Book Title: Uttaradhyayanam Sutram Part 03
Author(s): Chandraguptasuri
Publisher: Anekant Prakashan Jain Religious Trust

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Page 397
________________ उत्तराध्ययन ॥३९५॥ मावः । काः पुन शर्करा लघुपाषा मत्ति' तमःप्रभा षट्त्रिंशमध्ययनम्. गा १५८. १६४ भावः । काः पुनस्ता इत्याह-रयणाभत्ति' रत्नानां रत्नकाण्डस्थितानां भवनपतिभवनस्थानां च आभा प्रभा यत्र सा रत्नाभा १ एवं सर्वत्र शर्करा लघुपाषाणखण्डरूपा तदाभा २ वालुकामा ३ पङ्कामा ४ धूमामा तत्र धूमाभावेऽपि तत्तुल्यपुद्गलपरिणामसम्भवात् ५ 'तमत्ति' तमःप्रभा तमोरूपा ६ तमस्तमःप्रभा महातमोरूपा ७ ॥१५७ ॥ मूलम्-लोगस्स एगदेसम्मि,ते सत्वे उ विआहिआ। इत्तो कालविभागं तु,तेसिं वोच्छं चउविहं १५८ ___ व्याख्या-लोकैकदेशे अधोलोकरूपे ॥ १५८ ॥ मूलम्-संतई पप्पऽणाइआ, अपजवसिआवि अ। ठिइं पडुच्च साईआ, सपजवसिआवि अ॥१५९॥ सागरोवममेगं तु, उक्कोसेण विआहिआ। पढमाए जहएणणं, दसवाससहस्सिआ॥१६०॥ व्याख्या-अत्र सर्वत्रापि स्थितिरिति शेषः ॥ १६० ॥ मूलम्-तिण्णेव सागराऊ, उक्कोसेण विआहिआ। दोच्चाए जहणणेणं, एगं तु सागरोवमं ॥ १६१॥ सत्तेव सागराऊ, उक्कोसेण विआहिआ। तइआए जहन्नेणं, तिपणेव उ सागरोवमा ॥१६॥ दस सागरोवमाऊ, उक्कोसेण विआहिआ। चउत्थीए जहन्नेणं, सत्तेव उ सागरोवमा ।१६३। सत्तरस सागराऊ, उकोसेण विआहिआ।पंचमाए जहन्नेणं, दस चेव उ सागरोवमा ।१६४॥ UTR-3

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