Book Title: Vividh Pujan Sangraha
Author(s): Champaklal C Shah, Viral C Shah,
Publisher: Anshiben Fatehchandji Surana Parivar
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श्री
अष्टोत्तरी व शान्तिस्नानादि विधि
एक जण मंगल कोठीमांथी पाणी लावी चार कळश भरे । ते चार श्रावक शांतिकविधिस्नात्र (कोई पण प्रकारना उपद्रवनी शांतिने माटे जे स्नात्र करवामां आवे तेने शांतिकविधिस्नात्र कहे छे) होय तो नमोऽर्हत्० कहीने नीचेनी चार गाथाओ बोले :ॐ वरकणयसंखविहुम-मरगयघणसन्निहं विगयमोहं । सत्तरिसयं जिणाणं, सव्वामरपूईयं वंदे-स्वाहा । ॐ तं संतिं संतिकरं, संतिण्णं सव्वभया ।संतिं थुणामि जिणं, संतिं विहेउमे-स्वाहा ॥२॥ ॐ रोगजलजलणविसहर-चोरारिमइंदगयरणभयाईं। पासजिणनामसंकित्तणेण पसमंतिसव्वाईंस्वाहा । ॐ भवणवइवाणमंतर-जोइसवासिविमाणवासिय । जेकेई दुट्ठदेवा, ते सव्वे उवसमन्तु मम स्वाहा ॥४॥
आ चारे गाथा भणी चारे श्रावक चारे प्रतिमाने साथे अभिषेक करे ।
(२६) जो पौष्टिकविधि स्नात्र होय तो ॐ नमोऽर्हते परमेश्वराय चतुर्मखाय परमेष्ठिने दिक्कुमारीपरिपूजिताय दिव्यशरीराय त्रैलोक्यमहिताय देवाधिदेवाय-अस्मिन् जम्बूद्वीपे भरतक्षेत्रे दक्षिणार्धभरते मध्यखण्डे... देशे.... नगरे... प्रासादे... गहे...
श्री अष्टोत्तरी व शान्तिस्नात्रादि
विधि
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