Book Title: Uttaradhyayanani
Author(s): Suryodaysagarsuri, Narendrasagarsuri
Publisher: Devchand Lalbhai Pustakoddhar Fund

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Page 307
________________ २९४ अध्ययन ३६ एएसिं वण्णओ चेव, गंधओ रसफासओ । संठाणादेसओ वावि, विहाणाई सहस्ससो ॥१३५॥ तेइंदिया उ जे जीवा, दुविहा ते पकित्तिया । पजत्तमपजत्ता, तेर्सि भेए सुणेह मे ॥१३६॥ कुन्थु पिवीलिउहंसा, उकलुद्देहिया तहा । तणहार कट्टहारा य, मालूगा पत्तहारगा ॥१३७॥ कप्पासद्धिमिजा य, तिदुगा तउसमिजगा । सदावरी य गुम्मी य, वोधव्वा इंदगाइया ॥१३८॥ इंदगोवमाईया, गहा एवमायओ । लोगेगदेसे ते सव्वे, ण सव्वत्थ वियाहिया ॥१३९॥ संतइ पप्पऽणाईया, अपजवसिया वि य । टिइं पडुच्च साईया, सपजवसिया वि य ॥१४०॥ एतेषां ॥१३५॥ त्रीन्द्रियास्तु ये जीवा द्विविधास्ते प्रकीर्तिताः; पर्याप्ता अपर्याप्तास्तेषां भेदान्धणुत मे ॥१३६।। कुन्थुः पिपीलिरुदंशाः, उत्कलिकउपदेहिकास्तथा, तृणहारकाष्टहारकाच, मालूकाः पत्रहारकाः ॥१३७।। कार्पासास्रिन मिञाच, तिन्दुकास्त्रपुषीमिजकाः; सदावरी च गुल्मी च, बोद्धव्या इन्द्रकायिकाः ॥१३८॥ इन्द्रगोपकादिका, अनेकधा एवमादयः; लोकैकदेशे से सर्वे, न सर्वत्र व्याख्याताः ॥१३९।। सन्तति प्राप्याऽनादिका, अपर्यवनीता अपि च; स्थिति प्राप्य मादिकाः, सपर्यवसिता अपि च ॥१४०॥

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