुई और २१वें दिन प्रत्यक्ष प्रगट होकर अपने तैयार होनेके समय इसके रचयिताके नामका आधार मिल कमंडलुका जल पिलाते हुए इन्हें वरदान दिया कि 'तू गया । इसीलिये प्रस्तावनामें स्तोत्रकारोंका परिचय देते हुए सिद्ध कवि और राजमान्य होगा।' हुआ भी वैसा ही। अमरचन्द्रसूरिका परिचय भी दिया गया है। अनेकान्तके आपने काव्यकल्पलता (कविशिक्षा), छंदोरत्नावली, सम्पादक और पाठकोंकी जानकारीके लिये इस स्तोत्रके सूक्तावली, कलाकलाप एवं बालभारत नामक ग्रन्थोंकी रचयिता अमरचन्द्र कविका संक्षिप्त परिचय यहाँ प्रकाशित रचना की । बालभारतके सर्ग ११ श्लोक ६ में प्रभात कर रहा हूँ। विशेष जाननेके लिये आपके जो तीन ग्रन्थ समयका वर्णन करते हुए आपने इस भावको दर्शाया है प्रकाशित हो चुके हैं उनकी प्रस्तावना देखना चाहिये। महादेवकी तपःसाधनासे कामदेव हतप्रभाव हो चुका
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११४ ]
था, पर दही विलोती हुई स्त्रियोंकी वेणीकां इधर उधर घूमती हुई देखकर मालूम होता है कि मदन पुनः अपना प्रभाव विस्तार करता हुआ मानो तलवार चला रहा है । बेणी कृपाणके इष्टान्त रूप अनोखी सूझको देखकर कवियों ने इनका विरुद 'वेणीकृपाय' के नामसे प्रसिद्ध कर दिया।
अनेकान्त
महाराष्ट्र में आप राजाओंसे पूजित हुए और महाकविरूपमें ख्याति प्राप्त की, जिसे सुनकर विद्याप्रेमी गुर्जरेश्वर वीसलदेवने अपने प्रधान जलायें भेजकर अपनी राजधानी धवलक में बुलाया । जिस दिन आप सभामें उपस्थित हुए राजकवियोंने विविध विचित्र समस्यायें देकर आपकी कविप्रतिमाकी परीक्षा ली । प्रबंधकोष में कहा गया है कि इस विद्याविनोदमें राजसभा के लोग इतना काव्य- रसानुभव करने लगे कि सभासदों और राजाने उसदिनका भोजन भी नहीं किया। कवि अमरके काव्यरसके श्रास्वादसे मानों उनका उदर लबालब भर गया । १०८ समस्याओंकी पूर्ति करके आपने मंडली और राजाको चमकृत कर दिया। फिर तो राजसभामें आपका बढ़ा सम्मान होने लगा और इनके विशेष प्रभाव एवं समागम से बीसलदेव जैनधर्मका प्रेमी बन गया। प्रबन्ध कोश के अनुसार नृपति जैन मंदिरोंमें नित्य पूजा करने लगा था।
एक बार राजा ने आपसे इनके कलागुण के सम्बन्ध में पूछा तो आपने अरिसिंह का नाम लिया। नृपतिने उसे बड़े सरकार के साथ बुलाया और उसकी काव्यप्रतिभा से प्रसन्न होकर ग्राम आदि भेंट किये। बीसदेवका समय सं० १३०० से १३२० तक का है। कई प्रबंधों में सं० १२३४ से ३१८ तक का भी लिखा है। इसलिये कवि अमरचन्दका समय भी यही सिद्ध होता है । जिस पद्मआय के यहाँ रहकर अपने 'सिसारस्वत' मंत्री आराधनाकी उसके कथनसे आपने 'पद्मानंद महाकाव्य ' बनाया । उपदेशतरंगिणीके अनुसार महामंत्री वस्तुपालको 'अस्मिन्नसारे संसार सारं सारं गलोचना । यत्कुति । प्रभवा एते वस्तुपाला भवादृशः।' इस श्लोकको सुनाकर चमस्कृत करने वाले कवि अमरचन्द ही ये पाटवके गड़ियावाड़ा के जैन मंदिर में आपकी मूर्ति अब भी विद्यमान है। जिसका लेख इस प्रकार है - "संवत् १३४६ चैत्र वदी ६ शनी वायटीय गच्छे श्री जिनदत्तसूरि शिष्य पण्डित
| किरण ४
श्री अमरचन्द्रमूर्तिः पण्डितमहेन्द्र शिष्य-मदन चन्द्राख्येन कारिता शिवमस्तु "
(प्राचीन जैन लेख संग्रह द्वितीय विभागे लेखांक ५२३) प्रस्तुत मूर्ति आपका स्वर्गवास सं० १२४७ के पूर्व ही हो चुका, सिद्ध होता है।
आपके रचित ग्रन्थोंमेंसे 'बालभारत' प्रसिद्ध ग्रन्थ है, जिसे निर्णयसागर प्रेस से प्रकाशित काव्यमाला में प्रकाशित किया जा चुका है। पद्मानंद काव्य आपकी कविप्रतिमा का अनुपम परिचय देता है। यह काव्य गायकवाड़ पीरियन्टल सिरीजसे प्रकाशित हो चुका है। 'काव्यकल्पलता' नामक काव्यशिक्षाका महत्वपूर्ण प्रम्ब चौखम्बा सिरीज, बनारससे प्रकाशित हो चुका है। इनके अतिरिक्त 'स्वादिशब्दसमुच्चय' नामक चौथे अंथको पंडित बाल चन्द भगवानदास गांध ने बहुत वर्षपूर्व प्रकाशित किया है। आपका 'इंदोरनावली प्रम्ब कई श्वेताम्बर ज्ञानभंडारोंमें प्राप्त है, परन्तु अभीतक प्रकाशित नहीं हुआ है। प्रबंधकोपमें उक्लेखित आपके कलाकलाप और सुक्तावली ग्रंथोंकी प्रतिका अभी किसी ज्ञानभंडारोंमें पता नहीं चला । अतः अन्वेषणीय है। सूक्तावली नामक ग्रंथोंकी कई प्रति ज्ञान भंडारोंसे प्राप्त होती है। संभव है, भली भांति जांच करने पर उनमें से कोई प्रति आपके रचित सूक्तावली की भी मिल जाय प्रवन्धकोशमें आपकी की हुई १०८ सम स्याओंकी पूर्तिका निर्देश करते हुए एक दो समस्यापूर्ति वाले श्लोक उद्धृत किये हैं। राजसभा में विद्याविनोद करते हुए समय-समय पर आपने ऐसे प्रासांगिक फुटकर श्लोक और भी रचे होंगे जो प्राप्त होने पर आपकी कवि प्रतिभा का अच्छा परिचय उपस्थित कर सकते हैं । सूक्तावली में सम्भव है कि आपके समस्या पूर्ति और श्लोकोंका संग्रह हुआ हो इसलिये इस ग्रन्थका महस्व और भी बढ़ जाता है । विद्वानोंका ध्यान कवि अमरचन्दके इन दोनों अनुपलब्ध ग्रंथोंकी शोधके लिये आकृष्ट किया जाता है ।
1
फुटकर
इस प्रकार 'वीतराग स्तवनम्' के रचयिता 'वेणीकृपाण ' विशेषण विभूषित महाकवि अमरचन्द्रसूरिका संक्षिप्त परिचय यहाँ उपस्थित किया गया है । कविका 'पद्मानंद 'काव्य' इस समय मेरे सम्मुख नहीं है। संभव है उसकी प्रस्तावनासे और भी कुछ विशेष ज्ञातव्यका पता चले ।
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दशधर्म और उनका मानव जीवनसे सम्बन्ध
( पं० वंशीधरजी व्याकरणाचार्य )
धर्मकी सामान्य परिभाषा
धर्मके वारेमें यह बतलाया गया है कि वह जीवों को सुखी बनाने का अचूक साधन है और यह बात ठीक भी है अतः धर्म और सुखके बीच में अविनाभावी सम्बन्ध स्थापित होता है अर्थात् जो जीव धर्मात्मा होगा, वह सुखी अवश्य होगा और यदि कोई जीव सुखी नहीं है या दुःखी है तो इसका सीधा मतलब यही है कि वह धर्मात्मा नहीं है।
बहुत से लोगोंको यह कहते सुना जाता है कि 'अमुक व्यक्ति बड़ा धर्मात्मा है फिर भी वह दुःखी है' इस विषयमें दो ही विकल्प हो सकते हैं कि यदि वह व्यक्ति वास्तवमें धर्मात्मा है तो भले ही उसे हम दुखी समझ रहे हों परन्तु वह वास्तव में दुखी नहीं होगा और यदि वह वास्तवमें दुःखी हो रहा है तो भले ही वह अपनेको धर्मास्मा मान रहा हो या दूसरे लोग उसे धर्मात्मा समझ रहे हों, परन्तु वास्तव में वह धर्मात्मा नहीं है ।
इस सचाईको ध्यान में रखकर यदि धर्मका लक्षण स्थिर किया जाय, तो यही होगा कि जीवकी उन भावनाथों और उन प्रवृत्तियोंका नाम धर्म है जिनसे वह सुखी हो सकता है शेष जीवकी वे सब भावनायें और प्रवृत्तियां अधर्म मानी जायगीं, जिनसे वह दुखी हो रहा है ।
दशधर्मो के नाम और उनके लक्षण
जीवकी धार्मिक भावनाओं एवं प्रवृत्तियों को जैन संस्कृति के अनुसार निम्नलिखित दश भेदोंमें संकलित कर दिया गया है
समा, मार्दव, आर्जव, सत्य, शौच, संयम, तप, त्याग किञ्चन्य और ब्रह्मचर्यं ।
(१) मा किसी भी अवस्थामें किसी भी जीवको कष्ट पहुँचाने की दुर्भावना मनमें नहीं लाना ।
(२) मार्दव - किसी भी जीवको कभी भी अपमानित करनेकी दुर्भावना मनमें नहीं लाना ।
(३) आर्जव - कभी भी किसी जीवको धोखा देनेकी दुर्भावना मनमें नहीं लाना ।
(४) सत्य — किसी के साथ कभी अप्रामाणिक और अहितकर वर्ताव नहीं करना ।
(१) शौच भोगसंग्रह और भोगविलासकी लालसानका वशवर्ती नहीं होना ।
(६) संयम - जीवन निर्वाह के अरिरिक्त भोगसामग्रीका संग्रह और उपभोग नहीं करना ।
(७) तप - जीवन निर्वाहकी श्रावश्यकताओंको कम करने के लिए आत्माको स्वावलम्बन शक्तिको विकसित करनेका प्रयत्न करना ।
(८) त्याग - आत्माकी स्वावलम्बन शक्तिके अनुरूप जीवन निर्वाहकी आवश्यकताओंको कम करके जीवन निर्वाहके लिए उपयोगमें आने वाली भोग सामग्री के संग्रह और उपभोगमें कमी करना ।
(१) अकिञ्चन्य - आत्माकी स्वावलम्बन शक्तिका अधिक विकास हो जाने पर जीवन निर्वाहके लिये उपयोगमें आने वाली भोग सामग्री के संग्रहको समाप्त करके तृया मात्रका भी परिग्रह अपने पास न रखते हुए नग्न दिगम्बर मुद्राको धारण करना और अव्म कल्याणके उद्देश्य से केवल श्रयाचित भोजनके द्वारा ही शरीरकी रक्षा करनेका प्रयत्न करना तथा विधिपूर्वक भोजन न मिलने पर शरीर - का उत्सर्ग करनेके लिये भी उत्साहपूर्वक तैयार रहना ।
( १० ब्रह्मचर्य - आत्मा की पूर्ण स्वालम्बन शक्तिका विकास हो जाने पर अपने को पूर्ण आत्मनिर्भर बना लेना, जहाँ पर भूख प्यास आदिकी बाधाओंका सर्वथा नाश हो जाने के कारण शरीर रक्षा के लिये भोजन । दिकी आवश्य कता ही नहीं रह जाती है ।
क्षमा यदि छह धर्म और मानव जीवन
इन दश धर्मों में से आदिके क्षमा, मार्दव, आर्जव, सत्य, शौच और संयम इन छः धर्मोकी मानव जीवनके लिये निवार्य आवश्यकता है इसका कारण यह है कि विश्व में जीवोंकी संख्या इतनी प्रचुर मात्रामें है कि उनकी गणना नहीं की जा सकती है इसलिये जैन संस्कृतिके अनुसार जीवोंकी संख्या अनन्तानन्त बतला दी गई है ।
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अनेकान्त
किरण ३
ये सब जीव एक दूसरे जीवके यथायोग्य उपकारी माने गये अनिवार्य आवश्यकता है । प्रामाणिक वर्तावका अर्थ यह हैं । यही कारण है कि जैन-ग्रन्थों में सबसे पहले हमें है कि हम कभी भी किसीको धोखेमें न डालें और हित "सत्वेषु मैत्रीम्" अर्थात् विश्वके समस्त जीवोंके प्रति कारी वर्तावका अर्थ यह है कि हम कभी भी किसीक मित्रता रखनेका उपदेश मिलता है । वास्तवमें जो जीव कष्ट न पहुँचावें और न किसी प्रकारसे कभी उसे अप हमारा उपकारक है उसकी रक्षा करना हमारा परम कर्तव्य मानित ही करें । इस प्रामाणिक और हितकारी वर्ताव कर हो जाता है। यदि हम उसकी रक्षा नहीं करते हैं तो का नाम ही सत्यधर्म बतलाया गया है। हम दूसरोंके साथ इससे हमारे ही अहित होनेकी संभावना बढ़ जाती है ऐसा वर्ताव तभी कर सकते हैं जबकि हमारा अन्तःकरण इसलिये यदि हम अपना ही अहित नहीं करना चाहते हैं पवित्र हो अर्थात् हमारा अन्तःकरण सर्वदा दूसरोंको धोखा तो हमारा यह कर्तव्य हो जाता है कि हम अपने उप- देने, कष्ट पहुँचाने और अपमानित करनेकी दुर्भावनानं कारक दूसरे जीवोंकी रक्षाका पूरा पूरा ध्यान रक्खें, उन्हें से अलिप्त रहे और हम पहले बतला पाये हैं कि अपने अपना मित्र सममें।
अन्तःकरण में दूसरोंको कष्ट पहुँचानेकी दुर्भावना उत्पन्न थोड़ी देरके लिए हम एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय,
न होने देनेका नाम समा धर्म, किसी भी प्रकारसे अपचतुरिन्द्रिय और पञ्चन्द्रिय पशु प्रादिकी बात छोड़ भी मानित करने की दुर्भावना उत्पन्न न होने देनेका भाम दें केवल मनुष्योंको ही लें, तो भी यह मानी हई बात है मादव धर्म तथा किसी भी प्रकारसे धोखेमें न डालनेकी कि सामान्य तौर पर किसी भी मनुष्य का जीवन दूसरे दुर्भावना उत्पन्न न होने देनेका नाम मार्जव धर्म है। मनुप्यकी सहायताके बिना निभ नहीं सकता है । प्रायः इन चारों क्षमा, मादव, आर्जव और सत्य धर्मों के सभी विद्वान यह कहते आये हैं कि मनुष्य एक सामाजिक
अभावमें हम पुरातन कालसे चले आ रहे कुटुम्ब, ग्राम प्राणी है अर्थात् संगठित समाज ही मनुष्यके सुखपूर्वक
आदि संगठनोंको सुरक्षित नहीं रख पा रहे हैं इसलिये न जिन्दा रहनेका उत्तम साधन है अतः सुखपूर्वक जिन्दा तो हमारे जीवन में सुख ही नजर आ रहा है और न हम
नना ही होगा किरित अपनेको सभ्य नागरिक कहलानेके ही अधिकारी हो समाज कैसे कायम रह सकता है?
सकते हैं। इतना ही नहीं, ऐसा कहना भी अनुचित नहीं हमारे पूर्वज बहुत अनुभवी थे, उन्होंने कुटुम्बके रूपमें,
होगा, कि जिसमें उक्त चारों बातें नहीं पायी जातो हैं, ग्रामके रूप में, देशके रूपमें और नाना देशोंमें सन्धि आदि
वह मनुष्य अपनेको मनुष्य कहलानेका भी अधिकारी
नहीं माना जा सकता है। अतः कहना चाहिये कि दूसरोंके के रूप में, मानव जातिके संगठन कायम किये, जो अब तक
प्रति क्षित भावना और दूषित वर्ताव न करके हम अपनी चले आ रहे हैं परन्तु हमारे अन्तःकरणमें संगठनकी
मनुप्यताकी ही रक्षा करते हैं। भावना नहीं रह जाने और एक मनुष्यका दूसरे मनुष्यके
प्रत्येक मनुष्यको अपना जीवन दीर्घायु, स्वस्थ और प्रति अप्रामाणिक और अहितकर व्यवहार चालू हो जाने .
सुखी बनानेके लिये यह भी सोचना है कि वह अन्तःकरणके कारण ये सब संगठन मृतप्राय हो चुके हैं इसलिये
में उत्पन्न अगणित लालसाओंके वशीभूत होकर नाना प्रत्येक मनुष्यको यदि असमयमें ही जीवन समाप्त हो जाने
प्रकारके प्रकृति विरुद्ध असोमित भोगोपभोगोंका जो संग्रह का भय बना रहे या जिन्दा रहते हुए भी उसका जीवन
और उपभोग किया करता है इसमें से पहले तो वह दुःखी बना रहे तो इसमें श्राश्चर्यकी बात ही क्या है।
भोगोपभोगोंके लिए ही काफी परेशान होता है और बादक्षमा, मार्दव, आर्जव और सत्य ये चार धर्म हमें इन
में उनका अनर्गल उपभोग करके अपने शरीरको ही रुग्ण संगठनोंको कायम रखने में मदद पहुंचाते हैं अर्थात् जिन्दा
बना लेता है जिसके कारण या तो उसका जीवन अल्परहने और अपने जीवनको सुखी बनानेके लिये हमें दूसरे
काल में ही समाप्त हो जाता है अथवा औषधियोंके चक्करमनुष्योंके साथ प्रामाणिक और हितकारी वर्ताव करनेकी
में पढ़कर कष्टपूर्ण जिन्दगी व्यतीत करनेके लिए उसे १-परस्परोपग्रहो जीवानाम् । (तत्वार्थ सूत्र अ.५ बाध्य हो जाना पड़ता है अतः जीवनसे इन बुराइयोंको सू० २१)
दूर करने और उसे दीर्घायु, स्वस्थ और सुखी बनानेके
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किरण २]
लिए प्रत्येक मनुष्यका यह श्रावश्यक कर्त्तव्य है कि अनर्गल उपभोग में कारणभूत अन्तःकरण में विद्यमान भोगोपभोग सम्बन्धी लालसाओंको समूल नष्ट कर दे और ऐसे भोगोपभोगका संग्रह और उपभोग जरूरत के माफिक करने लग जाय जो भोगोपभोग जितनी मात्रा में उसकी प्रकृतिके विरुद्ध न होकर उसके जीवनको दीर्घायु, स्वस्थ और सुखी बनाने में समर्थ हों ।
दशधर्म और उनका मानव जीवनसे सम्बन्ध
हम यह भी पहले कह आये है कि उपयुक्त खानसाथको समूल नष्ट कर देनेका नाम शौचधर्म और जरुरतके माफिक प्रकृतिके अनुकूल भोग सामग्रीका संग्रह और उपभोग करने का नाम संयम धर्म है। इस प्रकार जो मनुष्यं पूर्वोक चार धर्मोके साथ साथ शौच और संयम इन दोनों धर्मों को अपने जीवनका अंग बना लेता है वह जैन संस्कृतिके अनुसार सम्यग्दृष्टि अर्थात् विवेकी कहा जाने लगता है ।
सम्यग्दृष्टि मनुष्यका सर्वदा यही खयाल रहता है कि कौन वस्तु कहाँ तक उसके जीवन के लिए उपयोगी हैं और केवल इस खयालके आधार पर ही वह अपने जीवन निर्वाहके साधनों को जुटाता एवं उनका उपभोग किया करता है । वह जानता है कि भोजन, वस्त्र, मकान आदि पदार्थोंकी उसके जीवन के लिये क्या उपयोगिता हैं ? कहने का मतलब यह है कि सम्यग्दृष्टि मनुष्य के अन्तःकरणमें भोग विलासकी भावना समाप्त हो जाती है केवल जीवन निर्वाहकी ओर ही उसका लक्ष्य रह जाता है ।
तप आदि धर्मचतुष्क और मुक्ति
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इस प्रकार सम्बन्दष्टि मनुष्य उमा, मार्दव, सत्य शोच और संयम द्वारा अपने जीवनको दीर्घायु, स्वस्थ और सुखी बनाता हुआ जब यह सोचता है कि उसके जीवनका उद्देश्य आमाको पराधीनतासे छुड़ाकर निर्विकार और शुद्ध बनाना ही है तो वह इसके जिये साधनभूत तप, त्याग, अकिञ्चन्य और ब्रह्मचर्य इन चार धर्मोकी ओर अपना ध्यान दौड़ाता है वह जानता है कि आत्मा पराचीनवासे छुटकारा तभी पा सकता है जबकि उसकी स्वावलम्बन शक्तिका पूर्ण विकास हो जावे, अतः वह इसके लिये अपने जीवन निर्वाहकी आवश्यकता को क्रमशः कम करनेका प्रयत्न करने लगता है उसके इस प्रयत्नका माही उपधर्म है तथा अपने उस प्रयत्नमें सफलता प्राप्त
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करने पर जैसे जैसे उसकी स्वावलम्बन शक्तिका धीरेधीरे विकास होता जाता है वैसे वैसे ही वह अपने जीवन निर्वाहके साधनोंमें भी कमी करता जाता है जिसे त्याग धर्म बतलाया गया है । इस तरह वह सम्यग्दृष्टि मनुष्य अपने जीवन निर्वाहकी आवश्यकताओंको कम करके आत्माकी स्वावलम्बन शक्तिका अधिकाधिक विकास करता हुआ और उसीके अनुसार जीवन निर्वाहकी सामग्रीका त्याग करता हुआ अन्तमें ऐसी अवस्थाको प्राप्त कर लेता है जिस अवस्थामें उसके तृणमात्र भी परिग्रह नहीं रह जाता है तथा बरसात में, शर्दी में और गर्मी में सर्वदा अपनी नम्न दिगम्बर मुहमें ही वह बिना किसी ठौर के सर्वत्र विचरण करता रहता है। सम्यग्दृष्टि मनुष्यका इस स्थिति तक पहुँच जानेका नाम ही अकिञ्चन्य धर्म है ।
सम्यग्दृष्टि मनुष्यको पूर्वोक्त प्रकारसे तप और त्याग धर्मो अंगीकार कर लेने पर जैन संस्कृतिके अनुसार लोग श्रावक, देशविरत या अणुवती कहने लगते हैं और प्रयत्न करते करते अन्तमें उक्त प्रकारका श्राकिञ्चन्य धर्म स्वीकार कर लेने पर उसे साधु, मुनि, ऋषि या महाव्रती कहने लगते हैं।
धन्य धर्मका उड़ाके साथ पालन करने वाला वही सम्यग्दृष्टि मनुष्य विविध प्रकार के घोर तपश्चरणों द्वारा अपनी स्वावलम्बन शक्तिका विकास करते हुए उस स्थिति तक पहुंच जाता है जहाँ उसे न कभी भूख लगती है ? और न प्यास लगने की ही जहाँ पर गुंजाइश है। वह पूर्ण रूपसे आत्म-निर्भर हो जाता है। मनुष्य द्वारा इस प्रकारकी स्थितिको प्राप्त कर लेनेका नाम ही ब्रह्मचयधर्म है। ब्रह्मचर्य शब्दका अर्थ पूर्ण रूपसे आत्म निर्भर हो जाना है और जो मनुष्य पूर्णतः आत्म निर्भर हो जाता है उसे जैन संस्कृति के अनुसार, 'श्रर्हन्त' या 'जिन' कहा जाता है और इसे ही पुरुषोत्तम अर्थात् संपूर्ण मनुष्यों श्रेष्ठ माना गया है कारण कि मनुष्यका सर्वोत्कृष्ट जीवन यही है कि भोजनादि पर वस्तुओं के अवलम्बनके बिना ही वह जिन्दा रहने जग जाय जैन आगम ग्रन्थोंमें यह भी बतलाया गया है कि जो मनुष्य पूर्णरूप से आत्म-निर्भर होकर ग्रर्हन्त और पुरुषोत्तम बन जाता है वह पूर्ण वीतरागी और सर्वज्ञ होता है और यही कारण है कि उसमें विश्व कल्याणमार्ग के सही उपदेश देनेकी सामर्थ्य उदित हो जाती है। इस प्रकार विश्वको कल्याण मार्गका उपदेश
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११५]
देते हुए अन्तमें जब वह अपना शरीर छोड़ता है तो वह पुनः शरीर धारण नहीं करता है, केवल एकाकी आत्मरूप होकर सर्वदाके लिए अजर और अमर हो जाता है ऐसे श्रात्माको ही जैन मान्यता के अनुसार मुक्त, विदया परमब्रह्म कहा जाता है ।
मनुष्यका कर्तव्य
ये दश धर्म किसी सम्प्रदाय विशेषकी बपौती नहीं है। धर्मका रूप ही ऐसा होता है कि वह सम्बद विशेषके दम्धनसे अलिप्त रहता है जीवनको सुखी बनानेकी अभिलाषा रखने वाले तथा ग्रामकल्यायके इच्छुक प्रत्येक मनुष्यका यह अधिकार है कि वह अपनी शक्ति और साधनोंके अनुसार उक्त प्रकारसे धर्म पालनमें अग्रसर हो ।
इस प्रकार मा मा चार्ज और सत्य ये चार धर्म यदि हमारे जीवन में उतर जांय तो हम सभ्य नागरिक रूपमें चमक सकते हैं और इन चारों धर्मोंके साथ साथ शौच एवं संयम धर्मं भी हमारे जीवनमें यदि श्रा जाते हैं। तो हमारा जीवन अनायास ही दीर्घायु, स्वग्य और मुखी बन सकता है। नवीन नवीन और जटिल रोगोंकी वृद्धि जो आजकल देखनेमें आ रही है उसका कारण हमारी अनगंज और हानिकर शाहार-विहार-सम्बन्धी प्रवृत्तियाँ ही तो हैं सब दुष्प्रवृतियोंके शिकार होते हुए भी हम । अपनेको सभ्य नागरिक तथा विवेकी और सम्यग्दष्टि मानते है वह आत्मवंचना नहीं है तो फिर क्या है ?
हमारे शास्त्र हमें बतलाते हैं कि आजकल मनुष्य इतना क्षीण शक्ति हो गया है कि उसका मुक्ति का या पूर्ण आत्मनिर्भर बनने का स्वप्न पूरा नहीं हो सकता है परन्तु आवक और साधु बनने के लिये भी तप, त्याग और आकिञ्चन्य आन्य धर्म सम्बन्धी जो मर्यादायें निश्चित की कई हैं उनके दायरेमें रह कर ही हम आपकों और साधुग्रोंकी श्रेणीमें पहुँच सकते हैं । वस्त्रका त्याग करके नग्न दिगपरदेशका धारक साधु ठंड आदि वचतके लिये यदि पान आदिका उपयोग करता है तो उसमें साधुता कहाँ रह जाती है अतः साधुका वेश हमें तभी स्वीकार करना चाहिये जबकि वस्त्रादिके अभाव में शीतादिकी बाधा सहन करनेकी सामर्थ्य हमारे अन्दर उदित हो जाये इसी तरह श्रावक भी हमें तभी बनना चाहिए जबकि हमारे अन्दर
अनेकान्त
[ फिरण
!
अपने जीवन निर्वाहके साधनोंको कम करनेकी शक्ति प्रगट हो जाये अपनी शक्ति को न तौल कर और अपनी कमजोरियोंको छुपा कर जो भी व्यक्ति आवक या साधु बनने का प्रयत्न करता है वह अपनेको परानके में ही गिराता है। इसलिये श्रावक और साधु बननेका प्रश्न हमारे लिये महत्वका नहीं है हमारे लिए सबसे अधिक महत्वका यदि कोई प्रश्न है तो यह सम्बष्टि (विवेकी) बनने का ही है जिससे कि हम अपनी जीवन यावश्य कताओंको ठीक ठीक तरहसे समझ सकें और उनकी पूर्ति सही तरीकेसे कर सकें। कारण कि हमारे जीवन निर्वाह की जितनी समस्यायें हैं उनको ही यदि हमने अपनी द
से
कर दिया तो फिर हमारा जीवन ही खतरे में पड़ सकता है इसलिये भले ही हम अपनी जीवन निर्वाहकी आवश्यकताओं को कम न कर सकें, तो चिन्ताकी बात नहीं है परन्तु असीमित के वशीभूत होकर हम अनगंज रूपसे अनावश्यक प्रवृत्तियाँ करते रहें, तो यह अवश्य ही चिन्तनीय समस्या मानी जायगी ।
आजकल प्रत्येक मनुष्य जब चारों ओर वैभवके चमत्कारोंको देखता है तो उनकी चकाचौंध में उसका मन डावांडोल हो जाता है और तब वह उनके आकर्षण बच नहीं सकता है और उसकी लालसायें वैभवके उन चमकारोंका उपभोग करने के लिए उमड़ पड़ती है और तब यह सोचता है कि जीवनका सब कुछ अानन्द इन्हींके उपभोगमें समाया हुआ है । आजकल प्रत्येक व्यक्ति चाहता है कि उसके पास ऐसा आलीशान मकान हो जिसमें वैभवकी सभी कक्षायें टिक रही हो, उसका भोजन और उसके वस्त्र अश्रुत पूर्व और अभूतपूर्व, दढ़ियासे बढ़िया मोटरकार हो, रेडियो हो और न मालुम क्या क्या हो, विश्वमें दावी हुई विषमताये मनुष्यकी जालसाओंको उभारने में कितनी अधिक सहायता की है यह बात जान कार लोगोंसे छिपी हुई नहीं है। जिनके पास ये सब साधन मौजूद है वे तो उनके भोग में ही अजमस्त हैं लेकिन जिनके पास इन सब साधनों की कमी है या बिल्कुल नहीं है वे भी केवल ईर्षा और डाहकी हो जिन्दगी व्यतीत कर रहे हैं वे भी नहीं सोच पाते कि भला इन वैभवके चमत्कारोंसे हमारे जीवन निर्वाहका क्या सम्बन्ध है ?
हम मानते हैं कि जिनके पास समयकी कमी है और काम अधिक है उन्हें मोटरकी जरूरत है परन्तु सैर सपाटे
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किरण ३] वंगीय जैन पुरावृत्त
[ ११६ के लिये उस मोटरका क्या उपयोग हो सकता है ? यह तरह लोग रुपया पैसाके दानको तथा आत्माकी स्वावभी हम मानते हैं कि देश और विदेशोंकी परिस्थितियोंकी __ लम्बन शक्तिके विकासको अवहेलना करके अक्रम और जानकारी के लिये रेडियोका उपयोग आवश्यक है परन्तु अव्यवस्थित ढंगसे किये गये भोगादिके त्यागको त्याग अनुपयोगी और अश्लील गानों द्वारा कानोंका तर्पण धर्ममें गर्मित कर लेते हैं। परन्तु वे यह नहीं सोचते कि और मनोरंजनके लिए उसका क्या उपयोग हो सकता रुपया पैसाका दान आदिके चार धोंमें ही यथा योग्य है ? यही बात वैभवकी चकाचौंधसे परिपूर्ण महलों, चम- गर्भित होता है और जिसमें प्रारमशक्तिके विकासको कीले भड़कीले वस्त्रों और दुष्पाच्य गरिष्ठ भोजनोंके बारेमें अवहेलना की गयी है ऐसे अक्रम और अव्यवस्थित टगसे भी समझना चाहिये।
किया गया त्याग तो धर्मकी मर्यादामें ही नहीं पा सकता अन्तिम निवेदन
है अतः प्रत्येक मनुष्य और कमसे कम विचारक विद्वानोंका ऐसे अन्धकारपूर्ण वातावरणमें उक्त दश धर्मोका तो यह कर्तव्य है कि वे दश धर्मों के स्वरूप और उनके अर्थप्रकाश ही मानवको सद्बुद्धि प्रदान कर सकता है परन्त पूर्ण क्रमको समझनेका प्रयत्न करें तथा स्वयं उसी ढंगसे इन धोके स्वरूप और मर्यादाओंके विषयमें भी लोग उनके पालन करनेका प्रयत्न करें और साधारण जनको अनभिज्ञ हो रहे हैं। प्रायः लोगोंका यह खयाल है कि भी समझानका प्रयत्न कर ताकि मनुष्यमात्रम मानवताका वीयकी रक्षा करना ही ब्रह्मचर्य है परन्तु वीर्य रक्षाकी संचार हो और समस्तजन अपने जीवनको सुखी बनानेका मर्यादा संयम और त्याग धम् में ही पूर्ण हो जाती है इसी मार्ग प्राप्त कर सके ।
ता. १७-८-१५
उत्तम क्षमा
(परमानन्द जैन शास्त्री) येन केनापि दुष्टेन पीड़ितेनापि कुत्रचित् । चित्तको अशान्त नहीं होने देता, उन विभाव भावोंको
क्षमा त्याज्यान भव्येन स्वर्गमोक्षाभिलाषिणा॥ अनात्मभाव अथवा आत्मगुणोंका घातक समझकर उन्हें - जिस किसी दुष्ट व्यक्तिके द्वारा पीड़ित होने पर भी पचा देता है-उनके उभरनेकी सामर्थ्यको अक्रोध गुणकी स्वर्ग और मोक्षकी अभिलाषा वाले व्यक्तिको क्षमा नहीं निर्मल अग्निमें जला देता है और अपनेको वह निर्मल छोड़ना चाहिये। क्योंकि क्षमा श्रात्माका धर्म है, स्वभाव गुणोंकी उस विमल सरितामें सराबोर रखता है जहां तथा गुण है, वह आत्मामें ही रहता है। बाह्य विकृतिके असाधुपनकी उस दुर्भावनाका पहुँचना भी संभव नहीं कारण आत्माका वह गुण भले ही तिरोहित या पाच्छा
होता । मोह क्षोभसे होने वाले रागद्वेष रूप विकारात्मक दित हो जाय, अथवा प्रात्मा उस विकारके 'कारण अपने परिणाम जहां ठहर ही नहीं सकते; किन्तु श्रात्माकी स्थिति स्वभावसे च्युत होकर राम-द्वेषादि रूप विभावभावों में शान्त और समता रससे श्रोत-प्रोत रहती है। कंचन, परिणत हो जाय, परन्तु उसके क्षमा गुणरूप निज स्वभावका कांच निन्दा स्तुति-पूजा, अनादर, मणि-बोष्ट सुख दुख, प्रभाव नहीं हो सकता। अन्यथा वह आत्माका स्वभाव जीबन मरण, संपत् विपत् आदि कार्यों में समता बनी नहीं बन सकता। 'क्षमा वीरस्य भूषणम्' वाक्यके अनुसार रहती है, वही व्यक्ति वीर तथा धीर और आत्म समाको वीर व्यक्तिका श्राभूषण माना गया है। वास्तवमें स्वातंत्र्यताका अधिकारी होता है। उसे ही स्वात्मोपलब्धि चमा उस वीर व्यक्तिमें ही होती है जो प्रतिकारकी सामर्थ्य अपना स्वामी बनाती है। रखता हुआ भी किसी असमर्थ व्यक्ति द्वारा होने वाले अप- किन्तु जो व्यक्ति सदृष्टि नहीं, कायर और अज्ञानी है राधको क्षमा कर देता है-उसे दण्ड नहीं देता, और न वस्तुतत्त्वको ठीक रूपसे नहीं समझता, वह जरासे उसके प्रति किसी भी प्रकारका असंतोष अथवा बदला निमित्त मिलने पर क्रोधकी श्रागमें जलने लगता हैं, लेनेकी भावनाको हृदयमें स्थान ही देता है। किन्तु मन प्रतीकारकी सामर्थ्य के प्रभावमें भी आई हुई श्रापदाका स्थितिके विकृत होनेके कारण समुपस्थित होने पर भी प्रतिकार करना चाहता है किन्तु उसका प्रतीकार न
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१२०]
अनेकान्त
[किरण
होनेसे खेद खिन्न रहता है। दूसरोंको बुरा भला वचन बोलना, गाली देना, किसीकी सम्पत्तिका अपहरण कहता है। अपने स्वार्थकी लिप्सामें दूसरेके हित करना, किसीको मानसिक पीड़ा पहुँचाना अथवा ऐसा अहित होनेकी परवाह नहीं करता, और न खुद उपाय करना जिससे दूसरेको नुकसान उठाना पड़े, तथा अपना ही हित साधन कर सकता है, ऐसे व्यक्ति- लोकमें निन्दा वा अपयशका पात्र बनना पड़े, आदि में क्षमा रूप प्रात्मगुणका विकास नहीं हो पाता, और कोई मनुष्य किसी मनुष्यको अपशब्द कहता है गाली न उसकी महत्ताका उसे आभास ही हो पाता है। देता है जिससे दूसरा मनुष्य उत्पीड़ित होता है अपने क्रोधाग्नि जिस व्यक्तिमें उदित होती है वह सबसे पहले अहंकारकी भावना पर आघात हा अनुभव करता है, उस व्यक्तिके धैर्यादि गुणोंका विनाश करती है उन्हें अपने अपमानको महसूस करता हुअा क्रोधाग्निसे उद्दीपित जलाती है-और उसे प्राण रहित निश्चेष्ट बना देती है। हो जाता है. और उससे अपने अपमानका बदला लेनेके क्रोधी व्यक्ति पहले अपना अपकार करता है, बाद में लिये उतारू हो जाता है। उन दोनोंमें परस्पर इतना अधिक दूसरेका अपकार हो या नहीं, यह उसके भवितव्यकी झगड़ा बढ़ जाता है कि दोनोंको एक दूसरेके जीवनप्से बात है। जैसे !कसी व्यक्तिने क्रोध वश अपराधीको भी हाथ धोना पड़ता है, क्रोधसे होने वाली यह सब सजा देनेके लिये भागका अंगारा उठाकर फैंकने की क्रियाएँ कितना अनर्थ करती हैं यह अज्ञानी नहीं समझता कोशिश की । भागका अंगारा उठाते ही उस व्यक्तिका और न कार्य अकार्यका कुछ विचार ही करता है। हाथ पहले स्वयं जल जाता है। बादमें जिस व्यक्तिको
परन्तु ज्ञानी (सहिष्ट) क्रोध और उससे होने वाले अंवअपराधी समझकर उसे जलाने के लिये अग्नि फेंकी गई है श्यम्भावी विनाश परिणामसे परिचित है. वह 'क्रोधो मूलवह उससे जले या न जले यह उसके भवितव्यके श्राधीन मनानां' की उक्तिसे भी अनभिज्ञ नहीं है। वह सोचता है। परन्तु भाग फैंकने वाला व्यक्ति तो पहले स्वयं जल है कि जिस गाली या अपशब्दके उच्चारणसे क्रोधका यह ही जाता है। इसी तरह क्रोधी पहले अपना अपकार
ताण्डव नृत्य हो रहा है या हुआ है, वह सब अज्ञानका करता है, बादमें दूसरेके अपकारमें निमित्त बने अथवा
ही परिणाम है। ज्ञानी विचारता है कि 'गाली' शब्द न बनें इसका कोई नियम नहीं है।
पौदगलिक है,-पुद्गल ( Matter) से निष्पन्न हुआ क्रोध आत्माका स्वाभाविक परिणाम नहीं, वह परके है, वह मेरे श्रात्मगुणोंको हानी नहीं पहुंचा सकता । निमित्तसे होने वाला विभाव है। उसके होने पर विवेक गाली देने वालेने यदि तुझे गाली.दी है-अपशब्द कहा चला जाता है और अविवेक अपना प्रभाव जमाने लगता है, तो तुझे उसका उत्तर गालीमें नहीं देना चाहिये, है। इसीसे उसका विनाश होता है। क्रोध उत्पन्न होते ही किन्तु चुप हो जाना चाहिये। क्योंकिउस व्यक्तिकी शारीरिक प्राकृतिमें विकृति श्रा जाती है, 'गाली आवत एक है जावत होत अनेक । अांखें लाल हो जाती हैं, शरीर कांपने लगता है, मुखकी जो गालीके फेरे नहीं तो रहे एककी एक ॥ प्राकृति विगड़ जाती है, मुंहसे यद्वा तद्वा शब्द
कदाचित् यदि गालीका जबाब गाली में दिया जाता निकलने लगते हैं, जिस कार्यको पहले बुरा समझता
हैं तो झगड़ा और भी बढ़ जाता है-उससे शान्ति नहीं था क्रोध आने पर उसे ही वह अच्छा समझने लगता
मिलती और न ऐसा करना बुद्धिमत्ता ही है। है। उस समय क्रोधी पुरुषकी दशा पिशाचसे अभिभूत व्यक्तिके समान होती है-जिस तरह पिशाच मनुष्यके
किसी कवि ने कहा हैं :शरीरमें प्रवेश करने पर वह व्यक्ति प्रापेसे बाहर होकर
ददतु ददतु गालों गालिमन्तो भवन्तो, अकार्यों को करता है कभी उचित क्रिया भी कर देता है,
वयमाप तदभावात् गालिदानेऽसमर्थाः । पर वह उस अवस्थामें अपना थोड़ा सा भी हित साधन नहीं जगद् विदित मेतद् दीयते विद्यमानं, कर सकता। इसी तरह क्रोधी मनुष्य भी अपना अहित नहि शशक विषाणं कोऽपि कस्मै ददाति ॥ साधन करता हुया लोकमें निन्दाका पात्र होता है। क्रोधो- दूसरे यदि गाली देने वालेके पास अनेक गालियां त्पत्तिके अनेक निमित्त है, झूठ बोलना, चोरी करना, कटुक है, तो वह गालियां देगा ही, क्योंकि यह लोक में विदित
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किरण ३]
उत्तम क्षमा
[१२१
है कि जिसके पास जो चीज होती है वह वही चीज उसे स्वार्थसिद्धि किया करता था, परन्तु विवेकके जागृत होते ही देता है। मेरे पास गालियां नहीं हैं अत. मैं उन्हें नहीं दे वह मेरी मिथ्या दृष्टि विलीन हो गई और मुझे अपनी उस सकता, लोकमें खरगोशके सींग नहीं होते तो उन्हें कोई ग़लतीका भान हो गया है। अब मेरा द निश्चय है कि किसीको देता भी नहीं है।
पर पदार्थ मेरा कुछ भी बिगाड़-सुधार नहीं कर सकता। फिर भी ज्ञानी सोचता है कि गाली देने वालेने जो
बिगाड़-सुधार स्वयं मेरे परणामों पर ही निर्भर है। मेरी गालियां दी हैं उसका कोई न कोई कारण अवश्य होना
अन्तर्बाह्य परिणतिही मेरे कार्यकी साधक-बाधक है । अतः चाहिये। यदि मेरे किसी भी व्यवहारसे उसे कह पहुँचा
मुझे अात्म-शोधन द्वारा अपनी परिणतिको ही सुधारनेका हो अथवा दुख हुआ हो तो उसने उसका बदला गाली
यत्न करना चाहिये। ज्ञानी और अज्ञानीकी विचार-धारामें देकर दिया है, सो ठीक है, मेरा असद् व्यवहार ही
बड़ा भारी भेद है। जहां ज्ञानी वस्तुतत्वका मर्मज्ञ और
विवेकी होता है वहां अज्ञानी अविवेकी और हिताहितके उस गालीका कारण है। फिर विचारता है, कि यदि मैंने इसके साथ कोई जानबूझ कर बुरा व्यवहार नहीं किया,
विचारसे शून्य होता है। उसने गलतीसे ही ऐसा किया हैं। तो उसने असद्
यदि वस्तुतत्त्वका गहरा विचार किया जाय, और उससे
समुत्पन्न विवेक पर दृष्टि दी जाय तो यह स्पष्ट हो जाता व्यवहार करके मेरा उपकार ही किया है, मेरी परीक्षा
है कि क्रोधादिक परिणाम विभाव हैं परनिमित्तसे होने हो गई, मेरा आस्मा विभावरूप नहीं परिणमा, यही मेरे लिये हितकर है। और उस बेचारे व्यक्तिने
वाले औदयिक परिणाम हैं। यही मेरे जीवनके शत्र हैं, तो अपना अपकार ही किया है, वह बेचारा दीन
इनको मुझे अक्रोधभावसे जीतना चाहिये और अहंकार
ममकारके कारण होने वाले अनिष्ट परिणामसे सदा बचने है; मेरे द्वारा क्षमाका पात्र ही है । उसने मुझे गाली
का यत्न करना चाहिये । मनुष्यका पात्मा जितमा निर्बल देकर जो मेरे अशुभ कर्मकी निर्जरा कराई है अतः
होगा, हित अहितके विचारकी शक्ति उतनी ही मन्द होगी वह मेरा बन्धु ही है, शत्रु नहीं । क्यों कि शत्रुताका
और वह क्रोधादि विभावोंके प्रभाव में आकर अपने स्वरूपसे व्यवहार अपकार करने वालेके प्रति होता है, सो वह तो मेरा उपकारी ही है, अत: वह मेरा शत्रु नहीं हो सकता।
च्युत हो जाता है, उसकी बुद्धि अच्छे कार्यों में न जाकर
बुराईकी ओर ही जाती है, वह अात्मनिरीक्षण करने में मेरा शत्रु तो मेरे में उदित होने वाला क्रोधादिरूप विभाव
भी असमर्थ होता है, इसीसे उसे अपनी निर्बलताका परिणाम है जो मेरी श्रात्म निधिके विकासमें बाधक है।
भान नहीं हो पाता, यही उसके पुरुषार्थकी कमी है जिससे अतः मुझे उस क्रोधरूपी वैरीका विनाश करना चाहिये
वह प्रात्महितसे बंचित रहता है। महापुरुषोंने अज्ञानीकी जिससे मेरी श्रात्म-निधिका संरक्षण हो सके।
इस पुरुषार्थ कमीको दूर करनेका उपदेश दिया है जिससे मेरा क्रोध उस अपराधी पर ही है,जो मेरा शन्न है, यदि वह अपनी निर्बलताको दूर करके अपनी शक्तिका यथार्थ ऐसा है तो आत्माका अपराधी तो क्रोध है; क्योंकि वोधने अनुभव कर सके और क्रोधादि शवोंपर विजय प्राप्त ही मेरा अपराध किया है-मेरे प्रात्म-गुणोंको नष्ट करनेका करनेका उपक्रम कर सके, तथा क्षमा नामक गुणकी महत्ताप्रयत्न किया है, इसलिये क्रोधही मेरा शत्र है। अतएव से भी परिचित.हो सके। कायरता और मनोबलकी कममुझे उसी पर क्रोध करना चाहिये। अन्य व्यक्तियों पर जोरी दूर होते ही उसमें सहनशीलता पाने लगती है और क्रोध करनेसे क्या लाभ; दूसरे व्यक्ति तो अपने अपने फिर उसमें वचन सहिष्णुता भी उदित होने लगती है; उपार्जित कर्मों के आधीन हैं। वे मेरा कोई विगाड़-सुधार उसकी वृद्धि होने पर वह वचन सम्बन्धि असहिष्णुताके नहीं कर सकते, किन्तु बिगाड़ सुधार होने पर वे निमित्त परिणामसे बच जाता है। अवश्य बन जाते हैं। अतः मैं अपनेको कर्म बन्धनमें एक साथ कहीं जंगल में से गुजर रहा था, अचानक बालकर दूसरोंके उपकार अपकारमें निमित्त क्यों बनूं। डाकू पा गए उनमें से एक ढाकूने साधूको एक चांटा मारा - मैं मोहवश अज्ञानसे परको कर्ता माने हुए था। इसी और उसका कमंडलु छीन लिया, साधु विवेकी और कारण दूसरेमें शत्रु मित्रकी कल्पना कर अपनी ऐहिक सहिष्णु था, उसने डाकूसे कहा कि आपके इस हाथमें चोट
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जग गई है लाइये मैं इसे दबा दूँ जिससे उसकी पीड़ा कम हो जाय । यह कह कर साधु डाकूके हाथको दवाने खगा। डाकू साधुके शान्त स्वभाव और उसके सहनशील व्यवहारको देखकर उसके चरणों में गिर पड़ा और बोला महाराज ! मैंने आपका बड़ा अपराध किया है, जो मैंने बिना कुछ कहे आपको चांटा मारा और कमंडलु छीना । आप मेरा अपराध क्षमा कीजिये और अपना यह कमंडलु लीजिये इतना कह कर डाकू वहांसे चले गए किन्तु उन पर साधुकी उस सहिष्णुताका अमिट प्रभाव पड़ा ।
अनेकान्त
यदि क्षमाको आत्माका स्वभाव या धर्म न माना जाय तो जो क्रोधी व्यक्ति है उसका क्रोध सदा बना रहना चाहिये। पर ऐसा नहीं होता, क्रोध उदित होता और चला जाता है, इससे यह स्पष्ट समझ में आ जाता है कि क्रोध आत्माका स्वभाव नहीं है पुद्गलकर्मके निमित्त होने वाला श्रदयिक परिणाम है। क्रोधीका संसारमें कोई मित्र नहीं बनता और क्षमाशील व्यक्तिका कोई शत्रु नहीं बनता क्योंकि यह स्वप्न में भी किसीका बुरा चिन्तयन नहीं करता और न किसीका बुरा करनेकी चेष्टा दी करता है। उसका सो संसारके समस्त जीवसे मैत्री भाव रहता है।
माधर्मके दो स्वामी है गृहस्थ और साधु ये दोनों ही प्राणी अपने २ पदानुसार कषायोंके उपशम, क्षय और क्षयोपशमके अनुसार क्षमा गुणके अधिकारी होते हैं
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संवर निर्जरा कारक आत्माकी बीतराग परणतिको धर्म कहते है, जो कि मुक्तिका मार्ग है।
उत्तम क्षमादि दस लक्षण धर्म, रत्नमय धर्म सम्यक दर्शन ज्ञान चारित्र) से भिन्न नहीं है, किन्तु एक है ?
उत्तम क्षमा, मार्दव आर्जव, शौच, सत्य ये पांच लक्ष्य सम्यक् दर्शन ज्ञान स्वरूप है, तथा संयम, तप, त्याग आकिंचन ब्रह्मचर्य ये पाँच लक्षण सम्यक् चारित्र स्वरूप है ।
एक मिथ्यात्व और चार अनन्तानुबन्धी कषाय इनके अनुदय से पूर्वार्ध पाँच लक्षण ( अथवा स० दर्शन ज्ञान) पैदा होते हैं, तथा शेष कषायक अनुदयसे उत्तरार्धक पाँच वचय अथवा सम्यक् चारित्र) पैदा होते है। मिथ्यात्व (= विषयेषु सुख भ्रान्ति और
लक्षण
कषाय
[ किरण ३
गृहस्थ अपनी मर्यादाके अनुसार क्षमाका अपने जीवन में आचरण कर लोकमें सुखी हो सकता है-जो सरष्टी पुरुष, विवेकी और कर्तव्यनिष्ठ है वह संसारके किसी भी प्राणीका बुरा न चाहते हुए अपने दयालु स्वभावसे आत्मरक्षा करता हुआ दूसरेको प्रयत्न पूर्वक कहन पहुँचा कर सांसारिक व्यवहार करते हुए भी समाका पात्र बन सकता है ।
दस लक्षण धर्म - पर्व
( श्री दौलतराम 'मित्र' )
साधु चूँ कि आत्म-साधना में निष्ठ है सांसारिक संघर्ष से दूर रहता है क्योंकि वह संघर्षके कारण परिग्रहका मोह छो चुका है। यहां तक कि वह अपने शररसे भी निस्पृह छोड़ हो चुका | अतएव वह दूसरोंको पीड़ा देने या पहुँचाने की भावनासे कोसों दूर है, अतः उसका किसीसे वैर-विरोध भी नहीं है, वह सदृष्टि और विवेकी तपस्वी है । श्रतएव वह उत्तम क्षमाका धारक है। उसके यदि पूर्व कर्मकृत अशुभका उदय आ जाता है और मनुष्य तिर्यचादिके द्वारा कोई उपसर्ग परीषह भी सहना पड़े तो उन्हें खुशीसे सह लेता है यह कभी दिलगीर नहीं होता और शरीरके विनष्ट हो जानेपर भी विकृतिको कोई स्थान नहीं देता । वह तपस्वी क्षमाका पूर्ण अधिकारी है। क्षमा शीलही श्रहिंसक है, जो क्रोधी है वह हिंसक है। अतः हमें क्रोधरूप विभावभावका परित्याग करने, उसे दबाने या क्षय कर क्षमाशील बननेका प्रयत्न करना चाहिये ।
श्रीहित ( श्राश्रव बन्ध) कारक सराग परयति है । अतएव सदा सावधान रहकर इससे बचते रहना है । स्व० पं० दौलतरामजीने यही बात क्या ही अच्छे शब्दोंमें कही है
"आतम के अहित विषय कषाय । इनमें मेरी परणति न जाय ।। "
परन्तु आश्चर्य है कि आजकल हम लोगोंने विषय कषाय शोषक दस लक्षण धर्म पर्वको अधिकांश में विषय कपाय पोषक त्यौहार सरीखा बना रखा है। इसमें संशो धन होना आवश्यक है, अन्यथा हम मुक्ति मार्ग से हट जायेंगे किसीने सच कहा है
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"पर्व ( पोर) खाने ( भोगनेकी ) वस्तु नहीं, किंतु बोने (त्यागने की ) वस्तु है "
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उत्तम मार्दव
( श्री १०५ पूज्य तुल्लक गणेशप्रसादजी वर्णी )
आज मार्दव धर्म है, क्षमाधर्म विदा हो रहा है, विदा तो होता ही है उसका एक दृष्टांत आापको सुनाता हूँ। मैं नदियामें दुलारकाके पास न्याय पढ़ता था, वे न्याय शास्त्रके बड़े भारी विद्वान थे। उन्होंने अपने जीवन २२ वर्ष न्याय ही न्याय पढ़ा था । वे व्याकरण प्रायः नहीं जानते थे, एक दिन उन्होंने किसी प्रकरण में अपने गुरूजीसे कहा कि जैसा "बाकी" होता है वैसा "व्रीति" क्यों नहीं होता? उनके गुरू उनकी मूर्खता पर बहुत क्रुद्ध हुए और बोले तु बैल है। भाग जा यहाँ से दुलाझाको बहुत बुरा लगा उसका एक साथी था, जो व्याकरण अच्छा जानता था और न्याय पड़ता था । दुलारकाने कहा कि यहाँ क्या पढ़ते ही चली घर पर हम तुम्हें न्याय बढ़िया से बढ़िया पढ़ा देंगे, साथी इनके साथ गाँवको चला गयावहाँ उन्होंने उससे एक सालमें तमाम व्याकरण पढ़ डाला और एक साल बाद अपने गुरूके पास जाकर क्रोध से कहा कि तुम्हारे बापको धूल दी. पूछ ले व्याकरण, कहाँ पूछता है। गुरूने हँसकर कहा आओ बेटा में यही तो चाहता कि तुम इसी तरह निर्भीक बनो । मैं तुम्हारी निर्भी कतासे बहुत सन्तुष्ट हुआ पर मेरी एक बात याद रक्खोअपराधिनि चेत्क्रोधः क्रोधे क्रोधः कथं नहि । धर्मार्थ-काम-मोक्षाणां चतुर्णां परिपन्थिनि ॥ दुलारा अपने गुरुकी माको देखकर नतमस्तक रह गये । क्षमासे क्या नहीं होता । अच्छे अच्छे मनुष्यों का मान नष्ट हो जाता है ।
था
मायका नाम कोमलता है, कोमलतामें अनेक पु वृद्धि पाते हैं। यदि कठोर जमीनमें बीज डाला जाय तो व्यर्थ चला जायेगा । पानीकी बारिशमें जो जमीन कोमल • हो जाती है उसीमें बीज जमता है । बच्चेको प्रारम्भ में पढ़ाया जाता है
"विद्या ददाति विनयं विनयाद्याति पात्रताम् । पास्यादनमाप्नोति धनाद ततः सुखम् ॥" विद्या विनयको देती है, विनयसे पात्रता धाती है। पात्रता धन मिलता है धन धर्म और धर्मसे सुख प्राप्त होता है। जिसने अपने हृदयमें विनय धारण नहीं किया धर्मका अधिकारी कैसे हो सकता है ? विनयी छात्र पर
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गुरुका इतना श्राकर्षण रहता है कि वह उसे एक साथ सब कुछ बतलानेको तैयार रहता है। एक स्थान पर एक पण्डितजी रहते थे पहले गुरुओंके घर पर स्नेह अधिक था। पण्डितानी उनको बार २ कहतीं कि सभी लड़के तो आपकी विजय करते हैं आपको मानते हैं फिर आप इसी एक की क्यों प्रशंसा करते हैं ? पण्डितजीने कहा कि इस जैसा कोई मुझे नहीं चाहता । यदि तुम इसकी परीक्षा ही करनी चाहती हो तो मेरे पास बैठ जाओ आमकां सीज़न था, गुरूने अपने हाथ पर एक पट्टीके भीतर आम बाँध जिया और दुःखी जैसी सूरत बनाकर कराहने लगे। तमाम छात्र गुरूजीके पास दौड़े आये, गुरूने कहा दुर्भा ग्यवश भारी फोड़ा हो गया है । छात्रोंने कहा मैं अभी वैद्य जाता हूँ ठीक हो जायगा गुरूने कहा बेटो ! यह वैद्यसे अच्छा नहीं होता- एक बार पहले भी मुझे हुना था तब मेरे पिताने इसे चूसकर अच्छा किया था यह चूसनेसे ही अच्छा हो सकता है । मवादसे भरा फोड़ा कौन चूसे ? सब ठिठककर रह गये । इतनेमें वह छात्र आ गया जिसकी कि गुरू बहुत प्रशंसा किया करते थे । आकर बोला गुरु क्या कष्ट है ? बेटा फोड़ा है, चूसने से अच्छा होगा । गुरू के कहनेकी देर थी कि उस छात्रने उसे अपने मुँह में ले लिया । फोड़ा तो था ही नहीं आम था पण्डि तानीको अपने पतिके वचनों पर विश्वास हुआ ।
क्या कहें आजकी बात आत तो विनय रह ही नहीं गया। सभी अपने आपको बड़े से बड़ा अनुभव करते हैं। मेरा मन नहीं चला जाय इसकी फिकर में सब पड़े हैं पर इस तरह किसका मान रहा है। आप किसीको हाथ जोड़ कर या सिर झुकाकर उसका उपकार नहीं करते बल्कि अपने हृदयसे मानरूपी शत्रुको हटाकर अपने आपका उपकार करते हैं। किसीने किसीकी बात मानली, उसे हाथ जोड़ लिये सिर झुका दिया, इतनेसे ही वह खुश हो जाता है और कहता है इसने हमारा मान रख लिया मान रख क्या लिया, मान खो दिया अपने हृदय में जो अहं कार था उसने उसे आपके शरीरकी क्रियासे दूर कर दिया। कल आपने सम्यग्दर्शनका प्रकरण सुना था जिस प्रकार अन्य लोगोके यहाँ ईश्वर या खुदाका महात्म्य है वैसा ही
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१२४ ]
जैनधर्म में सम्ग्दर्शनका माहात्म्य है, सम्यग्दर्शनका अर्थआत्म-लब्धि है, आत्माके स्वरूपका ठीक ठीक बोध हो जाना श्रात्मलब्धि कहलाती है । श्रात्मलब्धिके सामने सब सुख धूल हैं । सम्यग्दर्शनसे आत्माका महानगुण जागृत होता है, विवेकशक्ति जागृत होती है श्राज कल लोग हर एक बातमें क्यों ? क्यों ? करने लगते हैं, इसका अभिप्राय यही है कि उनमें श्रद्धा नहीं है । श्रद्धाके न होनेसे हर एक बात में कुतर्क उठा करते हैं ।
अनेकान्त
एक आदमीको क्योंका रोग हो गया, उससे बेचारा बढ़ा परेशान हुआ, पूछने पर सलाह दी कि तू इसे किसीको बेच डाल, भले ही सौ पचास लग जांय । बीमार आदमी इस विचार में पड़ा कि यह रोग किसे बेचा जाय, किसीने सलाह दी स्कूल के लड़के बड़े चालाक होते हैं। ५०) रुपये देकर किसी लड़केको बेच दे, उसने ऐसा ही किया - एक लड़केने ५०) लेकर उसका वह रोग ले लिया सब लड़कोंने मिलकर ५०) की मिठाई खाई, जब लड़का मास्टर के सामने गया और मास्टरने पूछा कि कलका सबक दिखलाओ, लड़का बोला क्यों ? मास्टरने कान पकड़ कर लड़के को बाहर निकाल दिया । लड़का समझा कि क्योंका रोग तो बड़ा खराब है - वह उसको वापिस कर आया । अबकी बार उसने सोचा चलो अस्पतालके किसी मरीजको बेच दिया जाय तो अच्छा है, ये लोग तो पलंग पर पड़े पड़े श्रानन्द करते ही हैं । ऐसा ही किया, एक मरीजको बेच आया दूसरे दिन डाक्टर श्राये पूछा तुम्हारा क्या हाल है ? मरीजने कहा क्यों ? डाक्टर ने उसे अस्प तालसे बाहर कर दिया। उसने भी समझा दरअसल में यह रोग तो बड़ा खराब है, वह भी वापस कर थाया, अबकी बार उसने सोचा अदालती आदमी बड़े टंच होते हैं उन्हींको बेचा जाय, निदान उसने एक आदमी को बेच दिया, वह मजिस्ट्रेट के सामने गया मजिस्ट्रेटने कहा तुम्हारी नालिशका ठीक ठीक मतलब क्या है, श्रादमीनें कहा क्यों ? मजिस्ट्रेटने मुकदमा खारिजकर कहा कि घरकी राह लो, विचारकर देखा जाय तो इन हर एक बातों में कुतर्क से काम नहीं चलता । युक्ति के बलसे सभी बातोंका निर्णय नहीं किया जा सकता। यदि आपको धर्ममें श्रद्धा न होती तो यहाँ हजारोंकी संख्या में क्यों श्राते ? यह कांतिलाल जी जो एक माहका उपवास किये हुये हैं क्यों करते ? श्रापका यहाँ आना और इनका उपवास करना यह सब
[ किरण ४
सम्यग्दर्शनके श्रद्धान गुणका फल है । श्राचार्योंने सबसे पहले यही कहा है -
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"सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः " सम्यग्दर्शन, सम्यज्ञान और सम्यक् चारित्र मोक्षका मार्ग है। श्राचार्यकी करुणा बुद्धिको तो देखो - मोक्ष तब हो जबकि पहले बन्ध हो यहाँ पहले बन्धका मार्ग बतलाना था फिर मोक्षका परन्तु उन्होंने मोक्षमार्गका पहले वर्णन इसलिये किया है कि ये प्राणी अनादिकाल से बन्धजनित दुःखका अनुभव करते करते घबड़ा गये हैं, श्रतः पहले इन्हें मोचका मार्ग बतलाना चाहिए। जैसे कोई कारागार में पड़कर दुखी होता है वह यह नहीं जानना चाहता कि मैं कारागारमें क्यों पड़ा ? वह तो यह जानना चाहता है कि मैं इस कारागार से छूट्टू कैसे यही सोचकर श्राचार्यने पहले मोक्षका मार्ग बतलाया है । सम्यग्दर्शन के रहनेसे विवेक शक्ति सदा जागृत रहती है वह विपत्ति में पड़ने पर भी कभी अन्यायको न्याय नहीं समझता । रामचन्द्रजी सीताको छुड़ाने के लिए लंका गये थे, लंकाके चारों ओर उनका कटक पड़ा था, हनुमान आदिने रामचन्द्रजीको खबर दी कि रावण जिन मंदिरमें बहुरूपिणी विद्या सिद्ध कर रहा है यदि उसे यह विद्या सिद्ध हो गई तो फिर वह अजेय हो जायगा । श्राज्ञा दीजिये जिससे कि हम लोग इसकी विद्यासिद्धमें विघ्न करें, रामचन्द्रजीने कहा कि हम क्षत्रिय हैं कोई धर्म करे और हम उसमें विघ्न डालें यह हमारा कर्तव्य नहीं है । सीता फिर दुर्लभ हो जायगीं हनुमानने कहा | रामचन्द्रजीने जोरदार शब्दों में उत्तर दिया, हो जाय एक सीता नहीं दशों सीताएँ दुर्लभ हो जावें पर मैं अन्याय करने की आज्ञा नहीं दे सकता ।
रामचन्द्रजी में इतना विवेक था उसका कारण क्या था ? कारण था उनका विशुद्ध क्षायक सम्यग्दर्शन । सीताको तीर्थयात्रा के बहाने कृतांतवक्र सेनापति जंगल में छोड़ने गया - उसका हृदय वैसा करना चाहता था क्या ? वह स्वामीकी परतन्त्रतासे गया था । उस वक्त कृतांतवक्रको अपनी पराधीनता काफ़ी खली थी। जब वह निर्दोष सीताको जंगल में छोड़ अपने अपराधकी क्षमा मांगकर वापिस आने लगता है तब सीता उससे कहती हैसेनापति ! मेरा एक संदेश उनसे कह देना, वह यह कि जिस प्रकार लोकापवादके भयसे आपने मुझे त्यागा इस
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किरण ४]
प्रकार लोकापवादके भवसे जिनधर्मको नहीं छोड़ देना । उस निराश्रित अपमानित स्त्रीको इतना विवेक बना रहा । इसका कारण क्या था ? उसका सम्यग्दर्शन । आज कलकी स्त्री होती तो पचास गालियाँ सुनाती और अपने समानताके अधिकार बतलाती। इतना ही नहीं सीता जब नारद जीके श्रायोजन द्वारा लव-कुश के साथ अयोध्या वापिस श्राती आती हैं एक वीरतापूर्ण युद्ध के बाद पिता पुत्रका मिलाप होता है, सीताजी लज्जासे भरी हुई राजदरबार में पहुँचती हैं तू उसे देखकर रामचन्द्र कह उठते हैं-'दुष्टा ! बिना शपथ दिवे-विना परीक्षा दिये यहाँ कहाँ ? तुझे लज्जा नहीं आई।' सीताने विवेक और धैर्यके साथ उत्तर दिया कि मैं समझो भी आपका हृदय कोमल है, पर क्या कहूँ ? आप मेरी जिस प्रकार चाहें शपथ लें। रामचन्द्रजी ने उत्तेजनात्मक शब्दोंमें कह दिया कि श्रग्निमें कूदकर अपनी सच्चाईकी परीक्षा दो बड़े भारी जलते हुए अग्निकुण्ड में सीता कूदनेको तैयार हुई। रामचन्द्रजी लक्ष्मणसे कहते हैं कि सीता जल न जाय । लक्ष्मणने कुछ रोषपूर्ण शब्दों में उत्तर दिया, वह आज्ञा देते समय नहीं सोचा। वह सती है, निर्दोष है, श्राज आप उसके श्रखण्डशीलकी महिमा देखिये उसी समय दो देव केवलीकी वन्दनासे लोट रहे थे, उनका ध्यान सीताके उपसर्ग दूर करने की ओर गया, सीता अग्निकुण्ड में कूद पड़ी और कूदते ही साथ जो अतिशय हुआ सो सब जानते हो । सीताके चित्तमें रामचन्द्रजीके कठोर वचन सुनकर संसारसे वैराग्य हो चुका था। पर "निःशल्यो प्रती" प्रतीको निःशल्य होना चाहिए, यदि बिना परीक्षा दिए मैं मत लेती हूँ तो यह राज्य निरन्तर बनी रहेगी, इसलिये उसने दीक्षा लेनेसे पहिले परीक्षा देना आवश्यक समझा था । परीक्षा में वह पास हो गई, रामचन्द्रजी उससे कहते है देवी ! घर चलो अब तक हमारा स्नेह हृदयमें था पर लोकलाजके कारण श्रांखों में श्रागया है ।' सीताने नीरस स्वरमें कहा"कद्दि सीता सुन रामचन्द्र, संसार महादुःख वृक्ष कंद" तुम जानत पर कछु करत नाहिं
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रामचन्द्रजी ! यह अंसार दुःखरूपी वृक्ष की जड़ है अब मैं इसमें न रहूँगी। सच्चा सुख इसके स्यागमें ही है। रामचन्द्रजीने बहुत कुछ कहा, यदि मैं अपराधी हूँ वो
[ १२५
लक्ष्मणकी ओर देखो, यदि वह भी अपराधी हो तो अपने बच्चों लव-कुशकी ओर देखो और एक बार पुनः घरमें प्रवेश करो, पर सीता अपनी दृढ़तासे च्युत नहीं हुई, उसने उसी वक्त केश उखाड़कर रामचन्द्रजीके सामने फेंक दिये और उसमें जाकर आर्या हो गई। यह सब काम सम्यदर्शका है। यदि उसे अपने कर्म पर भाग्य पर विश्वास न होता तो वह क्या यह सब कार्य कर सकती थी।
उत्तम मार्दव
अब रामचन्द्रजीका विवेक देखिये, जो रामचन्द्र सीताके पीछे पागल हो रहे थे वृद्धोंसे पूछते थे कि क्या तुमने मेरी सीता देखी है ? वही जब तपश्चर्या में लीन थे सीवाके जीव प्रतीन्द्रने कितने उपसर्ग किये पर वह अपने ध्यानसे विचलित नहीं हुए । शुक्लध्यान धारणकर केवलि - अवस्थाको प्राप्त हुए।
सम्यग्दर्शनसे आत्मामें प्रशम संवेग अनुकम्पा और श्रास्तिक्य गुण प्रगट होते हैं जो सम्यग्दर्शन के श्रविनाभावी हैं। यदि आपमें यह गुण प्रकट हुए हैं तो समझ लो कि हम सम्यग्दष्टि है। कोई क्या बतलायेगा कि तुम सम्ब दृष्टि हो या मिध्यादृष्टि अनन्तानुबन्धीकी काय दुः माहसे ज्यादा नहीं चलती, यदि आपकी किसीसे लड़ाई होने पर छः माह तक बदला लेनेकी भावना रहती है तो समझ लो श्रभी हम मिथ्यावादी हैं । कषायके श्रसंख्यात लोकप्रमाण स्थान है उनमें मनका स्वरूप यों ही शिथिल हो जाना प्रशमगुण है मिध्यादृष्टि अवस्थाके समय इस । जीवकी विषय कषायमें जैसी स्वछन्द प्रवृत्ति होती है वैसी सम्यग्दर्शन होने पर नहीं होती है। यह दूसरी बात है कि चारित्रमोहके उदयसे यह उसे छोड़ नहीं सकता हो, पर प्रवृत्ति में शैविश्य अवश्यू आजाता है। शमका एक अर्थ यह भी है जो पूर्वकी अपेक्षा अधिक प्राय हैयः कृतापराधी जीवों पर भी रोष उत्पन्न नहीं होना प्रथम कहलाता है। बहुरूपिणी विद्या सिद्ध करते समय रामचन्द्रजीने रावण पर जो रोष नहीं किया था वह इसका उत्तम उदाहरण है । प्रशमगुण तब तक नहीं हो सकता जब तक अनन्तानुबन्धी सम्बन्धी क्रोध विद्यमान है, उसके छूटते ही प्रशमगुण प्रगट हो जाता है। क्रोध ही क्यों अनन्तानुबन्धी सम्बन्धी मान माया लोभ सभी कषाय प्रशम गुणके घातक हैं ।
( सागर भाद्रपद ६ )
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सत्य धम
गणेशप्रसादजी वर्णी )
वह चौथे प्रकारका असत्य है | जुगलखोरी तथा हास्यसे मिश्रित जो कठोर वचन है वह गर्हित कहलाते हैं। बाजे बाज़े आदमी अपनी पिशुन वृत्तिसे संसार में कलह उत्पन्न करा देते हैं। कहो, मूलमें बात कुछ भी न हो परन्तु चुगलखोर इधर उधरकी लगाकर बातको इतना बढ़ा देते हैं कि कुछ कहा नहीं जा सकता। पं० बजदेवदासज एक बड़ी अच्छी बात थी । वह आप सबको भी मान्य होगी। उनके समय कोई जाकर यदि कहता कि अमुक श्रादमी आपकी इस तरह निन्दा करता था. वे फौरन टोक देते थे भाई वह बुराई करता हो इसका तो विश्वास नहीं, पर आप हमारे ही मुँह पर बुराई कर रहे होंगालियाँ दे रहे हों। मुझे सुननेके लिये अवकाश नहीं मैं तो तब मानूंगा जब वह स्वयं आकर हमारे सामने ऐसी बात करेगा और तभी देखा सुना जायेगा। यदि ऐसा अभिप्राय सब बोग करखें तो तमाम दुनियाके टटे टूट जाय। ये चुगल जिस प्रकार आपकी बुराई सुनाने आते हैं वैसी आपकी प्रशंसा नहीं सुनाते ।
दूसरे के मर्मको छेदने वाले हो जाते है अरे, ऐसी हंसी । क्या कामकी जिसमें तुम्हारा को विनोद हो और दूसरा मातक पीड़ा पावे । कोई कोई लोग इतने कठोर वचन बोलते हैं—इतना रूखापन दिखलाते हैं जिससे कि समभावीका धैर्य भो टूटने लग जाता है कितने ही असम्बद्ध श्रौर अनावश्यक बोलते हैं। उनका यह चतुर्थ प्रकारका असत्य है | ये चारों ही असत्य प्राणीमात्रके दुःखके कारण हैं । यदि सत्य बोला जाय तो उससे अपनी हानि ही कौनसी होती है सो समझमें नहीं श्राता । त्य वचनसे दूसरोंके प्राणोंकी रक्षा होती हैं, अपने आपको सुखका अनुभव होता है। हमारे गाँवकी बात है। मंडावरे में मैं रहता था मेरा एक मित्र था हरिसिह । हम दोनों साथपड़ते थे बड़ी मित्रता थी। इसके पिताका नाम मौजीखाल था और काकाका माम कुंजीलाल दोनोंमें न्वारपन हुआ तो कुंजीलालको कुछ कम हिस्सा मिला जिससे यह निरन्तर लड़ता रहता था। एक दिन भौजी लाजने मौजीलालने कुंजीलालको खूब मारा और अन्त में अपना अंगूठा अपने ही दाँतों से काट कर पुलिस में रिपोर्ट कर दी, उल्टा कुजीबाल पर मुकदमा चछा दिय हमारा मित्र हरिसिंह हमसे बोला कि तुम अदालत में कह देना कि मैं लुहर्रा गाँव में अपने चाचाके यहाँ जा रहा था बीचमे मैंने देखा कि कुंजवाल और मौजीलाल में खूब बगड़ा हो रहा था तथा कुंजीखाल मोजोलालका अंगूठा दाँतोंसे दबाए हुए था । मैंने बहुत मना किया पर वह न माना । मित्रका आग्रह देखकर मुझे अदालत में जाना पड़ा, जब मेरा नम्बर श्राया और अदालत ने मुझसे पूछा कि क्या जानते हो मैंने कह दिया कि मैं अपने चाचाके यहाँ लुहर्रा जा रहा था रास्तेमें इनका घर पड़ता था मैंने देखा कि कुंजीलाल और मौजीलालमें खूब लड़ाई हो रही थी और कुजीलाल मौजीलालका अंगूठा दाँतोंसे दबाये हुए था। अदालत ने पूछा और क्या जानते हो ? मैने कहा और यह जानता हूँ कि हरिसिंहने कहा था कि ऐसा कह देना । अदालतको बात जम गई कि यह मौजीलाल ने झूठा मामला खड़ा किया है इसलिये उसी वक्त खारिज कर कितने ही आदमी हँसी में ऐसे शब्द कद देते हैं जो दिया और मौजीजाजको जो दिना उसने ज्यादा रख
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(श्री १०१ पूज्य पृष्ठ
आज सत्यधर्म है सत्यसे आत्माका कल्याण होता है। इसका स्वरूप अमृतचन्द्राचार्यने इस प्रकार कहा है कियदि प्रमादयोगासमधानं विधीयते किमपि । तदेनृतमपि विज्ञेयं तद्-भेदाः सन्ति चत्वारः ॥
११ प्रमादके वश जो कुछ श्रन्यथा कहा जाता है उसे असत्य जानना चाहिये । उसके चार भेद हैं यहाँ श्राचार्यने प्रमादयोग विशेषण दिया है, प्रसादका अर्थ होता है कषायका तीव्र उदय, कषायसे जो झूठ बोला जाता है वह अत्यन्त बुरा है । असत्यका पहला भेद 'सदपलाप' है जो वस्तु अपने द्रव्यसे, क्षेत्रसे, कालसे और भाव से विद्यमान है उसे कह देना कि नहीं है, जैसे श्रात्मा है पर कोई कद दे कि आत्मा नहीं है वह 'सदपलाप' कहलाता है। दूसरा भेद 'असदुद्भावन' है जिसका अर्थ होता है असद्-अविद्यमान पदार्थका सद्भाव बतलाना । जैसे घट न होने पर भी कह देना कि यहाँ घट है। तीसरा भेद वह है जहाँ वस्तुको दूसरे रूप कह दिया जाता है जैसे गायको घोड़ा कह देना । गहित पापसंयुक्त और अप्रय जो वचन
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किरण ४ ]
सत्य धर्म
[ १२७
लिया था वह भी देना पड़ा । यदि मैं वहाँ सत्य न बोलता एक गाँव में एक सेठ सेठानी रहते थे उनके पास एक तो व्यर्थ ही निरपराधी कुंजीलालको कष्ट होता । अब आदमी कामकी तलाशमें पहुँचा सेठने पूछा, क्या क्या एक असत्य बोलनेका उदाररण सुनो-मैं तो अपनो बीती कर सकते हों। उसने कहा जो भी आप बतलायो सब बात ही अधिकतर सुनाता हूँ
कर सकता हूँ। वेतन क्या लोगे । कुछ नहीं सिर्फ सालमें मैं मथुरामें पढ़ता था, मेरा मन कुछ उचाट हुआ सो एक बार आपसे और एक बार सेठानीसे झूठ बोलूगा। सोचा कि बाईजीके पास हो पाऊँ । विद्यालयके मन्त्री सेठने सोचा ऐसा बेवकूफ कब फंसेगा, मुफ्तका नौकर पं. गोपालदासजी बरैया थे। मैंने एक झूठा कार्ड लिखा मिलता है लगा लेना अच्छा है, यह सोच कर उन्होंने उसे कि भैया ! मेरी तबीयत खराब है तुम १५ दिनकी छुट्टी रख लिया। साल भर काम कर चुकनेके बाद जब वह लेकर चले पायो । नीचे दस्तखत बना दिये बाईजीके जाने लगा तब बोला सेठजी अब मैं जाऊँगा कल झूठ और मथुराक ही लेटर बक्समें छोड़ दिया। जब वह बोल्गा , सेठने कुछ ध्यान नहीं दिया। शामके वक्त हमारे पास आया तब मैंने करोड़ीलाल मुनीमको छुट्टीकी नाकर सेठजी से बोला कि मुझे आपका घर अच्छा लगा अर्जी लिखी और साथमें वह कार्ड भी नत्थी कर दिया। पर क्या बताऊँ आपकी सेठानी यदि बदचलन न होती मुनीमने वह दोनों पं० गोपालदासजीके पास आगरा भेजे तो दुनिया में आपका घर एक ही होता। आज वह अपने दिवे । पं० जीने लिख दिया कि छुट्टी दे दो और उससे जारके कहनेसे रातको आपका काम तमाल करेगी इसलिए कह दो जब वापिस श्रावें तब हमसे मिलता जाय । मैं आप सतर्क रहें। मौकरने यह बात इस ढंगसे कही कि बाई जीके पास गया और १५ दिन बाद लौट कर पाया
सेठको बिलकुल सच जम गई। अब वह सेठानीके पास तो पण्डितजीके लिखे अनुसार उनसे मिलनेके लिये गया। पहुँचा और बोला कि तुम्हारीसी देवी तो दुनियामें नहीं उन्होंने पूछा कि कहो बाईजीकी तबीयत ठीक हो है यदि सेठजी वैश्याओंके यहाँ न जाते तो तुम्हारे क्या गई ? मैंन कहा 'हाँ', उन्होंने भोजन कराया जब मथुराको सन्तान न होती । सेठानीको बात जम गई, उसने उपाय जाने लगा तब बोले यह श्लोक याद कर लो
पूछा तब कहने लगा आज रातको जब सेठजी सो जाय उपाध्याये नटे धूर्ते कुट्टिन्यां च तथैव च।
तब उस्तरासे उनके एक तरफकी दाढ़ी मूक बना डालना माया तत्र न कर्तव्या माया तैरेव निर्मिता। जिससे उनकी सरत शकल खराब दिखने लगेगी और
श्लोक तो बिल्कुल सीधा साधा था याद हो गया। तब वेश्यायें उन्हें अपने पास नहीं आने देंगी। सेठानीने मेरा विचार हुआ कि मैंने जो पत्र बाईजीके नामसे लिखा ऐसा ही किया। मेठजी आज नौ बजेसे ही कृत्रिम खुराटे था-वह मथुरा में ही तो छोड़ा था उस पर मुंहर मथुरा लेने लगे. सेठानीने देखा कि सेठजी गादी निद्रामें मस्त की ही थी टीकमगढ़ की नहीं थी, संभव है पण्डितजीको हैं. अब इनकी दाढ़ी मूछ बनाना ठीक होगा। उस्तरा यही हमारी गलत चालाकी पकड़में आगई है। मैंने साफ निकाला उसे सिल्ली पर घिस कर खूब पैना किया. बालों कह दिया पण्डितजी ! मैं बहुत असत्य बोला बाईजीकी पर पानी लगाया और बनानेको तैयार हुई कि सेठजी तबीयत खराब नहीं थी मैंने वैसे ही झू मूठ चिट्टी उठ खड़े हुए और बोले दुष्टे ! यदि आज वह नौकर मुझे लिख दी थी। उन्होंने कहा बस हो गया, कुछ बात नहीं सचेत न कर देता तो तू जान ही ले लेती। वह भी बोली और मुनीमको चिट्ठी लिख दी कि यह कुछ कमजोर है बिलकुल ठीक है तुम आज तक वेश्याओंके यहाँ जा जा अतः इसे ३) तीन रुपया माह दूधके लिये दे दिया करो। कर हमको दुःखी करते रहे उसने ठीक कहा था मुझसे । मुझे अपनी प्रसत्यता पर बहुत शर्मिन्दा होना पड़ा। दोनोंमें खूब झड़ी, इतने में नौकर पाया और बोला सेठजी पर यह भी लगा कि मैंने अन्तमें उनसे सच सच बात मान करो अब मैं जाता हूँ, जो मैंने कहा था कि एक एक कह दी इसीलिये ही वे प्रसन्न हुए हैं।
बार मैं झूठ बोलूगा सो बोल लिया । खासी दिल्लगी जीवन भर सत्य बोलो और एक बार असत्य तो रही। अरे! जरा सोचो तो एक बारकी मूठने कितना तमाम जीवन की प्रतिष्ठा पर पानी फिर जाता है। उपद्रव मचा दिया पर जो जिंदगी भर झूठ बोलते हैं एक बारका.मूठ भी लोगोंको बड़े संकट में डाल देता है। उनका ठिकाना ही क्या । यह पांचवाँ सत्यधर्म है।
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१२८]
अनेकान्त
[किरण ४
___ यदि इसकी रक्षा चाहते हो तो क्रोध, लोभ, भय पण्डितजी धर्मके प्रभावका अनुभव करते हुए चले और और हास्यको छोड़ो। यही झूठ बोलनेके कारण हैं। इन उन चोरोंने इनके उन साथियोंको जो आगे चले गये थे पर विजय प्राप्त करो और साथमें इस बातका भी खयाल बुरी तरह पीटा तथा सब सामान छुड़ा लिया । समता रखो कि कभी मेरे मुंहसे उत्सूत्र-भागमके विरुद्ध वचन न परिणाम कभी व्यर्थ नहीं जाते । तत्वार्थ जप, तप और निकलें। अपने वचनोंकी कीमत अपने आप बनाई जा उसके फलमें विश्वास होना प्रास्तिक्य कहलाता है यदि सकती है।
इन कार्यों में विश्वास न हो तो फोकटमें कष्ट सहन कौन अब यह 'पंचाध्यायी' है इसमें सम्यगर्शनका प्रकरण करें? दान करनेसे पुण्य होता है। आगामी पर्यायमें उसका चल रहा है । वास्तवमें पूछो तो सम्यग्दर्शन ही संसारकी अच्छा फल मिलता है। इसी विश्वास पर ही दान करते जड़ काटनेवाला है, जिसने सम्यग्दर्शन प्राप्त कर लिया हों नहीं तो ५) दान कर देने पर १००) के १५) तो अभी उसका संसार नष्ट हुअा ही समझो आज सम्यग्दर्मनके ही रह जाते हैं। दान आदिसे ही प्रभावना होती है। अनुकम्पा और आस्तिक्य गुणका वर्णन है । पर दुःख अभृतचन्द्र स्वामीने लिखा है किप्रहाणेच्छाको (दूसरोंके दुःख नाश करनेकी अभिलाषाको)
आत्मा प्रभावनीयो रत्नत्रयतेजसा सततमेव। अनुकम्पा कहते हैं। सम्यग्दृष्टि अपने सामने किसीको
- दानतपाजनपूजाविद्यातिशयैश्च जिनधर्मः॥ .. दुःखी नहीं देख सकता। उसके हृदयमें सच्ची समता आ
इन दिनोंमें सम्यग्दर्शनादि अापके हृदयमें उत्पन्न हुए जाती है, कंचन और काँचमें उनकी समता हो जाती है, समताका अर्थ यह नहीं कि उसे इन दोनोंका ज्ञान नहीं
ही होंगे, तप कर हो रहे हों, पूजा खूब करते हों, यदि कुछ
दान करने लगी तो उससे जैनधर्मकी क्या प्रभावना नहीं रहता यदि ज्ञान न रहे तो हम लोगोंसे भी अधिक अज्ञानी
होगी। आप चतुर्दशीके दिन उपवास करोगे यदि उस हो जाय, पर ज्ञान रहते हुए भी वह हर्ष-विषादका कारण
दिनका बचा हुआ अन्न गरीबोंको खिला दोगे तो तुम्हारी नहीं होता । सच्ची समता जिसे प्राप्त हो गई उसे कोई
क्या हानि हो जायेगी। सब तुम्हारा यश गायेंगे और कष्ट नहीं दे सकता। प० देवीदासजीके जीवनकी एक
कहेंगे कि जैनियोंके व्रत लगे हुए हैं इनमें यह गरीबोंका घटना है। उनके सामायिकका नियम था ये रास्ता चल
भी ध्यान रखते हैं। आप लोग चुप रह गये इससे मालूम रहे हों जंगल हो चाहे पहाड़, यदि सामायिकका समय हो
होता है कि पापको हमारी बात इष्ट है। जाय तो वे वहीं बैठ जाते थे। एक बार वे कुछ साथियोंके साथ घोड़ापर सामान लादे हुए जा रहे थे भयंकर जंगल
एक बार एक राजाने अपनी सभाके लोगोंसे कहा था, शामका समय हो गया, वे वहीं ठहर गये सब गठरी कि दो शब्दों में मोक्षका मार्ग. बतलायो, नहीं तो कठोर उतारकर रख दी और घोड़ेको पास ही छोड़ दिया। दण्ड पावोगे । सब चुप रह गये किसीके मुखसे एक भी
नाका बारेमा चल. शब्द नहीं निकल सका । एक वृद्ध बोला, महाराज आपके कर रुकेंगे पर यह नहीं माने । इन्होंने साफ कह दिया चोर । प्रश्नका उत्तर हो चुका । राजाने कहा कोई बोला है ही सब कुछ ले जायें. पर सामायिकका वख्त नहीं टाल नहीं उत्तर कैसे हो गया ? बुढने कहा श्राप प्रश्न करना सकते । ये सामायिक निश्चल होगये, चोर आये और जानते हैं पर उत्तर समझना नहीं जानते । देखो. सब इनकी गठरियाँ ले गये। वे अपनी सामायिक में ही मस्त शान्त हैं और शान्ति ही मोक्षका मार्ग है। यह सब लोग रहें । कुछ दूर जाने पर चोरोंके मनमें पाया कि हमने अपनी चेष्टासे बता रहे हैं। उसकी चोरी व्यर्थ की, वह बड़ा शांत अादमी हैं उसने इसी प्रकार आप लोग भी चुप बैठे हैं मालूम होता एक शब्द भी नहीं कहा। सब लौटे और उनकी गठरियाँ है श्राप अवश्य इस बात का खयाल रक्खेंगे । यहाँ पाँच वापिस दे गये, अब तक इनका सामायिक पूरा हो चुका सौ सात सौ घर जैनियों के हैं यदि प्रतिदिन प्राधा श्राधा था. चोरोंने कहा कि आपकी शांतवृत्ति देखकर हम लोग की सेर अन्न हर एकके घरसे निकले तो एक हजार प्रादमियोंहिम्मत आपकी गठरियाँ ले जानेकी नहीं हुई । श्राप का पालन अनायास होजाय । पर उस ओर ध्यान नाय खुशीसे जाबो कहकर उन्होंने उनका घोड़ा लाद. दिया। तब न । एक-एक औरत अपने पास पचासों कपड़े अना
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किरण ४ ]
वश्यक रोके हुए हैं यदि ये अपनी आवश्यकताके कपड़े बचाकर दूसरोंको दे दें तो वस्त्रका अकाल श्राज ही दूर हो जाय । श्ररे तुम दो सौ की साड़ी पहनकर निकलो और दूसरे के पास साधारणसा वस्त्र भी न हो तब देखकर उन्हें डाह न हो तो क्या हो ?
शौच-धर्म
शौचका सामान्य और सीधा अर्थ पवित्रता है । यह पवित्रता आत्मामें लोभ- कषायके अभाव में प्रकट होती है । यों तो आत्माकी पवित्रताके रोधक सभी कषाय और कम हैं, किन्तु लोभ- कषाय आत्मा की उस पवित्रताको रोकती है जो आत्माको मुक्तितक पहुँचाती है और मुक्ति में अनन्त काल तक विद्यमान रहती है । यही कारण है कि यथाख्यातचारित्र भी, जो प्रायः उक्त पवित्रतारूप ही है, लोभके अभाव में ही आत्रिभूत है । इस पवित्रताविशेषको शौचधर्म कहना उचित ही है । बात यह है कि लोभ आत्माके अन्य तमाम गुणों पर अपना दुष्प्रभाव डाल कर उन्हें मलिन बना देता है । सब पापों और दुर्गुणों का भी वह जनक है । लोभसे मन, वाणी तथा काय तीनों दूषित हो जाते हैं और उन तीनों का सम्बन्ध आत्माके साथ होने से आत्मा भी दूषित बन जाता है । अतः मन वाणी और कायको दूषित न होने देने के लिये यह आवश्यक है कि लोभ कषायसे बचा जाय । अर्थात् शौच-धर्म का पालन किया जाय । शौच धर्म एक स्वाभाविक गुण है जो प्रकट होते ही आत्मा के अन्य गुणों पर भी अपना चमत्कारपूर्ण असर डालता है । मन, वाणी और शरीर तीनों उसके सद्भाव में शुद्ध हो जाते हैं। कितना ही ज्ञान और कितना ही चारित्र क्यों न हो, इस गुणके अभाव मैं वे मलिन बने रहते हैं ।
शौच-धर्म
(ले० पं० दरबारीलाल कोठिया, न्यायाचार्य )
पाठकोंको उस ब्राह्मण विद्वानकी कहानी ज्ञात होगी, जिसने लोभमें आकर अपना पतन किया था । उसने अपने जाति-कुलका ख्याल रखा था और न
[ १२६
लोग कहते हैं जियो और जीने दो, पर जैनधर्म कहता है कि न जियो और न जीने दो । संसारमें न स्वयं जन्म धारण करो और न दूसरेको करने दो । दोनों को मोक्ष हो जाय ऐसी इच्छा करो ।
( सागर चातुर्मास में दिये हुए प्रवचन से )
अपने विशाल पाण्डित्यका भी विचार किया था। वेश्याके लोभ में फँसकर अपना सर्वनाश किया था। एक पात् साधु साधु होकर भी लोभ-पिशाचके वशीभूत होकर जीवनकी तपोमय साधनाको भी खो बैठा था । अतः आत्माको शौच धर्मके पालन द्वारा ही ऊँचे उठाया जा सकता है 1
आज संसारके व्यक्तियों में सन्तोष आ जाय, लोभकी मात्रा कम हो जाय, न्यूनाधिकरूपमें यह शौच - गुण समा जाय तो संसार तृष्णाकी भट्टीमें जलनेसे बच सकता है और सुख शांतिको प्राप्त कर सकता है ।
हैं परन्तु लोगों की इच्छाएँ असीमित हैं। यदि पदार्थोंविचारने की बात है कि लोकमें पदार्थ तो सीमित का बटवारा किया जाय तो सबको उनकी इच्छानुसार मिलना सम्भव नहीं है। इसलिये सन्तोष अथवा शौच
ही एक ऐस वस्तु है जो आत्माको सुख व शांति प्रदान कर सकती है। इसी आशयसे एक विद्वानने कहा है
आशागर्त्तः प्रतिप्राणि यस्मिन् विश्वमणूपमम् । कस्य किं कियदायाति वृथैव वो विषयैषिता ॥ अर्थात् प्रत्येक प्राणी की इच्छाओं का गड्डा इतना है कि उसमें समग्र विश्व परमाणुके बराबर है। ऐसी स्थिति में किसको क्या और कितना मिल सकता है ? अतः विषयोंकी इच्छा करना व्यर्थ है ।
जीवनको स्थिर और स्वस्थ रखने के लिये जितनी मावश्यकता हो उतनी वस्तुओं को रखो । शेषको दूसरों
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१३०]
अनेकान्त.
[किरण ४ के उपभोगके लिये छोड़ दो। इस मनोवृत्तिसे न जन सन्तोष बनाम शौच गुणको अपना लें तो भ्रष्टाकेवल मनुष्य सुखी ही होगा, अपितु यशस्वी भी बनेगा चार, असन्तोष, वस्तुओंकी दुलभता आदि दोष, जो शौचगुणके अभिव्यक्त करने में भी वह अग्रसर होगा। आज देखने में आ रहे हैं, देशमें नहीं रहेंगे और धीरे-धीरे ऐसी स्थिति भी प्राप्त हो सकती है, जब जनता मुसीबतों, कष्टों, परेशानियों और दुःखोंमें अन्तर और बाह्य दोनों प्रकार के परिप्रहको छोड़नेमें नहीं फंसेगी। समर्थ हो सकता है और 'परमेको मुनिः सुखी' इस निर्लोभवृत्तिसे जो अच्छे आचार तथा विचारोंका अवस्थाको प्राप्तकर सकता है। अआएव इस शौच धर्म- अंकुर उगेगा वह समयपर इतने प्रचर फलों एवं का पालन गृहस्थ और मुनि दोनों ही अपने २परिणामों विपल छाखासे सम्पन्न वृक्ष होगा, जिसके नीचे बैठ एवं परिस्थितियों के अनुसार कर सकते हैं।
कर प्रत्येक मानव-जन आनन्द और परम शास्तिका जनधर्ममें शौचधर्मको बहुत ऊँचा स्थान दिया अनुभव कर सकता है। गया है। गंगा यमुना आदि नदियों या समुद्रादिम स्नान करनेसे यह धर्म प्राप्त नहीं होता। यह तो
श्री समन्तभद्रविद्यालय, देहली निर्लोभ वृत्तिसे प्राप्त होता है। यदि हमारे भारतीय
२६ अगस्त, १६५३
प्रार्जव
[अजितकुमार जैन] हृदयके विचारों के अनुसार वाणी और शारीरिक कोकिलकण्ठी वाणीस अन्य व्यक्तिको अपने पंजे में व्यापारको यदि एक शब्द-द्वारा कहना हो तो वह शब्द फंसाकर वह नर-भेड़िया अपने उस हृदयमें भरे विष"आर्जव" है. ऋजुता या सरलता भी उसी के अपर- की बौछार करके उस व्यक्तिका अचेत-क्रियाशून्य कर नाम हैं।
देता है। अपने स्वार्थ-साधनके लिये वह अन्य व्यक्तिका " चरित्रबलसे हीन व्यक्ति जिस तरह अपनी निब- सर्वनाश करते भी नहीं चूकता।
प्रावरण डालने के लिये हिंसा, असत्य-भाषण, अपने कपटाचारसे वह अपने आपको मुलम्मेसे व्यभिचार आदि पापाचरण को अपनाता है उसी तरह भी अधिक चमकीला बनाता है, जिससे जनसाधारण वह आत्म-निबलताके कारण ही छल, फरेब, धोखा. उसे खरा सोना समझकर सोनेका मूल्य उसे दे डालता धडीको काममें लेता है । कपटाचार मनुष्य को बना. है, किन्तु उसको उस मूल्यकी हार्दिक वस्तु उस कपटीवटी रूपमें बदल देता है। वह जनताके लिये भयानक से नहीं मिल पाती, इस तरह वह जनताको बहुत क्षति वन्य पशुसे भी अधिक भयानक बन जाता है। पहुँचाता है। उस कपटीकी आदत यहाँ तक बिगड़ भेड़िया यदि बाहर से भेड़िया है तो अन्तरगसे भी जाती है कि साँप यदि बाहर टेढ़ा चलता है तो कम भेडिया ही है। उसको देखकर प्रत्येक अन्तु उसके से कम अपने बिल में घुसते समय तो सीधा ही चलता भयानक आक्रमणसे सुरक्षित रहनेका यत्न कर सकता है। अपने परिवारके व्यक्तियोंको भी धोखा देते हुए है, परन्तु कपटी मनुष्य ऐसा भयानक भेड़िया है कि वह नहीं चकता। उसके आक्रमणसे कोई भी जन्तु अपने आपको नहीं किन्तु मुलम्मा अपनी चमक आखिर कब तक बचा सकता।
स्थिर रख सकता है, साधारणसा वातावरण हा वह दोखने में बहुत साधु नजर आता है, वाणी उसकी चमकको काला कर दता है, उस दशामें समस्त उसकी मिश्रोसे भी अधिक मीठी होतो हे परन्तु हृदय जगत उसका जघन्य मूल्य तुरन्त आंक लेता है और भयानक विषसे भरा हश्रा घड़ा होता है। अपनी फिर उसकी ओर आँख उठाकर भी नहीं देखता।
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किरण ४ उत्तम तप
। १३१ ठक ऐसा ही हाल कपटी मनुष्यका होता है, कपटी मदसे उन्हें घृणा होती है, वे किसीको प्रसन्न करनेके मनुष्यका कृत्रिम मायाजाल जब छिन्न भिन्न हो जाता लिये कुछ कार्य नहीं करते बल्कि आत्म-संतोषके लिए है तब उसका भयानक नंगा रूप जनताके सामने आते ही सब कुछ करते हैं। . हुए देर नहीं लगती। उस समय जनताकी दृष्टिसे भय तो उनके हृदयमें कभी उत्पन्न ही नहीं वह एक दम गिर जाता है और उसकी प्रतिष्ठा तथा होता । उन्हें अपने बचन पर पूर्ण विश्वास और अचल विश्वास सदाके लिये समाप्त हो जाते हैं । घरमें तो दृढ़ता रहती है, संसार उसके वचनको प्रामाणिक उस पर किसीका विश्वास रहता ही नहीं । समझता है । धार्मिक आचरणसे उनका सौन्दर्य नहीं
जिस मनुष्यका विश्वास संसारसे उठ गया, एक बढ़ता बल्कि उनके कारण उस धमोचरणका स्वच्छतरहसे वह मनुष्य ही संसारसे उठ गया । क्योंकि
रूप हो जाता है। जनतामें उसका सम्मान स्वयं बढ़ता विश्वासपात्रता ही जीवनका प्रधान चिन्ह है।
चला जाता है। ___ कपटीका हृदय तो निर्भीक हो ही नहीं सकता, निश्छल व्यक्ति संसारको निर्भयता और मूलभूत क्योंकि सदा उसको अपनी बनावट-कलई खुल जानेका भय बना रहता है।
" धार्मिकताका पाठ पढ़ाता है । उसका प्रत्येक शब्द उसका धर्माचरण भी निःसार, निस्तेज एवं उप- उसके हृदयसे निकलता है अतः दूसरे व्यक्तिके हृदयहासजनक होता है जनता उसके धार्मिक आचरण- को तुरन्त प्रभावित करता है, इसी कारण उसका को 'बगलाभक्ति' का रूप देकर अन्य धार्मिक व्यक्तियों वचन तेजस्वी, प्रभावशाली होता है । उसकी करनी के लिये भी अपनी वैसी ही धारणा बना लेती है। अन्य सज्जन व्यक्तियों के लये अनुकरणीय बन इस प्रकार छली-कपटी मनुष्य धार्मिक जगतमें महान जाती है। तभी तो कहा गया हैपापाचारी माना गया है।
मनस्यन्यद् वचस्यन्यत कर्मण्यन्यद्धि पापिनाम । जो मनुष्य कपटाचार से दूर रहते हैं अपने मनो- मनस्येकं वचस्येकं कर्मण्येकं महात्मनाम् ॥ विचारोंके अनुसार ही बोलते हैं तथा करते हैं, वे अर्थात्-कपटी मनुष्य पापी होते हैं और सरलव्यक्ति सदा बनावटसे दूर रहते हैं, चापलूसी, खुशा- चित्त व्यक्ति महात्मा हाते हैं।
उत्तम तप
(पी० एन० शात्री) इच्छाओंका रोकना तप है | तप जीवन-शुद्धिके यह मानव अनादि कालसे मोही होनेके कारण अमित लिये अत्यन्त आवश्यक है। बिना किसी तपश्चरणके इच्छाओंका केन्द्र बन रहा है। एक अभिलाषा अथवा प्रात्म-शुद्धिका होना नितान्त कठिन ही नहीं किन्तु अस- इच्छा पूरी नहीं हो पाती, तब तक दूसरी पा धमकती है। म्भव है। जिस तरह खानसे निकलने वाले सुवर्ण पाषाण- इस तरह जीवनके साथ इनका प्रतिसमय तांता लगा से प्राप्त सोनेको शुद्ध बनानेके लिये अग्निसंतापनादि रहता है। एक समयको भी इनसे छुट्टी नहीं हो पाती। प्रयोगों द्वारा सुवर्णकार उसे शुद्ध बनाता है। उक्त प्रक्रियाके इच्छाएँ अनन्त हैं और मानव जीवन सीमित अवस्थाको विना सोनेका वह शुद्ध रूप प्राप्त नहीं हो सकता, जिसे लिये हुए है अतः उन अनन्त इच्छाओंकी पूर्ति कैसे हो 'कंचन' या सौटंचका सोना कहा जाता है। ठीक उसी सकती है? यदि कदाचित् किसी अभिलषित इच्छाकी प्रकार अनादि कालसे मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद, कषाय पूर्ति भी हो जाय तो तत्काल अन्य अनेक इच्छाएँ उत्पन्न और योग रूप परिणतिसे होनेवाले कर्मबन्धनसे प्रात्मा हो जाती हैं, ऐसी स्थितिमें इच्छाओंकी अपूर्ति सदा बनी मलिन हो रहा है-उसकी अशुद्धताको दूर करनेके लिए ही रहती है, इच्छाका नाम ही दुःख है। जिसकी जितनी तपश्चरण करना अत्यन्त जरूरी है। बिना उस प्रयत्नके इच्छाएं पूरी हो जाती हैं वह उतना ही अधिक लोकमें भारम-शुद्धि करना सम्भव नहीं जंचता
सुखी माना जाता है। पर वास्तवमें इच्छा पूर्तिसे सुख 'इच्छांनिरोधस्तपः'-तत्त्वार्थसूत्रे गृपिच्छाचार्यः। नहीं मिलता, वह कोरा सुखाभास है-झूठा सुख है;
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१३२ ]
क्योंकि इच्छा ही दुःख है, इच्छा ही परिग्रह है, मोह और श्रज्ञानका परिणाम है। जिसके जितनी अधिक इच्छाएँ हैं वह उतना ही अधिक परिग्रही अथवा मोही है, और अनन्त दुखोंका पात्र है । यह श्रज्ञ प्राणी बाह्य इच्छापूर्ति मात्रको सुख समझता है इसीसे रातदिन उन्हीं की पूर्ति में लगा रहता है, और उसके लिए अनेक प्रयत्न करता है । चोरी, दगाबाजी, विश्वासघात, और छल-कपट आदि अनेक दूषित वृत्तियोंके द्वारा इच्छाकी पूर्ति के लिये दौड़ धूप करता रहता है । उसीके लिये समुद्रों और पर्वत तथा कन्दराओं की सैर करता है, अनेक कष्ट भोगता है और कार्य सिद्धिके अभाव में विकल हुआ मानसिक सन्तापसे उत्पीड़ित रहता है हजारपति से लेकर लखपति या करोड़ पति अथवा अरबपति बन जाने पर भी सुखी नहीं देखा जाता वह दुःखी ही पाया जाता है। आचार्य गुणभद्रने कहा है कि—
आशागर्तः प्रतित्राणि यस्मिन्विश्वमणूक्ष्मम् । किं कदा कियदायाति वृथा या विषयैषिता । 'इस जीवका श्राशारूपी खाड़ा इतना गहरा है कि उसमें विश्वकी समस्त सम्पदा श्रणुके समान है। तत्र किसके हिस्से में कितनी श्रावेगी ? श्रतः इस विषयेषणाको धिक्कार है ।"
जिस तरह सहस्त्रों नदियोंके जलसे समुद्रकी तृप्ति नहीं होती उसी तरह पंचेन्द्रियोंके विषयोंका अनादिकाल से सेवन करते भी जीवकी तृप्ति नहीं होती । भोग उपहुए भोगकी आकांक्षाएँ संसारवृद्धिकी कारण हैं उनसे तापकी शान्ति नहीं हो सकती। उनसे उल्टी तृष्णाकी अभिवृद्धि ही होती है । श्रतएव हमें चाहिये कि कर्मोदय से प्राप्त भोग उपभोगकी सामग्री में सन्तोष रखते हुए अपनी इच्छाओं की प्रवृत्तिको सीमित बनानेका यत्न करें । यम और नियमका सावधानी से पालन करें, क्योंकि ये दोनों ही गुण इच्छा निरोधमें कारण हैं। जीवन में यम और नियम रूप प्रवृत्तिसे संयमका वह छिपा हुआ रूप सामने ता है, और फिर लोकमें अशान्तिकी वह भीषण बाधा भी दूर होने लगती है ।
ऊपर बतलाया गया है कि इच्छाओंका निरोध तपसे होता है । वह तप दो प्रकारका है । बाह्य और अन्तरंग | दोनों ही तप अपने छह छह भेदोंको लिये हुए हैं - इस तरह तपके कुल बारह भेद हैं, अनशन, ऊनोदर, वृत्तिपरिसंख्यान, रसपरित्याग, विविक्त शय्यासन और काय
अनेकान्त
[ किरण ४
क्लेश, प्रायश्चित, विनय, वैयावृत्य, स्वाध्याय, व्युत्सगं और ध्यान । इनमेंसे आदिके छह तप बाह्य हैं, इनका आवरण बाह्य जीवनमें दिखता है इसीसे इन्हें बाह्य कोटि में रखा गया है। इनका साधन श्रन्तस्तपकी वृद्धि के लिये किया जाता है । परन्तु अन्तस्तप श्रात्मासाधना में विशेष उपयोगी हैं। उन्हींसे कर्मशृंखलाका जाल कटता है । इन अन्तरंग तपोंमें स्वाध्याय और ध्यान ये दोनों ही तप मुमुक्षु योगी के लिये विशेष महत्वके हैं। योगीको ध्यान एवं स्वाध्याय से उस आत्मबलकी प्राप्ति होती है जो कर्मकी क्षपणा अथवा क्षय करनेकी सामर्थ्य को लिये हुए है । यही कारण है कि जब योगी श्रात्म-समाधिमें स्थित हो जाता है तब उसके बाह्म और श्राभ्यन्तर इच्छाओंका पूर्णतया निरोध हो जाता है । इच्छाओं के निरोध होनेसे तज्जन्य संकल्प - विकल्पोंका भी अभाव हो जाता है । और आत्मा अपने सम्यग्दर्शनज्ञानचरित्रादि गुणोंमें एकनिष्ठ होते ही मोहकर्मकी उस सुदृढ़ सांकलको खंडित कर देता है जिसके टूटते ही कर्मोंके सभी बन्धन शक्त बन जाते हैं - फलदान की सामर्थ्य से रिक्त हो जाते हैं । और श्रात्मा क्षणमात्रमें उनके भारसे मुक्त होकर अपनी अक्षय सम्पदा का स्वामी बन जाता है । तपकी 'अपूर्व सामर्थ्य है जो जीवको दुःखपरम्परासे छुड़ाकर त्रैलोक्य के जीवोंके द्वारा अभिवंद्य एवं उपास्य बना देती है ।
" श्रतः हम सबका कर्त्तव्य है कि हम भी अपने जीवनको संयत बनाने का यत्न करें। अपनी इच्छाओं को सीमित कर स्वस्थ, सुखी बनें और आत्मबलको उन्नत करें, तथा दुःखांसे छूटनेका प्रयत्न करें। श्राज हम लोग असीमित इक्छाओंके कारण अर्थसंचय और विविध भोगोंके उपभोगकी लालसा में लगे हुए हैं। अपनी स्वार्थपरता से एक दूसरेका बुरा सोचते हैं, दूसरोंकी सम्पत्ति और उनके भोगोंको प्रवृत्तिले असन्तोष एवं डाह करते हैं। स्वयं परिग्रहका संचय करते हैं, श्रसत्य बोलते हैं, दूसरेकी चुगली करते हैं, और अपने असहिष्णु व्यवहार से अपनी श्रात्मवंचना करते हुए जगतको ठगने अथवा धोखा देनेका यत्न करते हैं, यह कितनी अज्ञानता है। अतः हमें चाहिए कि हम भी अपनी इच्छाओं पर नियन्त्रण कर तपकी महत्ताका मूल्यांकन करते हुए सन्तोषी, सुखी बनें, तथा एक देश तपस्वी बन कर अपना हित साधन करें ।
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संग्रहकी वृत्ति और त्याग धर्म
(ले० श्री पं० चैनसुखदासजी, न्यायतीर्थ ) धर्म प्रात्माकी उस वृत्ति अथवा प्रवृत्तिका नाम है लिये वह उचित अनुचित सब प्रकारके प्रयत्न करता है। जो मनुष्यके प्राध्यात्मिक एवं वौयक्तिक अभ्युदयका कारण न्याय और अन्यायका भेद वह उस समय भूल जाता है हो । धर्मका यह लक्षण मनुष्य-परक है । सारे संसारके जब धन संग्रहका अवसर होता है । त्यागके प्रकरणमें प्राणियों में मनुष्यों की संख्या बहुत कम है। पशु-पक्षी और संग्रहका अर्थ यद्यपि केवल धनसंग्रह ही नहीं है, किन्तु - देव-नारकोंमें भी धर्मवृत्ति जागृत होती है और वे भी संसारके सारे संग्रह धनसे खरीदे जा सकते हैं इसलिये अपने आध्यास्मिक उत्थानकी ओर प्रवृत्त हो सकते हैं- संग्रह शब्दसे मुख्यतः धनसंग्रह ही लिया जाता है। इसलिए धर्मका लक्षण ऐसा भी है जो मनुष्यातिरिक्त- दुनियांके प्रतिशत निन्यानवें पापोंका कारण संग्रह ही है। प्राणियों में भी मिल सके। जो आमाको दुःखोंसे उन्मुक्त जब से मनुष्यमें संग्रहकी भावना उत्पन्न हुई है तभीसे करे वही धर्म है, और बह धर्म सच्ची श्रद्धा, सच्चा ज्ञान मानव समाजमें दुःखों और पापोंकी सृष्टि भी देखी जाती
और सच्चे चरित्रके रूपमें प्रस्फुटित होता है। इसके है। संग्रह पाप और दुःख इन सबकी एक परम्परा है। विपरीत जो कुछ है वह अधर्म है। यह धर्मका सामान्य संग्रहसे पाप पैदा होते हैं और वे ही दुका कारण हैं। लक्षण है।
जैनशास्त्रोंकी भोगभूमिमें कोई मनुष्य दुःखी नहीं था,
इसका कारण केवल यही था कि उस समय के मनुष्यमें चरित्रके रूप में जो धर्म प्रस्फुटित होता है उसकी नाना
संग्रहकी प्रवृत्ति नहीं थी। तब मनुष्यकी इच्छाएँ भी कम 'शाखाएँ हैं । त्याग भी उसका एक रूप है। त्याग धर्म भी
थीं । आज तो मनुष्यकी अपरिमित इच्छाएँ हैं और इनका मनुष्य-परक है, क्योंकि मनुष्यके अतिरिक्त दूसरे प्राणियों में संग्रहकी प्रवृत्ति नहीं देखी जाती । मनुष्य-संसारका
सारा उत्तरदायित्व संग्रह पर है। कविने ठीक ही कहा है
कि-'मनुष्यकी तृष्णाका गड़ा इतना गहरा हो गया है सर्वश्रेष्ठ प्राणी है, इसलिए कोई भी विवेचन उसीकी
कि उसे भरनेके लिए यह समूचा विश्व भी एक अणुके मुख्यतासे किया जाता है । संग्रह और त्याग, पात्र और
समान है।' तब एक एक मनुष्यके इतने गहरे गड्ढेको कैसे अपात्र, संसार और मुक्ति, पुण्य और पापके सारे विवेचन
भरा जाय ! यह एक भयंकर समस्या है, और यह समस्या मनुष्यको लक्ष्य करके किये गये हैं। सम्भव है किसी किसी
केवल वैयक्तिक नहीं अपितु राष्ट्रोंमें भी यह रोग पशु अथवा.पक्षी में भी संग्रहकी भावमा हो, पर ऐसे अप
फैल गया है। सारे छोटे और बड़े युद्ध, आक्रमण, वाद नगण्य समझे जाते हैं मनुष्य में तो संग्रहकी प्रवृत्ति
अत्याचार और आततायिपन इसी समस्याके भयंकर जन्मजात है। बच्चा भी और नहीं तो अपने खेलोंका संग्रह तो करने ही लगता है । ज्यों-ज्यों मनुष्य बड़ा होता
परिणाम हैं।
इस संग्रहतृष्णाकी समस्याका एक मात्र हल त्याग जाता है उसके संग्रहकी भावनामें वृद्धि होती जाती है।
धर्म ही है । जबसे दुनियामें संग्रहका पाप आया तभीसे वह जीवनके अन्त तक भी इस संग्रहके अभ्याससे विरक्त
त्याग धर्मकी भी उत्पत्ति हुई । अन्धकार और प्रकाश, होना नहीं चाहता । दुख की बात तो यह है कि इस संग्रह
बन्धन और मुक्ति, ज्ञान और अज्ञानकी तरह धर्म और की प्रवृत्तिमें जो जितना अधिक सफल होता है इस संसार में वह उतना ही आदरणीय सत्कृत और पुरस्कृत माना
पाप साथ साथ जन्मते हैं । संग्रहके पापके साथ अगर
त्यागधर्म न पाता तो दुनियाकी जो अवस्था होती जाता है। राजाओं, सम्राटों और धनिकोंके सारे यशोगानका
उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती । त्यागधर्म कारण उनका अपार संग्रह ही है।
संग्रहके पापको धो डालता है। फिर भी हमें यह समजब मनुष्य देखता है कि संग्रहशील अर्थात् धनसंच. मना है कि प्रत्येक त्याग धर्म नहीं होता। स्यागको यकारियोंका हर जगह सम्मान होता है तो वह भी उनका धर्म बनानेके लिए हमें विवेककी जरूरत होती है। अनुकरण करता है और अपने इस मनोरथमें सफल होनेके निस त्यागमें अहंकार हो, लोकषणकी भावना हो या
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१३४ ]
अन्य कोई व्यक्तिगत स्वार्थ हो, देश-कालका विचार न हो वह त्याग धर्मकी कोटिमें नहीं श्राता । हमारा प्रत्येक त्याग धर्म की कोटिमें समाविष्ट हो इसके लिए हमें अपने पूरे विवेक का उपयोग करना चाहिए।
त्यानधर्म जैनाचार अथवा सदाचारकी एक बड़ी शाखा है । व्याग का अर्थ छोड़ना है । छोड़नेके भी दो रूप हैं । कोई चीज किसी को देकर भी छोड़ी जा सकती है और बिना दिये भी, किसीको कोई चीज देनेके लिए जब हम छोड़ते हैं तो वह त्याग दान कहलाता है जैसे आहारदान, औषधदान आदि। किन्तु दान शब्दका प्रयोग ज्ञान और जीवनके साथ भी होता है ज्ञानदान जीवनदान । कोई किसीको ज्ञान देता है तो इसका यह अर्थ नहीं है कि वह ज्ञान को इस तरह छोड़ देता है जैसे आहारदानके समय आहारको छोड़ दिया जाता है। ज्ञानको तो किसी भी तरह छोड़ना सम्भव नहीं है। जैसे एक दीपकसे दूसरा दीपक जला दिया जाता है इसी तरह एक आत्माके ज्ञानसे दूसरे आत्मामें ज्ञान उत्पन्न किया जाता है। अभय दानमें तो अपने पाससे सचमुच कुछ भी नहीं दिया जाता। उसमें तो केवल प्राथिरताका प्रयत्न ही किया जाता है उस प्रयत्नकी सफलता ही अभयदान है ।
.
।
जो चीज किसीको किसी रूपमें बिना दिये दी जाती है वह भी त्यागका एक रूप है । जब मनुष्य कषाय अथवा बासनाओंका परित्याग करता है तो वह उत्कृष्ट कोटिका त्यागी कहलाता है। इस त्यागका दानके प्रकरण से कोई सम्बन्ध नहीं है। सम्पूर्ण बाह्य परिग्रहको छोड़कर जब कोई संसार- विरक्त होता है तब उसका वह बाह्य परिग्रह-स्याग किसीको देने के लिए नहीं होता, वह तो उसे हेय समझकर छोड़ता है। इस सारे विवेचनका यह अर्थ है कि व्याग शब्दका प्रयोग दानार्थमें भी होता है और इससे भिन्न अर्थमें भी ।
अनेकान्त
[ किरण ४
के रूप में परिवर्तित करनेके लिए दान-संस्थाका जन्म हुआ है और यह सन्न है कि इस संस्थाने दानार्थी और दानी सबका समान रूपसे उपकार किया है। अब तक दान धनिक समाजके लिए वरदान स्वरूप सिद्ध हुआ है। दानार्थियों में तब तक उत्पातकी भावना पैदा नहीं होती जब तक धनियोंके द्वारा दिये गये दानसे किसी न किसी रूपमें उनकी श्रावश्यकताएँ पूरी होती जाती हैं । दानी को अपने मनमें कभी यह अहंकार लाने की जरूरत नहीं है कि मैं दान देकर दुखी, दरिद्र और गरीबोंका भला करता हूँ बल्कि उसको यह सोचना चाहिए कि इनको दान देना ही मेरी रक्षाका कवच है ।
संग्रह से दोष पैदा होते हैं इसलिए सबसे अच्छी बात यह हैं कि संग्रह न किया जाय; पर मनुष्यकी यह प्रवृत्ति यों ही छूटनेवाली नहीं है इसलिए विवेक पूर्वक संग्रहके वितरकी व्यवस्था करना मनुष्यका अनिवार्य कर्तब्य है इस कंर्त्तव्यका जो पालन नहीं करता वह मानव-समाजमें अशान्ति उत्पन्न करनेके दोपका हिस्सेदार है। अतिसंग्रह से जो विषमता आती है उस विषमताको आंशिक समता
विश्व प्रकृति स्वयं संग्रह अथवा अतिसंग्रहके विरुद्ध
समुद्र, मेष, वृक्ष और स्वयं पृथ्वी संग्रहके विरुद्ध क्रान्ति पैदा कर देते हैं और दानकी महत्ता को प्रकट कर ते हैं । दानके विषय में एक कविने कितना अच्छा कहा है
है
।
ऋतु वयन्त जाचक भयो एप दिये तुम पात
2
तामें नव पल्लव भये, दियो दूर नहीं बात ||
वसन्त ऋतु आई, उसने आकर वृक्षों से कहा- मैं तुम्हारी याचक हूँ. मुझे दान दो, वृक्ष यह सुनकर बड़े खुश हुए और अपने सारे पत्ते ऋतुको दान स्वरूप दे दिये । वृक्षोंका यह दान निष्फल नहीं गया; क्योंकि तत्काल ही उन पत्तांके स्थान में नये पत्ते श्रा गए । यह सच है कि दिया हुआ कभी व्यर्थ नहीं होता ।
किन्तु यह बात भी भूलने की नहीं है कि कोई भी मनुष्य कुछ न कुछ तो दान देने को क्षमता रखता ही है। एक करोड़ रुपयेका दान और एक पैसेका दान दोनों ही दानकी कोटि में आते हैं और क्षमताकी दृष्टिसे दोनों का बराबर मय है। यदि भावोंमें विषमता न हो तो दोनों का समानफल भी हो सकता है। जब यह बात है तब स्पष्ट है कि दानी केवल धनी ही नहीं बन सकता निर्धन भी बन सकता है। इसलिए पनियोंकी तरह निर्धन भी अपनी शक्तिका विना छिपाये और शक्तिका अतिक्रमण किये बिना स्याग धर्मकी और अच्छी तरह प्रवृत हो सकते हैं। जब मनुष्य के मन में ठीक अर्थसहानुभूतिके भाव उत्पन्न होते हैं तब उसमें दयाकी वृत्ति जागृत होती है और तभी वह देने को प्ररेणा भी पाता है। महान् विचारक श्री विनोबा भावे के शब्दोंमें देनेकी प्ररेणाको ही दया
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किरण
तत्वाचे सूत्रका महत्व
और करनेकी प्रेरणाको ही करुणा कहते हैं। अगर हृदयमें त्याग धर्म हमारे प्रास्माको पवित्र बनाता है। वह हमारी 'देने और करनेकी वास्तविक प्ररणा न हो तब तो दया जीवन शुद्धिका कारण है । जो जितना त्यागी है वह उतना अथवा करुणाका पाखण्ड ही समझिये ।
ही महान और वन्दनीय है। महासंग्रहशील चक्रवर्ती __त्याग धर्म अथवा कोई भी धर्म केवल व्याख्याकी सम्राट महात्यागी तीर्थकरकी घरणरजको पाकर अपने वस्तु नहीं है। हमें स्वतः सिद्ध तत्त्वको उतना समझाने की प्रापको धन्य समझता है। सचमुच जीवनकी सफलता जरूरत नहीं है जितनी जीवन में उतारनकी है। सचमच त्यागसे ही है।
तत्वार्थ-सूत्रका महत्व
(पं० वंशीधरजी व्याकरणाचार्य ) महत्व और उसका कारण
सही उत्तर यही है कि इस सूत्र ग्रन्थके अन्दर समूची इसमें संदेह नहीं, कि तत्वार्थसूत्रके महत्त्वको श्वेताम्वर
जैनसंस्कृतिका अत्यन्त कुशलताके साथ समावेश कर और दिगम्बर दोनों सम्प्रदायोंने समानरूपसे स्वीकार
दिया गया है। किया है, यही सबब है कि दोनों सम्प्रदायोंके विद्वान प्राचार्योंने इस पर टीकायें लिखकर अपनेको सौभाग्यशाली
संस्कृति निर्माणका उद्देश्य लोक-जीवनको सुखी माना है । सर्वसाधारणके मन पर भो तत्वार्थसूत्रके
बनाना तो सभी संस्कृति निर्माताओंमे माना है। कारण कि महत्वकी अमिट छाप जमी हुई है।
उद्देश्यके विना किसी भी संस्कृतिके निर्माणका कुछ भी दशा-याये परिच्छिन्ने तत्व र्थे पठिते सति ।
महत्व नहीं रह जाता है परन्तु बहुत सी संस्कृतियाँ इससे , फलं स्यादुपचासस्य भाषितं मुनि
भी आये अपना कुछ उद्देश्य रखती हैं और उनका वह इस पद्यने सर्वसाधारणकी हमें इसका महत्व बढ़ाने- उद्देश्य प्रात्मकल्याणका लाभ माना गया है। जैसंस्कृति में मदद दी है। यही कारण है कि कमसे कम दिगम्बर ऐसी संस्कृतियामें से एक है । तात्पर्य यह है कि जैन समाजकी अपड़ महिलायें भी दूसरोके द्वारा सूत्र पाठ सुन संस्कृतिका निर्माण लोकजीवनको सुखी बनामेके साथ-साथ कर अपनेको धन्य समझने लगती हैं। दिगम्बर समाजमें प्रात्मकल्याणकी प्राप्ति (मुक्ति) को ध्यानमें रखकरके ही यह प्रथा प्रचलित है कि पपूषणपर्वके दिनोंमें तत्वार्थ- किया जाता है। सूत्रको खासतौरसे सामूहिक पूजा की जाती है और स्त्री एवं पुरुष दोनों वर्ग बड़ी भक्तिपूर्वक इसका पाठ किया या सुना करते हैं। नित्यपूजामें भी तत्वार्थसूत्रके नामसे पूजा करने वाले लोग प्रति दिन अर्घ चढ़ाया करते हैं और विश्वकी सभी संस्कृतियोंको आध्यात्मिक संस्कृतियाँ वर्तमान में जबसे दिगम्बर समाजमें विद्वान दृष्टिगोचर होने मानने में किसीको भी विवाद नहीं होना चाहिए, क्योंकि बगे, तबसे पपूषणपर्व में इसके अर्थका प्रवचन भी होने आखिर प्रत्येक संस्कृतिका उद्देश्य लोकजीवनमें सुखव्यलगा है । अर्थप्रवचनके लिए तो विविध स्थानोंकी दि. जैन वस्थापन तो है ही, भले ही कोई संस्कृति प्रात्मतत्वको जनता पाषण पर्वमें बाहरसे भी विद्वानोंको बुलानेका स्वीकार करती हो या नहीं करती हो । जैसे चार्वाककी प्रबन्ध किया करती है। तत्वार्थसूत्रकी महत्ताके कारण ही संस्कृति में आत्मतत्वको नहीं स्वीकार किया गया है फिर श्वेताम्बर और दिगम्बर दोनों सम्प्रदायोंके बीच कर्ता-विष- भी लोकजीवनको सुखी बनानेके लिए "महाजनो येन गतः यकं मतभेद पैदा हुआ जान पड़ता है।
स पन्था" इस वाक्यके द्वारा उसने लोकके लिये सुखकी ' यहाँ पर प्रश्न यह पैदा होता है कि तत्वार्थसूत्रका साधनाभूत एक जीवन व्यवस्थाका निर्देश तो किया ही इतना महत्व क्यों है? मेरे विचारसे इसका सीधा एवं है। सुखका व्यवस्थापन और दुःखका विमोचन ही
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१३६ ]
संस्कृतिको श्राध्यात्मिक माननेके लिये श्राधार है । यहाँ तक कि जितना भी भौतिक विकास है उसके अन्दर भी विकासकर्ताका उद्देश्य लोकजीवनको लाभ पहुँचाना ही रहता है अथवा रहना चाहिये अतः समस्त भौतिक विकास भी आध्यात्मिकता के दायरेसे पृथक नहीं है लेकिन ऐसी स्थिति में श्राप्यात्मिकता और भौतिकताके भेदको समकनेका एक ही आधार हो सकता है कि जिस कार्यके अन्दर आत्माके लोकके लाभकी दृष्टि अपनायी जाती है वह कार्य आध्यात्मिक और जिस कार्य में इस तरहके लाभकी दृष्टि नहीं अपनायी जाती है, या जो कार्य निरुद्दिष्ट किया जाता है वह भौतिक माना जायगा ।
अनेकान्त
[ किरण. ४
है जिसमें आत्मा या लोकके लाभालाभका कुछ भी ध्यान नहीं रखकर केवल वस्तुस्थिति पर ही ध्यान रखा। जाता है। इस विकल्पमें जहाँ तक वस्तुस्थितिका तालुक है उसमें विज्ञानका सहारा तो अपेक्षणीय है ही. परन्तु विज्ञान केवल वस्तुस्थिति पर तो प्रकाश डालता है उसका श्रात्मा या लोकके लाभालाभसे कोई सम्बन्ध नहीं रहता है तात्पर्य यह है कि विज्ञान केवल वस्तुके स्वरूप और विकाश पर ही नजर रखता है, भले ही उससे आत्माको
यद्यपि यह संभव है कि आत्मा या लोकके लाभकी दृष्टि रहते हुए भी कर्ता ज्ञानकी कमी के कारण उसके द्वारा किया गया कार्य उन्हें अलाभकर भी हो सकता है परन्तु इस तरहसे उसकी लाभ सम्बन्धी दृष्टिमें कोई अंतर नहीं होनेके कारण उसके उस कार्यकी प्राध्यात्मिकता
तुरण बनी रहती है अतः आत्मतत्वको नहीं स्वीकार करने वाली चार्वाक जैसी संस्कृतियोंको श्राध्यात्मिक संस्कृतियाँ मानना श्रयुक्त नहीं है ।
यह कथन तो मैंने एक दृष्टिसे किया है, इस विषय दूसरी दृष्टि यह है कि कुछ लोग आध्यात्मिकता और भौतिकता इन दोनोंके अन्तरका इस तरह प्रतिपादन करते है कि जो संस्कृति आत्मतत्वको स्वीकार करके उसके कल्याणका मार्ग बतलाती है वह आध्यात्मिक संस्कृति है और जिस संस्कृति में आत्मतत्वको ही नहीं स्वीकार किया गया है वह भौतिक संस्कृति है; इस तरह श्रात्मतत्वको मानकर उसके कल्याण का मार्ग बतलाने वाली जितनी संस्कृतियां है वे सब आध्यात्मिक और आत्मवस्यको नहीं मानने वाली जितनी संस्कृतियाँ हैं वे सब भौतिक सं कृ तियाँ ठहरती है। इस विचारधाराले भी मेरा कोई मतभेद नहीं है, कारण कि यह कथन केवल दृष्टिभेदका ही सूचक है आध्यात्मिकता और भौतिकता के मूल आधारमें इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता है ।
श्रध्यात्मिकता और भौतिकता के अन्तरको बतलाने वाला एक तीसरा विकल्प इस प्रकार है-एक ही संस्कृति - के आध्यात्मिक और भौतिक दोनों पहलु हो सकते हैं संस्कृतिका आध्यात्मिक पहलू वह है जो श्रात्मा या लोकके लाभालाभसे सम्बन्ध रखता है और भौतिक पहलू वह
+
या लोकको लाभ पहुँचे या हानि पहुँचे । लेकिन आरम कल्याण या लोककल्याणकी दृष्टिसे किया गया प्रतिपादन या कार्य वास्तविक ही होगा, यह नियम नहीं है वह कदाचित् श्रवास्तविक भी हो सकता है, कारण कि श्रवास्तविक प्रतिपादन भी कदाचित किसी किसीके लिये लाभकर भी हो सकता है। जैसे सिनेमा के चित्रण, उपन्यास या गल्प वगैरह अवास्तविक होते हुए भी लोगोंकी चित्तवृत्ति पर असर तो डालते ही हैं। तात्पर्य यह है कि चित्रण आदि वास्तविक न होते हुए यदि उनसे अच्छा शिक्षण प्राप्त किया जा सकता है तो फिर उनकी अवास्तविकता का कोई महत्व नहीं रह जाता है। जैन संस्कृतिके स्तुतिग्रन्थोंमें जो कहीं कहीं ईश्वरकर्तृस्वकी झलक दिखाई देती है। वह इसी दृष्टिका परिणाम है जबकि विज्ञानकी कसोटी पर खरा न उतर सकने के कारण ईश्वरकतृ विवादका जैम दार्शनिक ग्रन्थोंमें जोरदार खण्डन मिलता है और इसी दृष्टिसे ही जैन संस्कृति में अज्ञानी और अल्पज्ञानी रहते हुए भी सम्यग्fष्टको ज्ञानी माना गया है; जबकि वास्त विकताके नाते जीव बारहवें गुणस्थान तक अज्ञानी या अल्पज्ञानी बना रहता है ।
इस विकल्प के आधार पर जैन संस्कृतिको दो भागोंमें विभक्त किया जा सकता है। एक आध्यात्मिक और दूसरा भौतिक । ।
जैन संस्कृतिके उक्त प्रकारसे आाध्य त्मिक और भौतिक ये दो भाग तो है ही परन्तु सभी संस्कृतियोंके समान इसका एक तीसरा भाग आाचार या कर्त्तव्य सम्बन्धी भी हैं इस तरह समूची जैन संस्कृतिको यदि विभक्त करना चाहें तो वह उक्त तीन भागों में विभक्त की जा सकती है । इनमें से आध्यात्मिक विषयका प्रतिपादक करणानुयोग. भौतिक विषयका प्रतिपादक द्रव्यानुयोग और आचार या कर्त्तव्य विषयका प्रतिपादक चरणानुयोग इस तरह तीनों
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किरण ३]
तत्वाथसूम्रका महत्व
[१३७
भागोंका अलग अलग प्रतिपादन करनेवाले तीन अनुयोगा- और काल इन छः द्रव्यों के रूप में हमारी जानकारीमें में जैन आगमको भी विभक्त कर दिया गया है।
श्रायगा और जब हम आध्यात्मिक दृष्टिसे अर्थात् प्रारमतत्त्वार्थसत्र मख्यतः आध्यात्मिक विषयका प्रतिपादन कल्याणकी भावनासे वस्ततत्वकी जानकारी प्राप्त करना करने वाला ग्रन्थ है, कारण कि इसमें जो कुछ लिखा गया चाहेंगे तो उस समय वस्तु तत्व जीव, अजीव, श्राश्रव, है वह सब प्रात्मकल्याणकी दृष्टिसे ही लिखा गया हैं वन्ध, संवर, निर्जरा और मोक्ष इन सात तत्वोंके रूपमें अथवा वही लिखा गया है जो प्रात्मकल्याणकी दृष्टि से हमारी जानकारी में अायगा। अर्थात् जब हम "विश्व क्या प्रयोजन भूत है, फिर भी यदि विभाजित करना चाहे तो है ?' इस प्रश्नका समाधान करना चाहेंगे तो उस समय कहा जा सकता है कि इस ग्रन्थके पहिले, दूसरे, तीसरे, हम इस निष्कर्षपर पहुँचेंगे कि जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म चौथे, छठे, आठवें और दशवें अध्यायोंमें मुख्यतः श्राध्या- आकाश और काल इन.छः द्रव्योंका समुदाय ही विश्व है सिक दृष्टि ही अपनायी गयी है, इसी तरह पांचवें अध्याय और जब हम अपने कल्याण अर्थात् मुक्तिकी ओर अग्रसर में मौतिक दृष्टिका उपयोग किया गया है और सातवें होना चाहेंगे तो उस समय हमारे सामने ये सात प्रश्न खड़े तथा नवम अध्यायोंमें विशेषकर आचार या कर्तब्य सम्बन्धी हो जावेंगे-(१) मैं कौन हूँ?. (२) क्या मैं बद्ध है? उपदेश दिया गया है।
(३) यदि द्ध हूँ तो किससे बद्ध हूँ ?, (४) किन कारणोंसे ___तत्वार्थसूत्र आध्यात्मिक दृष्टिसे ही लिखा गया है या मैं उससे बद्ध हो रहा हूँ?, (१) बन्धके वे कारण कैसे उसमें प्राध्यात्मिक विषयका ही प्रतिपादन किया गया है दूर किये जा सकते हैं ? (१) वर्तमान बन्धनको कैसे दूर यह निष्कर्ष इस ग्रन्थकी लेखनपदतिसे जाना जा सकता किया जा सकता है ? और (७) मुक्ति क्या है ? और तब है। इस ग्रन्थका 'सभ्यग्दर्शनमानचारित्राणि मोक्षमार्ग: इन प्रश्नोंके समाधानके रूपमें जीव. जिससे जीव बंधा यह पहला सूत्र है, इसमें सम्यग्दर्शन सभ्याज्ञान और हुआ है ऐसा कर्म नोकर्मरूप पुद्गल, जीवका उक्त दोनों सम्यक्चरित्रको मोक्षका मार्ग बतलाया गया है । तदनन्तर
नता प्रकारके पुद्गलके साथ संयोगरूपबन्ध, इस बन्धके 'तत्वार्थ-श्रद्धानं सम्यग्दर्शनम्' इस सूत्रद्वारा तत्त्वार्थोके
कारणीभूत मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद, कषाय और योग श्रद्धानको सम्यकदर्शनका स्वरूप बतलाते हुए 'जीवाजीवा
रूप आश्रव, इन मिथ्यात्व भादिकी समाप्तिरूप संवर श्रवबन्धसंवरनिर्जरामोक्षास्तत्वम्'इस सूत्रद्वारा जीव,अजीव,
तपश्चरणादिके द्वारा वर्तमान बन्धनको ढीला करनेरूप अाश्रव, बन्ध, संवर, निर्जरा और मोक्ष रूपसे उन तत्वार्थों
निर्जरा और उक्त कर्म नोकर्मरूप पुद्गलके साथ सर्वथा की सात संख्या निर्धारित करदी गयी है और फिर द्वितीय
सम्बन्ध विच्छेद करलेने रूप मुक्ति ये साप्ततत्व हमारे तृतीय-चतुर्थ-अध्यायोंमें जीवतत्वका, पञ्चम अध्यायमें
निष्कर्षमें पायेंगे। अजीवतत्वका छठे और सातवें अध्यायों में श्राश्रव तत्व का, भौतिक दृष्टिसे वस्तुतत्व द्रव्यरूप में ग्रहीत होता है पाठवें अध्यायमें बन्धतत्वका नवम अध्यायमें संवर और और आध्यात्मिक दृष्टि से वह तत्वरूपमें ग्रहीत होता है। मिर्जरा इन दोनों तत्वोंका और दशत्रे अध्याय में मोक्षतत्व- इसका कारण यह है कि भौतिक दृष्टि वस्तुके अस्तित्व, का इस तरह क्रमशः विवेचन करके ग्रन्थको समाप्त कर स्वरूप और भेदप्रभेदके कथनसे सम्बन्ध रखती है और दिया गया है।
आध्यात्मिक दृष्टि आत्माके पतन और उसके कास्णोंका जैन आगममें वस्तुविवेचन के प्रकार .
प्रतिपादन करते हुए उसके उत्थान और उत्थानके कारणों
का ही प्रतिपादन करती है। तात्पर्य यह है कि जब हम जैन श्रागममें वस्तुतत्वका विवेचन हमें दो प्रकारसे - देखनेको मिलता है-कहीं तो हन्योंके रूप में और कहीं ..अजीवकावा धर्माधर्माकाशपुद्गलाः,दग्याणि, जीवाश्च. तत्वोंके रूपमें। वस्तु-तत्व विवेचनके इन दो प्रकारोंका
कालश्च । (तत्त्वार्थ सूत्र अध्याय ५ सूत्र नंबर. आशय यह है कि जब हम भौतिक दृष्टिसे अर्थात् सिर्फ वस्तु
क्रमशः १, २. ३ ३६ । स्थितिके रूप में वस्तुतत्वकी जानकारी प्राप्त करना चाहेंगे २. जीवाजीवाश्रवबन्धसंवरनिर्जरामोक्षास्तत्वम् । तो उस समय वस्तुतत्व जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश
(तत्वार्थसूत्रअध्याय 1, सूत्र ४)
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अनेकान्त
[किरण ४
वस्तुके अस्तित्वकी ओर दृष्टि डालते हैं तो उसका वह करणानुयोग और भौतिकवादको द्रव्यानुयोग नामोंसे अस्तित्व किसी न किसी प्राकृतिके रूप में ही हमें देखनेको पुकाग गया है। मिलता है । जैन संस्कृतिमें वस्तुकी यह प्राकृति ही द्रव्य- इस प्रकार समूचा तत्वार्थसूत्र आध्यात्मिक दृष्टिसे पद-वाच्य है इस तरहसे विश्वमें जितनी अलग अलग लिखा जानेके कारण आध्यात्मिक या करणानुयोगका न्य प्राकृतियां हैं उतने ही द्रव्य समझना चाहिये, जैन होते हुए भी उसके भिन्न भिन्न अध्याय या प्रकरण संस्कृतिके अनुसार विश्वमें अनन्तानन्त प्राकृतियां विद्यमान मौतिक अर्थात् द्रव्यानुयोग और चारित्रिक अर्थात् चरणा
व्य भी अनन्तानन्त ही सिद्ध हो जाते हैं परन्तु नुयोगकी छाप अपने ऊपर लगाये हुए हैं, जैसे पांचवे इन सभी द्रव्योंको अपनी अपनी प्रकृतियों अर्थात् गुणों अध्याय पर द्रव्यानुयोगकी और सातवें तया नवम
और परिणमनों अर्थात् पर्यायोंकी समानता और अध्यायों पर चरणानुयोग की छाप लगी हुई है। विषमताके आधार पर छह वर्गों में संकलित कर दिया गया है अर्थात् चेतनागुणविशिष्ट अनन्तानन्त श्राकृतियों
___तत्त्वार्थसूत्रके प्रतिपाद्य विषय को जीवनामक वर्गमें, रूप, रस, गन्ध और स्पर्श गुण
"तत्वार्थ सूत्र में जिन महत्वपूर्ण विषयों पर प्रकाश विशिष्ट अणु और स्कन्धके भेदरूप अनन्तानन्त प्राकृ- डाला गया है वे निम्नलिखित हो सकते हैं - तियोंको पुद्गल-नामक वर्गमें, वर्तना लक्षण विशिष्ट 'सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यकचारित्र तथा असंख्यात प्राकृतियों को काल-नामक वर्गमें, जीवों और इनकी मोक्ष मार्गता, तत्वोंका स्वरूप, वे जीवादि सात पुद्गलोंकी क्रियामें सहायक होने वाली एक प्राकृतिको धर्म ही क्यों ? प्रमाण और नय तथा इनके भेद, नाम, नामक वर्ग में, उन्हीं जीवों और पुद्गलोंके ठहरने में सहायक स्थापना, दव्य और भाव तथा द्रव्य, क्षेत्र, काल और होगे वाली एक प्राकृति को अधर्म-नामक वर्गमें तथा भाव, जीवकी स्वाधीन और पराधीन अवस्थायें, विश्वके समस्त द्रव्योंके अवगाहनमें सहायक होने वाली एक समस्त पदार्थोंका छह द्रव्योंमें समावेश, द्रव्योंकी संख्या श्राकृति को प्राकाश-नामक वर्गमें संकलित किया गया है। छह ही क्यों ! प्रत्येक द्रव्यका वैज्ञानिक स्वरूप, धर्म यही सबब है कि द्रव्योंकी संख्या जैन संस्कृतिमें छह और अधर्म द्रव्योंकी मान्यता, धर्म और अधर्म ये दोनों ही निर्धारिन करदी गई है।
द्रव्य एक एक क्यों ? तथा लोकाशके बराबर इनका इसी प्रकार प्रात्मकल्याणके लिये हमें उम्हीं बातों विस्तार क्यों ? श्राकाश द्रव्यका एकत्व और व्यापकत्व, की ओर ध्यान देनेकी आवश्यकता हैं जो कि इसमें काल द्रव्य की अणुरूपता और नामारूपता, जीवकी प्रयोजनभूत हो सकती हैं। जैन संस्कृति में इसी प्रयोजन- पराधीन और स्वाधीन अवस्थाओंके कारण, कर्म और भूत वातको ही तत्व नामसे पुकारा गया है, ये तत्व भी नोकर्म, मोक्ष प्रादि ।' पूर्वोक्त प्रकारसे सात ही होते हैं।
इन सब विषयों पर यदि इस लेखमें प्रकाश डाला इस कथनसे एक निष्कर्ष यह भी निकल पाता है जाय तो यह लेख एक महान ग्रन्थका श्राकार धारण कर कि जो लोग श्रात्मतत्वके विवेचन को अध्यात्मबाद और लेगा और तब वह अन्य तत्वार्थसूत्रके महत्त्वका प्रतिपादक श्रात्मासे भिन्न दूसरे अन्य तत्वोंके विवेचन को भौतिक- न होकर जैन संस्कृतिके ही महत्त्वका प्रतिपादक हो जायगा, वाद मान लेते हैं उनकी यह मान्यता गलत है क्योंकि इसलिए तत्त्वार्थसूत्र में निर्दिष्ट उक्त विषयों तथा साधारण उक्त प्रकारसे, जहां पर प्रात्माके केवल अस्तित्व, स्वरूप दूसरे विषयों पर इस लेख में प्रकाश नहीं डालते हुए इतना या भेद प्रभेदों का ही विवेचन किया जाता है वहां पर से ही कहना प्रर्याप्त है कि इस सूत्र ग्रन्थमें सम्पूर्ण जैन भी मौतिकवादमें ही गर्भित करना चाहिये और जहां पर संस्कृतिको सूत्रोंके रूपमें बहुत ही व्यवस्थित ढंगसे गूथ अनात्मतत्वोंका भी विवेचन प्रात्मकल्याणकी दृष्टिसे दिया गया है। सूत्र ग्रन्थ लिखनेका काम बड़ा ही कठिन किया जाता है वहां पर उसे भी अध्यात्मबादकी कोटि में है,क्योंकि उसमें एक तो संक्षेपसे सभी विषयोंका व्यवस्थित ही समझना चाहिये । यह बात तो हम पहिले डंगसे समावेश हो जाना चाहिए. दूसरे उसमें पुनरुक्तिका ही लिख पाये है कि जैन संस्कृति में अध्यात्मवाद को छोटेसे छोटा दोष नहीं होना चाहिये । ग्रन्थकार तत्वार्थसूत्र
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किरण ४]
को इसी ढंगसे लिखने में सफल हुए है, यह बात निर्विवाद कही जा सकती है।
संयम धर्म
उपसंहार
बड़े बड़े विद्वानोंके सामने विश्व स्वयं एक पहेली बन कर खड़ा हुआ है । संसारकी दुःखपूर्ण अजीब अजीब घटना -
उद्विग्न मनीषु लोगोंके सामने श्रात्मकल्याणकी भी एक समस्या है । इसके अतिरिक्त मानवमात्रकी जीवन-समस्या तो, जिसका हल होना पहले और
संयम धर्म
( श्री राजकृष्ण जैन ) दश धर्मोमें संयमका छठा स्थान है । इसलिए जब मनुष्य उत्तमक्षमा, मादव, आर्जव, शौच और सत्य गुणों से विभूषित होता है, तब वह ठीक अर्थ में संयम ग्रहण करनेका पात्र होता हैं | सं- सम्यक् प्रकार से यम ( जीवन पर्यंत चारित्र) ग्रहण करनेको संयम कहते हैं। इससे कोरे ase चारित्रका निराकरण हो जाता है ।
पूज्यपादाचार्यने ‘समितिषु प्रवर्तमानस्य प्राणेन्द्रिय परिहारः' यह संयमका लक्षण बतलाया है । यही बात पद्मनन्द श्राचार्य के निम्न श्लोकसे विदित है:जन्तु कृपादित मनसः समितषु साधोः पूर्वर्तमानस्य । प्राणेन्द्रिपरिहारः संयममाहु महामुनयः ॥
इसमें पूर्ण हिंसाका त्याग है, क्योंकि पूर्ण दयालुता वीतराग दशामें ७ वें अप्रमत्त गुणस्थानमें ही होती है । किन्तु जब सम्पूर्ण वीतरागता न हो तब रागकी वृत्तिके लिए पांच व्रतोंका धारण करना, पांच समितियोंका पाजन करना, क्रोधादि कषायोंका निग्रह करना, मनवचन-कायरूप तीन दण्डोंका त्याग करना और पांच इन्द्रियोंके विषयोंको जीतना संयम है । येह दो प्रकारका है प्राणसंयम और इन्द्रिय संयम । साधु ( मुनि ) दोनों प्रकारके संयमको पूर्ण पालता है, वह अपने आचरण में प्रयत्न करता है कि पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और वनस्पतिकाय जैसे स्थावर जीवोंकी भी रक्षा हो । गृहस्थ, प्राण संयम में, त्रस जीवोंके विघातको स्वागता है और स्थावर जीवोंकी भी यथासाध्य रक्षा
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अत्यन्त आवश्यक है, बढ़ा विकराल रूप धारण किये हुए है। इन सब समस्याओंको सुलझानेमें जैन संस्कृति पूर्णरूपसे सक्षम है । तत्वार्थसूत्र-जैसे महान ग्रन्थोंका योग सौभाग्यसे हमें मिला हुआ है और इन ग्रन्थोंका पठनपाठन भी हम लोग सतत किया करते हैं; परन्तु हमारी ज्ञानवृद्धि और हमारा जीवनविकास नहीं हो रहा है यह बात हमारे लिये गम्भीरता पूर्वक सोचनेकी है। यदि हमारे विद्वानोंका ध्यान इस घोर जावे तो इन सब समस्याओंका हल हो जाना असम्भव बात नहीं दें
करता है। गृहस्थ के लिये देवपूजा, गुरुउपासना, स्वाध्याय संयम, तप और दान ये छः श्रावश्यक बतलाये है, इनमें संयमको इसलिए गर्भित किया गया है कि संयम अर्थात् इन्द्रियनिग्रहके बिना उसका जीवन व्यवस्थित या Controlled life नहीं होती । यहीं से वह अपने सम्यक् श्रद्धा और ज्ञानको अाचरणके रूपमें उपयोग करता है और यहींसे वह दशा प्रारम्भ होती है जो संसारकी निवृत्ति अर्थात् मोक्ष के लिए आवश्यक है ।
तत्वार्थ सूत्र में 'प्रमत्त योगात्प्राणव्यरोपणं' यह हिंसाका लक्षण बतलाया है । जब मनुष्य पांच इन्द्रिय, चार कषाय चार विकथा, राग-द्वेष और निद्रा, १५ प्रकारके प्रमाद इन पर नियंत्रण करके प्रवृत्ति करता है, तब वह हिंसाका त्यागी होता है। प्रसादकी उपस्थितिमें सर्वप्रथम भावहिंसा के द्वारा अपने आत्मपरिणामोंका घात करता है और अपने समत्व (Equilibrium) को खो बैठता है। इसमें यह आवश्यक नहीं कि अन्य प्राणी मरें या जीवें, वह हिंसक कहलायेगा । पुरुषार्थसिद्धयुपायके निम्न दो श्लोक इस विषय में बड़े महत्व के हैं:
व्युत्थानावस्थायां रागादीनां वशप्रवृत्तायां । म्रियतां जीवो मारवा धावत्य ध्रुव हिंसा ॥ यस्मात्कषायः सन् हन्त्यात्मा प्रथममात्मनात्मानं । पश्चात् जायेत न वा हिंसा प्राण्यन्तराणांतु ॥
हिंसक और अहिंसककी व्याख्या निम्न उदाहरणसे स्पष्ट हो जाती है । कभी कभी देखा जाता है कि मारने
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अनेकान्त
[किरण ४
की भावनासे दिया गया विष भी किसी मनुष्यको अमृतका वचनकी शुद्धता भाषासमिति है, भोजनकी शुद्धता काम करता है और डाक्टर किसी मनुष्यकी जान बचानेके एषणासमिति है, देखकर उठाने और धरनेकी शुद्धता लिये आपरेशन करता है और मनुष्य मर जाता है। चाहे आदान-निक्षेपणासमिति है, स्वच्छ निर्जन्तु स्थान पर मृत्यु हो या न हो मारनेकी भावनासे विष देने वाला मलमूत्र विसर्जन करना प्रतिष्ठापनासमिति है। हिंसक है और आपरेशन करनेवाला डाक्टर अहिंसक ।
संयमकी महत्ता पर श्रीपद्मनन्दिप्राचार्यका निम्न मन, त्वचा, जिह्वा नासिका, नेत्र और कान इन पर कंट्रोल करना यही इन्द्रिय-संयम है। कौन नहीं जानता कि श्लोक महत्वपूर्ण हैइन्द्रियोंसे उत्पन्न हुए सुख सुखाभास है, विनाशक है मानुष्यं किल दुर्लभं भवभृतस्तत्रापि जात्यादयः, और कर्मोके श्राधीन है । स्पर्शन इन्द्रियका विषय कामांध
तेष्वेवाप्तवचः श्रतिः स्थितिरतस्तस्याश्च दृग्बोधने । हाथीको फंसा देता है, जिह्वा इन्द्रियके कारण मछली कांटे
प्राप्ते ते अपि निर्मले अपि परं स्यातां न येनोज्झिते, में फंसकर अपने प्राण गँवा देती है । नासिका इन्द्रियके कारण कमलके परागमें उसकी सुगन्ध सूंघता सूंघता स्वर्मोक्ष कफलप्रदः स च कथं न श्लाध्यते संयमः ॥ भंवरा अपनी जान देता है। नेत्र इन्द्रियके वशीभूत इसमें बतलाया है कि संसाररूपी गहन बनमें होकर पतंग दीपक या बिजलीकी लौमें स्वाहा हो भ्रमण करते हुए जीवको मनुष्यजन्म महादुर्लभ' है। जाता है। कर्णेन्द्रिय के वशीभूत चपल मृग भी राग मनुष्य पर्यायमें भी उत्तम जातिका मिलना कठिन सुननेके कारण शिकारीके द्वारा दारुण कष्टको भोगता है। है। यदि उत्तम जाति भी मिले तो भगवानके वचन जब एक एक इन्द्रियके विषयके कारण जीव नानाप्रकारके सुननेका सुयोग दुर्लभ है । यदि भगवद्-वचन भी दुःखोंको भोगता है तो मनुष्य पांचों इन्द्रियके विषयमें सुना तो उन वचनोंमें श्रद्धा लाना और ज्ञानसे उसका फंसकर क्या क्या कष्ट सहन नहीं करता ? इन्द्रियोंकी निर्णय करना कठिन है। यदि ये सब बातें हों तो भी
ल प्रवत्तिको रोकना ही संयम है। गृहस्थके संयमके बिना न स्वर्ग मिल सकता है और न मोक्ष । लिए भी यथासाध्य समितियोंका पालन नित्यके व्यवहारके यह जानकर मनुष्यको यथाशक्ति संयम अवश्य धारण लिए आवश्यक है। गमनकी शुद्धता ईर्या समिति है, करना चाहिए ।
प्राचिन्य धर्म
(परमानन्द शास्त्री) . ममेदमित्युपात्तेषु शरीरादिषु केषुचित् । भावनासे श्रोत प्रोत है, यदि उसमें से धनकी ममताका अभिसन्धिनिवृत्तिर्या तदाकिंचन्यमुच्यते ।। सर्वथा अभाव हो जाता है तब उसे भी प्राकिचन्य
धर्मका धारी माना जा सकता है अन्यथा नहीं। प्राकिं- संसारमें ऐहिक पदार्थों में और अपने शरीरादिकमें भी
चन्य धर्मका धारी धनी, निर्धनी, दुखी, सुखी आदि ममताका अभाव होना प्राकिंचन्य है। अकिंचन्यका
सभी व्यक्तियों पर समानभाव रहता है । वह लोकमें अर्थ होता है नग्नता। केवल बाह्य नग्नता आकिंचन्य
किसोको भी दुखी नहीं देखना चाहता महीं है, किन्तु अंतर्बाह्य परिग्रहसे ममत्वका अभाव होना आकिंचम्य है, लोकमें जिसके पास कुछ भी नहीं है,
आज लोकमें परिग्रहकी आसक्ति, अर्थसंचयकी लोलुजिसका तन नंगा है और मन भी नंगा है, जिसे पता और विविधि भोगोंके भोगनेकी लालसाने मानवअपने शरीरका भी लेशमात्र मोह नहीं है, वही वास्तवमें जीवनके नैतिक स्तरको भी नीचे गिरा दिया है। परिग्रहअकिंचन है। केवल निधन होना अकिंचन नहीं कहा की अनन्ततृष्णा मानवताके रहस्यको खोखला कर रही जा सकता, क्योंकि धनाभाव, धनागमकी आकांक्षारूप है। लोय परिग्रहको ही आज सब कुछ अपना माने बैठे
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किरण ४ ]
आकिंचन्य धर्म
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है। उसीकी भीड़ में अपने को सुखी अनुभव करते हैं उसके सचयसे ही अपनी मान प्रतिष्ठाको ऊंचा उठा हुआ समझ रहे हैं जो जितना अधिक परिग्रही है वह लोकमें उतना ही अधिक प्रतिष्ठित माना जाता है और पैसेके कारण लोग उसकी इज्जत करते हैं। मानो धनागम उसकी मानप्रतिष्ठाका आज केन्द्रसा बना हुआ I
जो निर्धन है, गरीब है, बेचारा खानेके लिये मुहताज रहता है, तन ढकनेको भी जिसके पास वस्त्र नहीं है, भरपेट असका भी प्रवन्ध नहीं है, मांगकर उदरपूर्ति करना जिसे संतापका कारण है, जो मांगकर खानेसे भूखों मर जाना कहीं अच्छा समझ रहा है, ऐसे व्यक्तिका लोकमें कोई आदर नहीं है। जिसे संसारका वैभव दुःखद प्रतीत होता है, जो बास फुसकी एक छोटीसी झोपड़ी में सुखपूर्वक रह रहा है, पर दरिद्रता उसके लिये अभिशाप बन रही है जो अपने पूर्वकृत कमका फल भोगता हुआ भी कभी दिलगीर नहीं होता, मानवताका उभार जिसके रोम रोममें भिद रहा है, जो अपने से भी असहाय एवं दुःखी प्राणियोंके दुःखमें सहानुभूति रखता है, उन्हें सान्वना और यक्ष प्रदान करता हैभले ही यह निर्धन हो, बड़े बड़े महलोंमें न रहकर फूलकी बड़े बड़े झोपड़ी में रहता हो, तो भी छोड़ बड़ा होनेके योग्य है। लोकमें क्योंकि उसकी आमा निर्मल है, विचारोंमें उपचता है. वह कर्तव्य पथ पर भारूद है, इसीसे वास्तव में यह मानव है ।
इस आकिंचन्य धर्मके दो अधिकारी होते हैं, एक परिग्रहकी भीड़में रहने वाला विवेकी गृहस्थ, और दूसरा आत्मसाधना करने वाला तपस्वी साधु ।
जो गृहस्य सांसारिक कार्योंनें लग रहा है. न्याय और नीतिले धनार्जन करता हुआ मानवताके नैतिक स्तरसे नहीं गिरा है, जो सदा इस बातका ध्यान रखता है कि मैं मानव हूँ और दूसरे भी जोक में मानव हैं ये भी मेरे ही समान हैं, मुझे उनके प्रति घृणा अथवा तिरस्कारकी दृष्टि रखना प्रयुक्त है। हाँ, यदि उनमें कुछ कमी है अथवा पुरुषार्थकी कमजोरी है, तो वे उसे दूर करनेका यत्न करें । परन्तु धनादिकके मदमें अपने को न भुलायें, विवेकले काम लें । विवेक ही मानव जीवनको ऊंचा उठाने वाला है साहस और धैर्य उसके सहायक है। वह सद्दृष्टि हैवस्तुतयमें अडोल भद्धा रखता है, हृदयमें कोमलता और
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सरलता है, वही सच्या मानव है को परिग्रह संचयमें खालसा नहीं रखता, घोर न यहा तद्वा प्रवृत्तिसे उसे बढ़ाना ही चाहता है जिसे भोगोंकी अनुब्धिमें चिन्ता नहीं होती, और न दूसरेकी वृद्धिमें बाह ही होती है। जिसकी परमें आत्मकल्पनाका अभाव है वह सदा संतोषी और अपने दयालु स्वभावसे अहंकार की उस चट्टानसे कभी नहीं टकराता जो मानव जीवनके पतनमें कारण है। जिसकी चनादि वैभवमें ममता नहीं उसे अपना नहीं मानता, किन्तु कर्मोदयका फल समझकर उसमें हर्ष और विषाद नहीं करता, साता परिणतिमें सुखी और असावा में दुःखी अथवा दिलगीर नहीं होता किन्तु विवेकी और माध्यस्थ भावना तत्पर रहता है। वह आकिंचन्य धर्मका एक देश अधिकारी है।
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साधु है भ्रात्म-साधना के दुर्गम मार्ग में विचरण कर रहा है, जिसने साधुवृति अंगीकार करनेसे पहले ही संसारके वैभवसे होने वाली विषमताका मनन किया है और अपने विवेक बलसे उसमें होने वाली प्रांतरिक ममता श्रथवा मोहका सर्वथा त्याग किया है। जिसने भोगोंको निस्सार समझ कर छोड़ा है और अपने स्वरूपमें निष्ठ होने का प्रयत्न किया है जो बाहर भीतर एक सा नग्न है, । जिसके पास संयम और ज्ञानार्जनके उपकरवाके सिवाय कोई अन्य परमाणुमात्र भी पदार्थ नहीं है, जो परमाणुमात्रको भी अपना नहीं मानता वह वास्तवमें साधु है और आकिंचन्य धर्मका सर्वथा अधिकारी है।
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क्योंकि पर पदार्थकी चाकांचाही राग है, परिग्रह है। जहाँ पदार्थका संग्रह नहीं है और न लाखों करोड़ोंकी सम्पदा ही है किन्तु एक ममता है, उनमें अपनेपन की भावना है, वहाँ कियन्यधर्मका अभाव है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि पर पदार्थ चाहे रहे या न रहे उसमें ममता अथवा रागका अभाव हुए विना श्राकिंचन्यका सद्भाव नहीं हो सकता, क्योंकि उसमें निस्पृहता जो नहीं है । अतएव जो साधु रत्नत्रयका साधन करता है, देह भोगों से सर्वधा निस्पृह है, संयम और ज्ञानके उपकरण पीछी, कमण्डलु, शास्त्रादिमें भी ममता नहीं है- जो श्रात्म स्वातन्त्र्यका श्रभिलाषी है— कर्मबन्धनके छुड़ाने में उत्सुक है, वास्तवमें वही आकिंचन्य धर्मका स्वामी है। उत्तम आकिंचन गुण जानो, परिमार्चिता दुखही मानो फाँस तनिकसी तनमें साल, चाह लंगोटीकी दुख भाल ।
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अनेकान्त ,
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आकिंचन्य आत्माका धर्म है, गुण है, उसकी सबसे ' समतारससे सराबोर उस मुनिमुद्राको धारण करना बड़ी महत्ता दुःखका अभाव है। दुःखसे छूटनेके लिये हमें आवश्यक है जिसमें प्राशा, तृष्णाको कोई स्थान ही उस आकिंचन्य धर्मकी शरणमें जाना पड़ता है । विना नहीं है । किसी कविने ठीक कहा हैउसकी शरण लिये वास्तविक सुख मिलना नितान्त कठिन् भाले न समता-सुख कभी नर, विना मुनिमुद्रा धरे। है क्योंकि जिस तरह शरीरमें जरासी फांस लग जाती है
धन नगन पर तन नगन ठाड़े, सुर असुर पायनि परे। - तो वह बड़ा दुःख देती है, मनुष्य उससे बेचैन हो जाता
अतः हमारा कर्तव्य है कि हम वस्तुतत्त्वका यथार्थ है। उसी तरह धन, सम्पदा, महल, और विविध भोगोंके
स्वरूप सम्मनेका प्रयत्न करें और अपने प्रात्मकर्तब्यको संग्रहकी बात जाने दीजिये यदि एक लंगोटीकी चाह है, न भले. सजग और विवेकी बने रहें. घरमें रहते हुए घरजब तक वह नहीं मिल जाती है तब तक तद्विषयक
के कामसे उन्मुक्त रहनेका यत्न करें, सांसारिक भोगोंकी आकुलता बनी ही रहती है। उसकी चाहमें वह मानव
अभिलाषाको कम करें । और इस लालसाका भी परित्याग • अनन्त दुःखोंका पात्र होता है । तत्त्वदृष्टिसे विचार किया
चार किया करें कि बहुत धन संचय करके हम उसे परोपकारमें लगा जाय तो लंगोटी कोई महत्वपूर्ण पदार्थ नहीं है और न देंगे। ऐसा करनेसे प्रास्मा अपने कर्त्तव्यसे च्युत हो जाता वह किसीको दुख ही करती है। वह सुखःदुखकी जनक है और उससे वह अपने तथा परके उपकारसे भी वंचित भी नहीं है। किन्तु उस लंगोटीमें जो ममता है, राग है, रह जाता है। क्योंकि लोभसे लोभकी वृद्धि होती है। बह राग ही जीवको बेचैन कर रहा है दुखी और संसारी अन्ततोगत्वा प्रात्मा अपार तृष्णाकी कीचड़में फंस जाता बनाये हुए है। अतः उससे छूटनेके लिये उस लंगोटीसे है। दूसरे, धनसंचयसे अपना और दूसरेका उपकार हो भी मोह छोड़ना पड़ता है, बिना लंगोटीसे मोह छोड़े ही नहीं सकता। उपकार अपकार तो अपनी भावना और वास्तविक नग्नता नहीं पा सकती। लंगोटी छोड़ कर कर्तन्यसे हो सकता है। अतः पहले सदुद्दष्टि बन कर एक साधु बन जाने पर भी यदि उससे ममता नहीं छूटती है देश पाकिंचन्य धर्मका अधिकारी बनना चाहिये। और तो बह नग्नता भी अर्थसाधक नहीं हो सकती। अतः घरमें रहते हुए तृष्णाको घटाने तथा देह-भोगोंसे अरुचि लंगोटीसे भी ममता छोड़ना अत्यन्त आवश्यक है और बढ़ानेका यत्न करना ही श्रेयस्कर है।
ब्रह्मचर्य पर श्रीकानजी स्वामीके कुछ विचार
"ब्रह्मका अर्थ है आत्माका स्वभाव; उसमें विचरना, बुद्धि है उसके वास्तवमें विषयोंकी रुचि दूर नहीं हुई। परिणमन करना, लीन होना सो ब्रह्मचर्य है । विकार और शुभ अथवा अशुभ विकार परिणामों में एकता बुद्धि ही परके संगसे रहित आत्मस्वभाव कैसा है-वह जाने बिना अब्रह्मपरिणति है, और विकार-रहित शुरआत्मामें परिउत्तम ब्रह्मचर्य नहीं होता। लौकिक ब्रह्मचर्य शुभ राग है, णामकी एकता ही ब्रह्म परिणति है। यही परमार्थ धर्म नहीं है और उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म है राग नहीं है। ब्रह्मचर्य धर्म है।" शुद्धमात्मस्वभावकी रुचिके बिना विषयोंकी रुचि दूर नहीं “आत्म स्वभावकी प्रतीतिके बिना स्त्रीको छोड़ कर होती। मेरी सुखदशा मेरे ही स्वभावमेंसे प्रगट होती हैं, यदि ब्रह्मचर्य पाले तो वह पुण्यका कारण है, किन्तु, वह उसके प्रगट होने में मुझे किसीकी अपेक्षा नहीं है-ऐसी उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म नहीं है, और उससे कल्याण नहीं परसे भिन्न स्वभावकी दृष्टि हुए बिना विषयोंकी रुचि नहीं होता। विषयोंमें सुखबुद्धि अथवा निमित्तकी अपेक्षाका छटती । बाह्यमें विषयोंका त्याग करदे, किन्तु अंतरंगसे उत्साह संसारका कारण है। यहाँ पर जिस प्रकार विषयोंकी रुचि दूर न करे तो वह ब्रह्मचर्य नहीं है। स्त्री, पुरुषके लिए स्त्रीको संसारका कारण रूप कहा है, घरवार छोड़ कर त्यागी हो जाये, अशुभ भाव छोड़ कर उसी प्रकार स्त्रियोंको भी पुरुषकी रुचि सो संसारका शुभ करे, किन्तु उस शुभ भावमें जिसे रुचि एवं धर्म- कारण है।"
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आत्मा, चेतना या जीवन
( ले० अनन्तप्रसादजी B. Sc. Eng. 'लोलपाल' ) ( गव कर से आगे ) कुछ पश्चिमीय विद्वान यह मानते हैं कि मानव या जीवधारियोंकी चेतना और जीवनीका आधार 'आत्मा' जैसी कोई वस्तु नहीं है, ये तो यों ही स्वाभाविक रूपसे जन्म लेते और मर जाते हैं। मरने पर कुछ नहीं रहता सब कुछ खतम हो जाता है। जैसा प्राचीनकाल में चार्वाक ने भी कहा था । कुछ लोग कुछ खास तौरका Spirit मानते हैं । कुछ ईश्वर की सृष्टिमें विश्वास करते हैं कि ईश्वर ऐसा बनाता बिगाड़ता है इत्यादि । इस विषय पर बड़े प्राचीनकाल से वाद-विवाद और खण्डन- मण्डन होते चले आ रहे हैं जो हर धर्मोके शास्त्रोंमें भरे पड़े हैं, मुझे ' उनको यहाँ दुहराना नहीं है ।
चेतनामय वस्तुओं (जीवधारियों) का जन्म एक खास प्रकार से ही होता है । प्रायः नर-मादाके संयोगसे बीज होकर जन्म होता है और जिसका बीज होता है उसी रूपाकारमें उस बीजसे जन्म लेने वालेका रूपाकार होता है । कुछ समय तक जीवन रहने के बाद • जीवन जब लुप्त हो जाता है तब केवल बाह्य शरीर मात्र ज्यों का त्यों रह जाता है । यह बात सभी जीवधारियोंके साथ है चाहे वे मानव हों, पशु पक्षी हों, मगरमच्छ हों, कीट पतंगे हों या पेड़ पौधे हों। ऐसी बात निर्जीव वस्तुनोंमें नहीं पाई जाती। इससे भी सिद्ध होता है कि निर्जीव वस्तुओं की तुलना में और सजीवोंमें कोई खास 'विशेषता' है ।
कुछ पश्चिमी विद्वानोंने कहा है कि सजीवता या सचेतनता केवल मस्तिष्कके कारण है। पर ऐसे भी जीव हैं जिनके मस्तिष्क होता ही नहीं । जैसे-मिट्टी के बर्साती कीड़े ( केंचुआ Earth wo ms ) फिर भी उनमें जीवन होता है और थोड़ी चेतना भी होती है। चेतनाका प्रधान लक्षण पीड़ाका अनुभव कहा जा सकता है। जब इन बर्साती रेंगने वाले लम्बे पतले कीड़ों- केंचुओं को किसी चीज से खोदा या बेधा जाता है तो उन्हें पीड़ा होती जिसे हम प्रत्यक्ष देखते हैं।
वहाँ होती है जहाँ वह आत्माकी कोई रूपरेखा निर्धारित न करके श्ररूपी और पुद्गल-रहित ( Matterlless ) बतलाता है । बौद्धोंने इसीलिये 'शून्य' कह दिया है । ऐसी बातों या विचारोंकी धारणा बनाना मनुष्यके लिए कठिन हो जाता है और यहीं से शङ्का, विरोध, श्रमान्यता वगैरह उत्पन्न होती और बढ़ती हैं। पर सचमुच तर्कद्वारा आत्माका गुणके अनुरूप कोई पुद्गल रूपी शरीर सम्भव ही नहीं होता । कुछ लोगोंने श्रात्मा के रूप और आकारको निर्धारित करनेकी चेष्टा की है पर तर्कसे उनका पूर्णरूपेण खण्डन हो जाता हैं। माता-पिताके रज-वीर्यसे उत्पन्न 'बीज' तो बड़ा छोटा या सूक्ष्म होता है, वही बढ़ते बढते मानवाकृति हो जाता है । श्रात्मा श्रारम्भसे ही बीज में रहता है। वीर्य और रजका संयोग होकर जो 'बीजाणु' ( Spermetazoon ) बनता है उसीमें आत्मा या जीवका संचार होता है। जीवका संचार होनेके बाद ही उस 'बीजाणु' की वृद्धि होना आरम्भ होती है श्रन्यथा जो 'बीजाणु' सजीव नहीं हो पाते वे नष्ट हो जाते हैं । सजीव 'बीजाणु' भी मृत्युका प्राप्त होते हैं पर दोनों में भेद है। जैन दर्शनने आत्माको श्राकाश के समान
रूपी मानते हुए उसे उसी आकारका होना स्वीकार किया है जिस कारके शरीर में वह हो । शरीरकी वृद्धि के साथ उस आकार या फैलावको भी वृद्धि स्वयं होती जाती है। केंचुवेके मस्तिष्क नहीं होता पर यदि उसके शरीर के किसी भाग में भी छेदन भेदन हो तो उसका सोरा का सारा शरीर पीड़ासे ऐंठने लगता है स्पर्श-चेतना उसके सारे शरीरमें है । श्रात्मा यदि एक जगह रहता तो यह चेतना सारे शरीरमें नहीं होती । श्रात्मा सारे शरीर में व्यापक है और चेतना भी सारे शरीर में है, किसी एक जगह सीमित नहीं । इस विषयकी जैन शास्त्रोंमें विशद विवेचनात्मक समीक्षाएँ मिलेंगी ।
श्रात्मा सांसारिक अवस्था में पुद्गल matter) या जड़वस्तु के साथ ही संयुक्त रूपसे पाया जाता सांसारिक दृष्टिसे जैन दर्शनकी सबसे बड़ी कमजोरी है और तब तक उसका साथ रहता है जब तक आत्मा
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१४४]
अनेकान्त
[किरण ४
पूर्ण ज्ञान प्राप्त करके पुद्गल या जड शरीरसे एकदम अपनी जातिकी विशेषताके अनुसार बिना सिखलाए अपने छुटकारा या मुक्ति (मोच)न पा जाय । एक बार आप अपने कर्म करने लगता है। यह बात केवल कार्माण परमविशुद्ध रूप प्राप्त कर लेने पर आत्मा का सम्बन्ध शरीरकी अवस्थिति-द्वारा ही सम्भव है । इस विषयकी या साथ पुनः जडके साथ नहीं हो सकता। अज्ञान विशद ब्याख्या जैन शास्त्रोंमें मिलेगी । जीवधारियोंके जड़ताके कारण है और जड़का संयोग अज्ञानके कारण है। अपने आप अपना कर्म करनेकी विचित्रताको समझानेके ज्ञानकी वृद्धि पुद्गलके बन्धन या चापको ढीला बनाती लिए औरोंने भी अपने सुझाव दिए हैं-पर वे जरा भी है। ज्ञानकी कमी या अज्ञानकी वृद्धि जडताको दृढ़ करती सन्तोषजनक नहीं। पास्मासे युक्त कार्माण शरीर-जैसा है या पुद्गलके संयोगको अधिक सुदृढ बनाती है। ज्ञान जैन शास्त्रोंमें प्रतिपादित है वैसा ही स्वीकार करनेसे प्रास्माका अपना गुण है। जब भारमा पूर्णपने अपने गुण इस समस्याका समाधान ठीक ठीक होता है। को विकसित कर लेता है तो उसका सम्बन्ध पुद्गलसे इस विषयमें मैं एक लेख अनेकान्तके गत अंकमें अपने आप छूट जाता है। पर जब तक यह पूर्णता नहीं "कोका रसायनिक सम्मिश्रण" शीर्षकसे, लिख चुका होती आत्मा तो किसी न किसी शरीरके साथ ही रह हैं। मेरे "जीवन और विश्वके परिवर्तनोंका रहस्य" तथा सकता है तब तक बगैर शरीरके अकेला हो ही नहीं "शरीरका रूप और कर्म" नामक दो लेखोंमें भी इन मकता । मन और बुद्धि-युक्त मानव शरीरके द्वारा ही विषयों पर बहत कुछ प्रकाश डाला गया है-उन्हें पढ़नेसे । प्रास्माका पूर्ण ज्ञान विकसित हो सकता है, अन्यथा तो एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण और काफी जानकारी प्राप्त हो यह सम्भव ही नहीं है। इसीलिए मानव जन्मकी इतनी सकती है। बड़ी महत्ता मानी गई है। इस शरीरके भी कई भाग है
प्रास्माकी चेतना रहनेके ही कारण जीवनी शक्ति भी रहती : जिनमें कार्माण शरीर और तेजस शरीर बो सर्वदा प्रात्मा है और जीवनी शक्ति द्वारा शरीरके आधारसे ही कर्म होते के साथ रहते हैं और हाइमांसमय दृश्य औदारिक शरीर
हैं और फलस्वरूप दुख सुख इत्यादि भी चेतना द्वारा ही
AM मृत्युके बाद यहीं रह जाता है, जबकि कार्माण और तेजस
अनुभूत किये जाते हैं इसीलिए आत्माको कर्ता और भोक्ता शरीर मृत्यु के बाद प्रात्माके साथ साथ दूसरे शरीरों में
भी कहा गया है। शरीर को तो कर्मोंका आधार माना प्रास्माको ले जाते हैं। यह कर्माण शरीर ही किसी भी
है। अनुभूति या अनुभव करने वाला तो प्रात्मा है। मन जीवधारीके जन्म, जीवन और मरणका आधार या कारण
मस्तिष्क और हृदय इत्यादि भी शरीरके ही भा। हैं और है। दश प्राणों के द्वारा यह शरीरमें स्थिर रहता है। जब
पुद्गलकृत (Made of Matter) हैं तथा अनुभूतियोंइन प्राणोंका घात या क्षय होता है तो कर्माण शरीर आत्मा
को अधिक साफ और उनका विधिवत् व्योरेवार विशेष के साथ निकल जाता है, जिसे मृत्यु कहा जाता है।
ज्ञान कराने में सहायक कारण है । ये मस्तिष्क वगैरह भी बाहरी शरीरमें भी और कार्माण शरीरमें भी सर्वदा आत्मा या प्रास्माकी चेतनाकी मौजूदगीमें ही कार्यशील परिवर्तन हा करता है। यह परिवर्तन ही जीवनको चालू रहते हैं-अन्यथा नहीं । बीजाणु (Spermetazoon) रखता है या यों भी कह सकते हैं कि जीवन जब तक में पहले जीव (आत्मा) का आगमन होता है फिर धोरे २ रहता है परिवर्तन होता रहता है । परिवर्तन होते रहना शरीर, मस्तिष्क. मन इत्यादिका निर्माण होता है । इससे ही जीवन है। जबतक बाहरी शरीर और कार्माण शरीरों यह निश्चित है कि जीवधारीकी चेतना या ज्ञानके मूल का परिवर्तन सह-समान एक दूसरेके अनुकूल और साथ कारण या स्रोत मस्तिष्क, मन इत्यादि नहीं हैं-ये केवल साथ होता है जीवन रहता है । जब दोनोंमें भेद होता है प्राधार या सहायक मात्र हैं। बहुतसे जीवोंको मन और तो बीमारी और मृत्यु हो जाती है। हमारे कर्मों और मस्तिष्क इत्यादि होते ही नहीं, फिर भी उनमें जीवन और भावनाओंके अनुसार ही हमारे कार्माण शरीरमें तबदी चेतना रहती है। जीवन और चेतना प्रात्माके ही लक्षण लियाँ होती रहती हैं। कर्माण शरीर ही हमारे कर्मोको हैं और हो सकते हैं। कराने और भाग्यको निश्चित करने वाला है। हम पाते हैं प्रास्माका होना केवल तर्क-द्वारा ही सिद्ध होता है, कि हर पशु पक्षी, कीड़ा मकोड़ा जन्म होमेके बाद ही क्योंकि इसे हम देख नहीं सकते न इन्द्रियों द्वारा अनुभव
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करण ३]
आत्मा, चेतना या जीवन
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ही कर सकते हैं। आत्माको केवल आत्मा-द्वारा ही की एकाग्रता जिस विषयकी भी हो उस विषयमें क्षमताको अनुभूत किया जा सकता है। प्रारम्भमें मनकी एकाग्रता बढ़ाती है। यदि ध्यानका विषय शुद्ध पारमा ही स्वयं इसमें सहायक होती है। मनको प्रात्माके शुद्ध निर्मल हो तब तो पूछना ही क्या । ध्वानके तरीकोंका और स्वरूपके ध्यानमें लगानेसे साधना और ध्यानकी शुद्धताके अभ्यास बढ़ानेके ढंगोंका विशद-वर्णन जैन शास्त्रोसे प्राक्ष अनुसार धीरे धीरे ध्यान स्वयं अधिकाधिक गंभीर होगा। जैसा हम ध्यान करेंगे वैसा ही हम हो जायंगेऔर शुद्ध होता जाता है। शास्त्रोंके मननसे ज्ञानकी यह बिलकल सही बात है । तीर्थकर भगवानकी शुद्ध वृद्धि और शुद्धि होती है। इन दोनोंकी मददसे स्वयं ध्यानस्थ-मूर्तिका दर्शन और ध्यान करनेसे हमारे अन्दर तर्क और बुद्धिका उपयोग करके प्रारमाके शरीरस्थित भी वैसी ही भावनाएं उत्पन्न और सुदृढ होती हैं। भयंकर स्वरूपकी धारणा और उसके गुणोंका विशुद्ध ज्ञान मतियोंके या रूपोंके दर्शन और ध्यानसे हमारी भावनाएं प्राप्त होता है। यही ज्ञान और धारणा सुदृढ हो भी तदनरूप ही हो जाती हैं । शुद्ध, प्रकाशमय जाने पर ध्यानकी गहराई स्वयं आरमाको पात्मामें शारमाका ध्यान हमें उत्तरोत्तर उन्नत और शद्ध बनाता लीन करने लगती है और तब कभी न कभी स्वयं प्रात्माकी ऊवं गति इसी प्रकार संभव है। पारमप्रकाश उदय हो जाता है। यही वह अवस्था है जहाँ पूर्णज्ञानकी उपलब्धि हांकर प्रारमा निराबाध, निर्विकल्प
संसारमें भी हम पाते हैं कि जो आत्मामें विश्वास निद्वन्द, निर्बन्ध हो जाता है और तब पुद्गलसे छूटकर
करते हैं वे अधिक गंभीर और आचरणके पक्के होते हैं। अपनी परमशुद्ध पूर्णज्ञानमय अवस्थामें स्थिर हो जाता
जो श्राम्मामें विश्वास नहीं करते वे जल्दी ही विभिन्न है। इसे ही मोक्ष कहते हैं।
व्यसनोंके शिकार होकर अन्तमें अपना सब कुछ गंवा कर
निराश और दुःखी ही होते हैं। जब कि श्रात्मामें विश्वास मोक्ष ज्ञानकी वृद्धि द्वारा ही संभव है। ज्ञान भी शुद्ध,
करने वाला दुखमें भी धीर गंभीर रहता है और ठीक, सही ज्ञान होना चाहिए । गलत ज्ञानकी वृद्धिसे
उसका दुख भी सुखमें परिणत होजाता है। आस्मामें मोक्ष नहीं हो सकता है उलटा जद-पुद्गल (Matter)
विश्वास करनेसे मनुष्यको अपने जीवनके स्थायित्व में का सम्बन्ध या बन्धन और अधिक कड़ा होगा। आत्मा
विश्वास होता है। वह इस जन्ममें जो कुछ करता है को पुद्गलसे सर्वथा भिन्न समझना और ज्ञान चेतनामय
उसका अच्छा फल उसे अगले जन्ममें अच्छे वातावरण शुद्ध देखना ही सच्चा ज्ञान है । प्रात्माके गुण अलग हैं
और परिस्थितियों में ले जाता और रखता है या पैंदा और पुद्गलके गुण अलग । दोनोंका जब तक संयोग
करता हैं। रहता है दोनोंके गुणोंके सम्मिलनके फलस्वरूप हम जीवधारियों में विभिन्न गुणोंको पाते हैं। शरीरका हलन चलन
आत्मामें तो अनंतगुण, शक्ति और श्रानन्द हैं।
इनका विकाश करनेके लिए शुद्ध-ज्ञान-पूर्वक, ध्यान, पुद्गलका गुण है और चेतना श्रास्माके कारण है। चेतना ही चेतनाके विकाशका कारण, आधार और जरिया है।
अभ्यास, अध्यवसाय और चेष्टाका सतत होना आवश्यक
हैं। ऐसे दृढ लगन युक्त पान दारा भी यदि सफलता जड तो चेतनाको कम ही करने वाला है। जितना जितना
• न मिले तो उसमें कहीं दोष या कभोका होमा ही कारण चेतना (ज्ञान) का विकाश होता जाता है उसे ही सांसारिक
हो सकता है। दोष या कमीको ईद कर उसे दूर करना 'भाषामें आत्मविकाश कहते हैं। आत्मविकाशके लिये
चाहिए। बार बार लगातार कोशिश और अभ्यास करनेअच्छा स्वस्थ शरीर उपयुक्त वातावरण में जन्म, समुचित
से ही कुछ उचित फलकी उपलब्धि हो सकती हैं। परिस्थितियोंका होना और आवश्यक शिक्षा संस्कृति
शारीरिक अवस्थामें या गार्हस्थ्यमें मन ही ध्यानका जरूरी है। ध्यानके लिए भी इनकी जरूरत है । ज्ञान शुद्ध प्राधार हैं। मन बड़ा ही चंचल है। इसका स्थिर होना होने से ही ध्येय भी शुद्ध हो सकता है। ध्येय जब तक शुद्ध न हो तो ध्यान भी बेकार ही है।
७ देखो, मेरा लेख "शरीर का रूप और कर्म, जो ... साधारण गृहस्थ मानव भी शुद्ध आत्माका ध्यान अखिल विश्व जैन मिशनसे ट्रेक्टरूपमें अमूल्य प्राप्त करके अपने गुणों और समताओंको बढ़ा सकता है । ध्यान हो सकता है।
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अनेकान्त
[किरण ४
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या करना आसान काम नहीं। यदि प्रारम्भमें सफलता न अनुसार ही हो सकती हैं। शारीरिक शक्तियोंका विकाश मिले तो उससे निराश होनेकी जरूरत नहीं। चेष्टा अभ्यास और उपयुक्त आचार-व्यवहारादिसे बढ़ता है। सतत जारी रखना ही बांछनीय है। यही सारी सफलताओं- रोग शक्तियोंका हास भी करता है। जप, तप, ध्यान, की कुंजी हैं । ब्रह्मचर्य श्रादि गुण भी साधना की पूर्णता धर्म ज्ञानकी वृद्धि इत्यादि सभी कुछ शरीर द्वारा ही होते और पूर्ण सफलताके लिए आवश्यक हैं। वर्तमान कालमें हैं । बगेर उपयुक्त और सुयोग्य शरीरके कुछ भी ब्रह्मचर्य और संयम आदि की बड़ी कमी है इस कारण सम्भव नहीं है। आत्म-साधन भी शरीरके माध्यमसे नब लोग सफल नहीं होते तो अपना दोष न देखते हुए ही सम्भव है, इसलिए शरीरको स्वस्थ और साधनके और उस कमीको दूर न करते हुए प्रात्मा और प्रात्म- योग्य बनाए रखना हमारा कर्तव्य है । शरीरको नष्ट शक्तियोंमें ही अविश्वास करने लगते है। यह गलती हैं। करने या कमजोर करने या अंग-भंग करनेसे सिवा इसका सुधार आवश्यक है। प्रात्मा की शक्तियोंमें हानिके लाभ नहीं है। विश्वास होनेसे ही व्यकि अपनेमें विश्वास रखता है
जैसे तरह तरहके बिजनीके यन्त्र और मशीन तरह और दृढतासे कार्य करते हुए सफल और उन्नत भी हो
तरहके कार्य केवल बनावटों की विभिन्नताके कारण ही सकता है।
करते हैं-यद्यपि विद्य तशक्ति उनमें एक ही या एक एक व्यक्ति जो अपनेको किसी पर्वतकी ऊँची चोटी
समान ही होती है। उसी तरह प्रारमा सभी शरीरोंमें पर चढ़ सकने योग्य नहीं समझता वह चढ़नेकी चेहरा ही
समान गुण वाला होता हुआ भी विभिन्न शरीरों या शरीर . नहीं करेगा, चढ़ना तो दूर ही रहा। दूसरा जो अपनेको
धारियोंके कर्म या कार्य उन शरीरोंकी बनावटोंके अनुसार इस योग्य समझता है प्रयत्न करेगा और चढ़ जायगा।X ही होते हैं। पर ये कार्य भी जब तक आत्मा उन शरीरोंइसी तरह आत्मा की अनंत शक्तियोंमें विश्वास करने
स करने में (बिजलीके यन्त्रोंमें बिजलीकी शक्तिके समान) वर्तमान वाला अपनी शक्तियोंको उत्तरोत्तर बढ़ाने में प्रयत्नशील
शान रहता है तभी तक होते हैं-आत्माके निकलते ही सारे भी होगा और बढ़ा भी सकेगा। भास्मा को परमशुद कार्य बन्द हो जाते हैं। किसी जीवधारीके शरीरमें और समझकर ही पूर्ण विश्वासके साथ उपयुक्त चेष्टा और
किसी विद्य त यन्त्रमें यह भेद है कि यन्त्र जड है और कोशिशसे परमशुद्धता भी प्राप्त हो सकती है। जिस
जीवधारी चेतनामय है, विद्यु त शक्ति भी स्वयं पुद्गल व्यक्तिका ध्येय दसमील तक ही जानेका होगा वह आगे
( Matter या जड) निर्मित है जब कि प्रारमशक्ति नहीं जायगा पर जिसका ध्येय सौ मील जानेका होगा
ज्ञान-चेतना-मय है। यन्त्रोंमें बिजली यन्त्रोंका निर्माण वह दसमील तो जायगा ही और आगे भी जायगा। उच्च
होने पर बाहरसे प्रवाह की जाती है जब कि शरीरधारियों ध्येय रखना ही उच्चताको पहुँचा सकता है। हां, आत्मा
का शरीर आत्माके साथ ही उत्पन्न होता और बढ़ता हैकी अनन्त शक्तियां शरीरकी सीमित शक्तियोंके कारण
इसीसे बिजलीको हम देखते और मानते हैं पर आत्माही सीमित हैं इससे पूर्णता एकाएक नहीं प्राप्त हो
को नहीं देख पाते-केवल ज्ञान-चेतना होनेसे ही ऐसा सकती । केवल यही समझकर कि पारमा अनन्त शक्ति
मानते है कि आत्मा है। बिजलीका प्रवाह यन्त्रोंमें विद्यमान है, इसीलिए यह समझना और मान लेना कि मनुष्य
मान रहने पर जैसे यन्त्र अपने आप कार्य करते हैं पर भी अनन्त शक्ति वाला है और वैसा व्यवहार करने
कहा जाता है कि विद्य त-शक्ति सारे काम कर रही है लगना मूर्खता, भ्रम और पागलपन कहा जायगा । मनुष्य
उसी तरह प्रात्माके शरीरमें विद्यमान रहने पर आरमाको की शक्तियों ( या किसी भी जीवधारी शरीर-धारीकी
कर्ता कहते हैं। पर विजलीकी मशीन ही काय' करती हैं, शक्तियां) उसके शरीरको बनावट, गठन और योग्यताके ।
बगैर यन्त्रोंके बिजलीसे स्वयं कोई कार्य होना संभव हालमें ही संसारकी सबसे ऊंची पर्वत चोटी इव- नहीं था-उसी तरह जीवधारियोंके शरीर ही कार्य करते रेस्ट पर चढ़ने वालोंके विवरण अखवारीमें निकल रहे हैं बगैर शरीरके आत्मासे भी कुछ होना संभव नहीं है-अपने को उस कार्यके योग्य समझकर चेष्टा करनेसे ही था। मानवका शरीर मानवोचित कर्म करता है, घ.देका ये खोग अन्तमें सफल दुए हैं।
शरीर घोड़ेके कर्म, किसी पक्षीका शरीर उस पलीके
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किरण ४]
आत्मा, चेतना या जीवन
[१४७
कर्म या किसी कीड़ेका शरीर उस कीड़ेके कर्म करता या इन्द्रियों की बनावटों और योग्यताओं पर निर्भर है । इत्यादि ।
करती है। ___ कर्मोंके अनुसार कार्माण शरीरमें परिवर्तन होता रहता सब कुछ होते हए और पुद्गल शरीरके साथ रहकर है। अनादिकालसे अबतक परिवर्तन होते होते ही किसी
अनादि कालसे कम करते हुए भी आत्मा अात्मा ही जोवधारीका कार्माण शरीर उस विशेष प्रात्माको लिए
रहता है और जड जड ही रहना है, एवं प्रास्माके गुण हुए उस जीवधारीके उस शरीरके विशेष रूपमें संगठेत
ज्ञान-चेतना आत्मामें ही रहते हैं और ज्योंके स्यों रहते हैं और निर्मित हुए रहनेका मूल कारण है । विभिन्न
तथा पुद्गलके गुण-जडत्व अथवा हलन-चलन इत्यादिकी व्यक्तियोंकी विभिन्न प्रवृत्तियों और योग्यताओंकी विभि
योग्यता पुद्गल में ही रहते हैं और ज्योंके त्यों रहते हैं । न न्नताओंका भी यही मूल कारण है। अनादिकालसे अब
श्रात्माके गुण पुद्गल में जाते हैं न पुद्गलके गुण श्रात्मामें । तक संगठित न जाने किस कर्मपुजके प्रभाव में कोई व्यक्ति
श्रात्मा सर्वदा शुद्ध ज्ञान चेतना-मय ही रहता है। कोई कर्म करता है। विभिन्न कर्म पुर्जीका सम्मि लत संगठित शरीर ही कार्माण शरीर है। कार्माण शरीर भी यदि अात्मा पुद्गलके साथ अनादिकालसे नहीं रहता पुद्गल-निर्मित ही है । (कार्माण शरीरकी बनावट और
तो उसे अलग करने या होनेकी जरूरत नहीं होती। उस में परिवर्तनादिकी जानकारीके लिये जैन शास्त्रोंका दोनोंके गुण और स्वभाव भिन्न भिन्न हैं इससे दोनों अलग मनन करें और मेरा लेख 'कर्मों का रासायनिक सम्मिश्रण अलग हो सकते हैं और होते हैं। श्रात्माका पुद्गलसे देखें जो 'अनेकारत" की गत किरणमें प्रकाशित हो
छुटकारा या मुक्ति या मोक्ष हो जाना ही या पा जाना ही
छुटकारा या मुक्ति या माक्ष चुका है।) ..
प्रास्माका 'स्व-भाव' और किसी जीवधारीका परम लक्ष्य कहनेका तात्पर्य यह है कि कर्म जो भी होते हैं वे या एक मात्र अन्तिम धेय है। मोक्ष पा जाने पर प्रात्मापुद्गल-द्वारा ही होते हैं। प्रात्मा स्वयं कर्म नहीं करता।
की क्या दशा होती है या वह क्या अनुभव करता है इस पास्माका गुण कर्म करना नहीं है। आमाका गुए तो
पर शास्त्रोंमें बहुत कुछ कहा गया है यहाँ उसे दुहराना 'ज्ञान' है। ज्ञानका अर्थ है जानना । आत्माका यह गुण
इस छोटे लेख में सम्भव नहीं है। आत्मा पुद्गलसे छुट. सर्वदा आत्मामें ही रहता है और इसी कारण ही जीव
कारा पाकर ही अपने शुद्ध स्व-भावमें स्थिर होता है; यही धारियोंमें ज्ञान या चेतना रहती या होती है । जडवस्तु
वह अवस्था है जिसे पूर्णज्ञानमय-निर्विकार-परमानन्द 'जड' है और यह जडत्व ज्ञान शून्यता, या चेतना
अवस्था कहते हैं । यहाँ कुछ भी दुख क्लेशादि रूप सांसाहितता गुण सर्वदा जड या पुद्गल ( Matter)
रिक अनुभव नहीं रह जाते । प्रारमा स्वयं अपने में लीन स्वामें ही रहता है। हलन चलन या कर्मोका आधार भी जड
धीन स्व सुखका शाश्वत अनुभव करता है । यह वह पूर्णता ही है । संज्ञान कर्म या संज्ञान हलन चलन या सचेतन
है जहाँ कोई कमी, कोई बाधा, कोई इच्छा, कोई चिन्ता, क्रियाकलाप प्रास्मा और जडके संयुक्त होनेके कारण ही
कोई संशय, कोई शंका, कोई भय, कोई बन्धनादि एकदम होते हैं। अन्यथा केवल मात्र जड बस्तुओंके कर्म या
नहीं रह जाते । मारमा पूर्ण निर्विकल्प सत-चित् आनन्द
परमात्मा हो जाता है। हलन-चलन इत्यादि चेतन सा-रहित ही हो सकते हैं या होते हैं। टेलीफोन या रेडियो यन्त्रसे शब्द निकलते हैं प्रास्माको पुद्गलसे छुटकारा दिला कर इसी परमात्मा पर वे स्वयं कुछ समझ नहीं सकते-उनमें यह शक्ति या पदकी प्राप्तिके लिए ही विश्व या संसारकी सारी सृष्टि है गुण ही नहीं है। इसी तरह फोटो इलेक्ट्रिक सेल या और इस सृष्टिका सब कुछ होता या चलता रहता है। टेली विजन तरह तरहकी रूपाकृतियोंका साक्षात दृश्य सृष्टिका एक मात्र ध्येय ही यही है, अन्यथा सृष्टिका कोई उपस्थित करते हैं पर स्वयं कुछ भी नहीं जान, समझ अर्थ ही नहीं होता । सृष्टि या विश्व या विश्व में विद्यमान देख, या अनुभव कर सकते । अनुभव तो वही कर सकता सब कुछका होना सत्य, शाश्वत और साधार है और इसी है जिसमें चेतना हो। अनुभव या ज्ञानकी कमी वेशी लिए सार्थक है। इसे असत्य, क्षणभंगुर या कोरा नाटक चेतना कराने वाले प्राधारों या माध्यम स्वरूप शरीरों समझना गलती. मिथ्या, और भ्रम है।
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१४८ ]
श्रात्मा
आत्मा और पुद्गल स्वयंभू स्वयं अवस्थित हैं। न इन्हें किसीने उत्पन्न किया न कोई उन्हें नष्ट कर सकता है । ये सर्वदासे हैं और सर्वदा रहेंगे । न कभी इनकी संख्या में कमी होगी न बढ़ती । श्रात्मा-पुद्गल के अनादिसम्बन्धसे जब छुटकारा पाता है तो अपने स्व-स्वभाव में स्थिर होता है, अन्यथा श्रात्मा सर्वदा पुद्गल के साथ ही रहता है | आत्माका-पुद्गलसे छुटकारा केवल 'पूर्णता' होने पर ही हो सकता है । ज्ञानकी पूर्णता ही वह पूर्णता है जहां कुछ जाननेको बाकी नहीं रह जाता।
हम संसार में रह कर सारी सृष्टिकी मदद से ही सम्यक दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्ब चरित्र के द्वारा पूर्णताको प्राप्त कर सकते हैं और वह पूर्णता ही मोक्ष है । यही मानव जन्म येने या पानेका भी एकमात्र आदर्श ध्वेव और चरम लक्ष्य है। जो व्यक्ति इस ध्येयको या लक्ष्यको । सम्मुख रख कर संसार में 'संचरण' करता है वही सतत प्रयत्न-द्वारा उत्तरोत्तर ऊपर उठता उठता एक दिन इस 'पूर्णता' को प्राप्त कर मोक्ष पा जाता है।
।
संसारकी सारी विडम्बनाएं, दुःख शोक, रगड़े कगड़े उगहाई, युद्ध, रक्षपात, दिसादि केवल इसी कारण होते हैं कि मनुष्य अब तक 'आत्मा' की महत्ता या महानताको ठीक ठीक नहीं जान या समझ सका आधुनिक विज्ञानने । इतनी बड़ी उन्नति को पर वैज्ञानिक स्वयं नहीं बड़ी जानते कि क्या है? कौन है? उनके जीवनका वे अन्तिम लक्ष्य क्या है ? इत्यादि विभिन्न धर्मों और दर्शन-पद्धतियोंने एक दूसरेके विरोधी विचार संसार में प्रचारित करके बढ़ा ही गोलमाल और गदगद फैला बड़ा रखा है। इन विभेदोंके कारण लोग एक सीधा सच्चा मार्ग निर्दिष्ट नहीं कर पाते और भ्रम में भटकते ही रह जाते हैं। अब आवश्यकता है कि विचारक लोग - निक विज्ञान के आविष्कारों और प्राप्त फलोंकी सहायता वही जैन शासनशासन' के प्रति
संचेपमें यही 'जैन शासन' है का ध्येय, या सारांश है और यही 'जैन पादन या प्रवर्तनका अर्थ है ।
अनेकान्त
[ किरण ४
से बुद्धिपूर्ण सुतर्क द्वारा 'आत्मा' के अस्तित्व और उसकी महानताका प्रतिपादन करें और लोगों में इस धारणाका पूरा विश्वास बैठायें कि हर एक व्यक्ति अनन्त शक्तियांका धारी पूर्ण ज्ञान याला शुद्ध आमा अन्तर्हित है । व्यक्तियोंके भेद या भिन्नताएं केवल शरीरोंकी विभिन्नताश्रोंके ही कारण हैं। सबमें समान चेतना है । सबके दुखसुख समान हैं इत्यादि । एवं सभी इस अखिल विश्व के प्राणी और एक ही पृथ्वी पर पैदा होने तथा रहनेके कारण एक दूसरे से घनिष्ट रूपसे सम्बन्धित एक ही बड़े कुटुम्बके सदस्य हैं। सबका हित सबके हित में सन्निहित है । आत्माएं तो अलग अलग है पर पुल शरीरी या पुलका सम्बन्ध परमाणु रूपमें भी और संघ रूपमें भी सारे संसार और सारे विश्वसे अनुराग अटूट और अविचल संसार में स्थायी शान्ति, सर्व साधारण की समृद्धि और । सच्चे सुखकी स्थापना सार्वभौमरूपमें ही हो सकती है पक्तिगत या अलग अलग देश भौतिक (Mate rial ) उन्नति भले ही करने पर वह न सच्ची उन्नति हैन उनका सुख ही सच्चा सुख है सच्चा सुख सच्ची उन्नति और सच्ची एवं स्थायी शान्ति तो तभी होगी जब सभी मानवोंनें समान आत्माकी अवस्थिति समझ कर सबको उचित एवं समान सुविधाएं दी जायें और सामाजिक, राजनैतिक तथा आर्थिक समानताएं अधिक से अधिक सभी जगह सभी देशों में सभी भेदभाव के विचार दूर करके संस्थापित, प्रवर्तित और प्रबंधित की जायें। यही मानव धर्म है, यही जैन धर्म है, यही वैष्णव धर्म है, यही हिंदू धर्म है, वही ईसाई धर्म है यह सच्चा है, चाहे इसे जिस नामसे सम्बोधित किया जाये या पुकारा जाय।
है
गुरुओं और संसारके विद्वानोंका यह कर्तव्य हैं कि अब इस विज्ञान सप- बुद्धि और तर्कके युगमें रूड़िगत गलत मान्यताओं को छोड़कर आपसी विरोधों को हटायें और मानव मात्रको सच्चे हितकारी अविरोधी धारमधर्मकी शिक्षा देकर संसारको आगे बढ़ायें और अखिल मानवताका सचमुच सच्चा कल्याण करें ।
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वीरसेवामन्दिरके सुरुचिपूर्ण प्रकाशन रातन-जैनवाक्य-सूची-प्राकृतके प्राचीन ६४ मूल-ग्रन्थोंकी पद्यानुक्रमणी, जिसके साथ ४८ टीकादिग्रन्थोंमें दित दूसरे पद्योंकी भी अनुक्रमणी लगी हुई है । सब मिलाकर'२५३५३ पद्य-वाक्योंकी सूची । संयोजक और सम्पादक मुख्तार श्रीजुगलकिशोरजी की गवेषणापूर्ण महत्त्वकी १७० पृष्ठकी प्रस्तावनासे अलंकृत, डा० कालीदास नाग एम. ए., डी. लिट् के प्राक्कथन (Foreword) और डा. ए. एन. उपाध्याय एम. ए. डी. लिट की भूमिका (Introduction) से भूषित है, शोध-खोजके विद्वानों के लिये अतीव उपयोगी, बड़ा साइज, जिल्द ( जिसकी प्रस्तावनादिका मूल्य अलगसे पांच रुपये है) आप्त-परीक्षा-श्रीविद्यानन्दाचार्यकी स्वोपज्ञ सटीक अपूर्वकृति,प्राप्तांकी परीक्षा द्वारा ईश्वर-विषयके सुन्दर . सरस और सजीव विवेचनको लिए हुए, न्यायाचार्य पं० दरबारीलालजी के हिन्दी अनुवाद तथा प्रस्तावनादिसे . युक्त, सजिल्द। .
... ८) (३) न्यायदीपिका-न्याय-विद्याकी सुन्दर पोथी, न्यायाचार्य पं० दरबारीलालजीके संस्कृतटिप्पण, हिन्दी अनुवाद,
विस्तृत प्रस्तावना और अनेक उपयोगी परिशिष्टोंसे अलंकृत, सजिल्द। ... (४) स्वयम्भूस्तोत्र-समन्तभद्रभारतीका अपूर्व ग्रन्थ, मुख्तार श्रीजुगलकिशोरजीके विशिष्ट हिन्दी अनुवाद छन्दपरि
चय, समन्तभद्र-परिचय और भक्तियोग, ज्ञानयोग तथा कर्मयोगका विश्लेषण करती हुई महत्वकी गवेषणापूर्ण १०६ पृष्ठकी प्रस्तावनासे सुशोभित ।
... (५) स्तुतिविद्या-स्वामी समन्तभद्रकी अनोखी कृति, पापोंके जीतनेकी कला, सटीक, सानुवाद और श्रीजुगलकिशोर मुख्तारकी महत्वकी प्रस्तावनादिसे अलंकृत सुन्दर जिल्द-सहित । . .."
" ॥) (६) अध्यात्मकमलमार्तण्ड-पंचाध्यायीकार कवि राजमल्लकी सुन्दर आध्यात्मिक रचना, हिन्दीअनुवाद-सहित ... और मुख्तार श्रीजुगलकिशोरकी खोजपूर्ण ७८ पृष्ठकी विस्तृत प्रस्तावनासे भूषित।
॥) (७) युक्त्यनुशासन-तत्त्वज्ञानसे परिपूर्ण समन्तभद्रकी असाधारण कृति, जिसका अभी तक हिन्दी अनुवाद नहीं ___हुआ था । मुख्तारश्रीके विशिष्ट हिन्दी अनुवाद और प्रस्तावनादिसे अलंकृत, सजिल्द। " ) (5) श्रीपुरपाश्वनाथस्तोत्र-प्राचार्य विद्यानन्दरचित, महत्वकी स्तुति, हिन्दी अनुवादादि सहित । ... ॥) (E- शासनचतुस्त्रिशिका-(तीर्थपरिचय)-मुनि मदनकीर्तिकी १३ वीं शताब्दीकी सुन्दर रचना, हिन्दी ____अनुवादादि-सहित । ...
" ॥) (१० सत्साधु-स्मरण-मंगलपाठ-श्रीवीर वर्द्धमान और उनके बाद के २१ महान् आचार्यों के १३७ पुण्य-स्मरणोंका
महत्वपूर्ण संग्रह, मुख्तारश्रीके हिन्दी अनुवादादि-सहित । (११) विवाह-समुद्देश्य - मुख्तारश्रीका लिखा हुआ विवाहका सप्रमाण मार्मिक और तात्विक विवेचन ... ) (१२) अनेकान्त-रस-लहरी-अनेकान्त जैसे गूढ़ गम्भीर विषयको अतीव सरलतासे समझने-समझानेकी क्रुजी, । मुख्तार श्रीजुगलकिशोर-लिखित । २३) अनित्यभावना-प्रा. पद्मनन्दी की महत्वकी रचना, मुख्तारश्रीके हिन्दी पद्यानुवाद और भावार्थ सहित ) (१.) तत्त्वार्थसूत्र-(प्रभाचन्द्रीय )-मुख्तारश्रीके हिन्दी अनुवाद तथा व्याख्यासे युक्त। ... ) (१५, श्रवणबेल्गोल और दक्षिणके अन्य जैनतीर्थ क्षेत्र-ला० राजकृष्ण जैनकी सुन्दर सचित्र रचना भारतीय
पुरातत्व विभागके डिप्टी डायरेक्टर जनरल डाल्टी०एन० रामचन्द्रनकी महत्व पूर्ण प्रस्तावनासे अलंकृत । नोट-थे सब ग्रन्थ एकसाथ लेनेवालोंको ३८॥) की जगह ३०) में मिलेंगे।
व्यवस्थापक 'वीरसेवामन्दिर-ग्रन्थमाला' वीरसेवामन्दिर, १ दरियागंज, देहली
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________________ 148] Regd. No. D. 211 अनेकान्तके संरक्षक और सहायक संरक्षक 101) बा० मोतीलाल मक्खनलालजी, कलकत्ता 1500) बा० नन्दलालजी सरावगी, कलकत्ता 101) बा० बद्रीप्रसादजी सरावगी, 251) बा० छोटेलालजी जैन सरावगी, 101) बा० काशीनाथजी, 251) बा० सोहनलालजी जैन लमेचू, 101) बा० गोपीचन्द रूपचन्दजी 251) ला० गुलजारीमल ऋषभदासजी " 101) बा० धनंजयकुमारजी 251) बा० ऋषभचन्द (B.R.C. जैन , 101) बा जीतमलजी जैन 251) बा० दीनानाथजी सरावगी 101) बा०चिरंजीलालजी सरावगी 251) वा० रतनलालजी झांझरी 101) बा० रतनलाल चांदमलजी जैन, राँची 251) बा० बल्देवदासजी जैन सरावगी , 101) ला० महावीरप्रसादजी ठेकेदार, देहली 251) सेठ गजराजजी गंगवाल 101) ला० रतनलालजी मादीपुरिया, देहली 251) सेठ सुआलालजी जैन 101) श्री फतेहपुर जैन समाज, कलकत्ता 251) बा० मिश्रीलाल धर्मचन्दजी 10.) गुप्तसहायक, सदर बाजार, मेठ 251) सेठ मांगीलालजी 101) श्री शीलमालादेवी पत्नी डा० श्रीचन्द्रजी, एटा 251) सेठ शान्तिप्रसादजी जैन 101) ला० मक्खनलाल मोतीलालजी ठेकेदार, देहली 251) बा० विशनदयाल रामजीवनजी, पुरलिया 101) बा० फूलचन्द रतनलालजी जैन, कलमत्ता 5251) ला० कपूरचन्द धूपचन्दजी जैन, कानपुर 101) बा० सुरेन्द्रनाथ नरेन्द्रनाथजी जैन, कलकत्ता 251) बा० जिनेन्द्रकिशोरजी जैन जौहरी, देहली 101) बा० वंशीधर जुगलकिशोरजी जैन, कलकत्ता 251) ला० राजकृष्ण प्रेमचन्दजी जैन, देहली 101) बा० बद्रीदास आत्मारामजी सरावगो, पटना 251) बा० मनोहरलाल नन्हेंमलजी, देहली 101) ला० उदयराम जिनेश्वरदासजी सहारनपुर 251) ला० त्रिलोकचन्दजी, सहारनपुर 101) बा० महावीरप्रसादजी एडवोकेट, हिपार 251) सेठ छदामीलालजी जैन, फीरोजाबाद 101) ला० बलवन्तसिंहजो, हांसी जि०हिसार P251) ला० रघुवीरसिंहजी, जैनावाच कम्पनी, देहली 101) कुवर यशवन्तसिहजी, हांसी जि. हिसार 251) रायबहादुर सेठ हरखचन्दजी जैन, रांची 101) सेठ जोखाराम बैजनाथ सरावगी, कलकत्ता 251) सेठ वघी चन्दजी गंगवाल, जयपुर सहायक 101) बा० राजेन्द्रकुमारजी जैन, न्यू देहली 101) ला० परसादीलाल भगवानदासजी पाटनी, देहली 101) बा० लालचन्दजी बी० सेठी, उज्जैन 101) बा० घनश्यामदास बनारसीदासजी, कलकत्ता अधिष्ठाता 'वीर-सेवामन्दिर' 101) बा० लालचन्दजी जैन सरावगी , सरसावा, जि. सहारनपुर 4141 % 83 % 8 प्रकाशक-परमानन्दजी जैन शास्त्री 1, दरियागंज देहली। मुद्रक-रूप-वाणी प्रिटिंग रियागंज, देहती For Personal & Private Use Only