Book Title: Sanghpattak
Author(s): Jinvallabhsuri
Publisher: Jethalal Dalsukh Shravak

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Page 645
________________ - अथ श्री संघपटक (२३) MAN -AMPANIPANAM - टीका:-तथाहि यमुपरम इति पागद्यनत्युपरमति पापेज्य इति पापोपरमो यहा यती प्रयत्न इति धातुपागत् यतते क्रियास्वितियतिरिति क्षेत्रकालाद्यपेदोऽनुष्ठानप्रयत्नो यतिशब्दप्रवृत्तिनिमित्तं ॥ ततश्च यः पापोपरतो यश्च बलकालादिसामग्रीसमग्रः सततमशगेऽनुष्टाने समुतिष्टते योपि देशकालसंहननामयवैपम्यात्संपूर्णमनुष्टानमनुष्टातुमपारयन्नपि निजशरीरशक्त्यादिकमगोपयन् शाग्यपरिहारेण क्रियासु यतते तत्रसर्वत्रापि यतिशब्दो गौतमादिवत् प्रवर्तते प्रवृत्ति निमितस्यनावात् अर्थ-ते वात देखामे ले जे 'यमुपरमे' ए प्रकारनो धातु ने तेनो अर्थ विराम पामवारूप , जे पापथकी विराम पामे तेने यति कहीए, श्रथवा 'यति प्रयत्ने' ए धातुनो प्रयत्नरुपी अर्थ दे, तेथी जे क्रियाने विषे प्रयत्न करे तेने यति कहीए, ए प्रकारे केत्र कालादिकनी अपेक्षाये अनुष्टाननो प्रयत्न करवो, ते यति शब्दनी प्रवृ. तिनुं कारण ने, माटे जे पापथो विराम पाम्यो, अने पोतानुं वळ तथा काळादि सामग्री तेणे सहित थयो अने निरंतर अशठपणे अनुटान करवामां तत्पर वे अने जे देश, काळ, वळ शरीर तेमन वि. पमपणुं नथी, माटे संपूर्ण अनुष्टान करवाने पार पामतो था तो पण पोतानी शरीर शक्ति श्रादिक गोपवतो नयी अने शठपणानो त्याग करी क्रिशने विषे प्रवर्ते ठे ते सर्व जगाये पण यति शब्द गोतमादिकनी पेठे प्रवत ठे, केमजे ला यति शब्दनी प्रवृत्तिनुं का. रब रयुं वे ए हेतु मादे.

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